करवा चौथ 2026 शुभ मुहूर्त: शाम 5:38 से 6:56 बजे तक करें पूजा, कालकाजी महंत ने बताई विधि
सारांश
मुख्य बातें
देशभर में 30 अक्टूबर 2026 को करवा चौथ का पावन पर्व मनाया जा रहा है, जिसमें सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रख रही हैं। दिल्ली के प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर के पीठाधीश्वर महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने इस वर्ष के शुभ मुहूर्त, पूजा की सम्पूर्ण विधि और इस व्रत के धार्मिक महत्व पर विस्तारपूर्वक जानकारी साझा की है।
करवा चौथ 2026 का शुभ मुहूर्त
महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत के अनुसार, इस वर्ष पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 38 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 56 मिनट तक है। उन्होंने कहा, "इस निर्धारित समयावधि में पूजा अर्चना करना अत्यंत उत्तम और फलदायी रहेगा।" गौरतलब है कि करवा चौथ का यह व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है।
पूजा विधि और धार्मिक महत्व
महंत जी ने बताया कि इस दिन सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखती हैं। व्रत के दौरान भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और भगवान गणेश की विधिवत पूजा की जाती है, जिसके पश्चात करवा चौथ की कथा सुनना अनिवार्य माना गया है। उन्होंने कहा, "इस व्रत में पूरे शिव परिवार की पूजा का विशेष महत्व है।"
पूजा के बाद सुहागिन महिलाएं आपस में करवा बदलने की परंपरा का निर्वाह करती हैं, जिसे 'बायना देना' भी कहा जाता है। यह परंपरा पारस्परिक सौहार्द और सामाजिक बंधन को दर्शाती है।
चंद्रोदय पर विशेष अनुष्ठान
महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने चंद्रोदय के समय किए जाने वाले अनुष्ठान को इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनके अनुसार, चंद्रोदय के समय महिलाएं छलनी के भीतर दीपक रखकर पहले चंद्रमा के दर्शन करती हैं और फिर उसी छलनी में से अपने पति का मुख देखती हैं। इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत का समापन किया जाता है।
उन्होंने कहा, "ऐसा करने से पति पत्नी के बीच परस्पर प्रेम और प्रीति बढ़ती है। यह कामना की जाती है कि उनका पति दीर्घायु हो, स्वस्थ रहे और दांपत्य जीवन सदा सुखमय बना रहे।"
व्रत की आस्था और सांस्कृतिक परंपरा
यह ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न राज्यों में इस व्रत को लेकर उत्साह चरम पर है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण के कई हिस्सों में यह पर्व व्यापक रूप से मनाया जाता है। कालकाजी मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है और यहाँ के महंत का मार्गदर्शन लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रामाणिक धार्मिक संदर्भ माना जाता है।
महंत अवधूत ने अंत में कहा कि भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद से इस व्रत को रखने वाली सभी महिलाओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। आने वाले वर्षों में यह परंपरा और अधिक प्रासंगिक होती जाएगी क्योंकि नई पीढ़ी भी इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ रही है।