कर्नाटक के मंत्री संतोष लाड: मासिक धर्म छुट्टी कानून व्यावहारिक नहीं हो सकता

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कर्नाटक के मंत्री संतोष लाड: मासिक धर्म छुट्टी कानून व्यावहारिक नहीं हो सकता

सारांश

कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड ने मासिक धर्म की छुट्टी को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का समर्थन करते हुए, उन्होंने कहा कि यह कदम व्यावहारिक नहीं है। जानें इस नीति के पीछे की सोच और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए क्या संभावनाएं हो सकती हैं।

Key Takeaways

  • कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड का बयान मासिक धर्म छुट्टी पर व्यावहारिक चुनौतियों को उजागर करता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म छुट्टी के लिए कानून बनाने की मांग को खारिज किया।
  • कर्नाटक में महिलाओं को पेड छुट्टी देने की नीति को सराहा गया है।
  • महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर संभावित प्रभाव की चिंता जताई गई है।
  • कर्नाटक सरकार ने नीति विकसित करने में व्यापक विचार-विमर्श किया।

बेंगलुरु, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड ने शनिवार को कहा कि मासिक धर्म के लिए चार से पांच दिन की छुट्टी को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना व्यावहारिक दृष्टि से संभव नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया।

एक बयान में लाड ने कहा कि उन्होंने महिला कर्मचारियों और छात्राओं के लिए मासिक धर्म की छुट्टी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर ध्यान दिया। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कानून के जरिए चार से पांच दिन की मासिक धर्म की छुट्टी लागू करने में कई व्यावहारिक चुनौतियां हो सकती हैं।

कर्नाटक सरकार की नीति की कोर्ट द्वारा सराहना का स्वागत करते हुए लाड ने कहा कि इस नीति के अंतर्गत सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में महिलाओं को हर महीने एक दिन की पेड छुट्टी दी जाती है।

लाड ने बताया कि राज्य सरकार ने विशेषज्ञों, नियोक्ताओं, उद्योगपतियों, डॉक्टरों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद 'कर्नाटक मासिक धर्म चक्र नीति 2025' पेश की थी। उन्होंने कहा कि इस नीति के लाभों और चुनौतियों की गंभीरता से समीक्षा की गई थी।

लाड ने कोर्ट की उस टिप्पणी का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि मासिक धर्म की छुट्टी पर देशव्यापी कानून लाने से महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं और इससे युवा महिलाओं पर कलंक भी लग सकता है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर सभी संबंधित पक्षों के बीच व्यापक चर्चा आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी देशव्यापी मासिक धर्म छुट्टी नीति को बनाने से पहले सभी संबंधित पक्षों की राय ली जानी चाहिए, ताकि यह सभी महिलाओं के लिए उपयुक्त और लाभकारी हो।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया है, जिसमें पूरे देश में चार से पांच दिन की मासिक धर्म की छुट्टी अनिवार्य करने के लिए कानून बनाने की मांग की गई थी।

मंत्री संतोष लाड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें चार से पांच दिनों की मासिक धर्म की छुट्टी देने वाला कानून बनाने की मांग की गई थी।"

उन्होंने कहा, "यह भी सराहनीय है कि कोर्ट ने कर्नाटक की प्रगतिशील मासिक धर्म छुट्टी नीति की प्रशंसा की है, जिसके तहत महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन की पेड छुट्टी दी जाती है।"

लाड ने कहा, "कर्नाटक मासिक धर्म छुट्टी नीति 2025 के निर्माण के दौरान हमने एक संतुलित, व्यावहारिक और महिलाओं के अनुकूल नीति सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों, नियोक्ताओं, डॉक्टरों, उद्योगपतियों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ गहन विचार-विमर्श किया। यह हमारे समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।"

मंत्री लाड ने आगे कहा कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के हितों और गरिमा को ध्यान में रखते हुए कोई उपयुक्त नीति बनाई जाती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा।

Point of View

लेकिन इसके साथ ही वे कर्नाटक की प्रगतिशील नीति की सराहना भी करते हैं। यह संतुलन और संवाद की आवश्यकता को दर्शाता है, जो कि इस संवेदनशील विषय पर महत्वपूर्ण है।
NationPress
20/03/2026

Frequently Asked Questions

कर्नाटक की मासिक धर्म छुट्टी नीति क्या है?
कर्नाटक की मासिक धर्म छुट्टी नीति के तहत महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन की पेड छुट्टी दी जाती है।
क्या मासिक धर्म छुट्टी को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जा सकता है?
कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड का कहना है कि ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म छुट्टी के लिए कानून बनाने की मांग को खारिज कर दिया है।
मासिक धर्म छुट्टी पर क्या चिंताएँ हैं?
इस पर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं कि इससे महिलाओं के रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं और कलंक पैदा हो सकता है।
कर्नाटक सरकार ने इस नीति को कैसे विकसित किया?
यह नीति विशेषज्ञों और नियोक्ताओं के साथ विचार-विमर्श के बाद बनाई गई है।
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