केरल हाईकोर्ट का आदेश: तिरुवनंतपुरम के 20 BJP पार्षद चार सप्ताह में लें दोबारा शपथ
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय ने बुधवार, 24 जून 2026 को तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 भारतीय जनता पार्टी (BJP) पार्षदों को चार सप्ताह के भीतर दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया। यह आदेश उस विवाद की पृष्ठभूमि में आया है, जिसमें पार्षदों द्वारा पदभार ग्रहण के समय ली गई शपथ की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई थी।
विवाद की जड़
यह मामला इस वर्ष जनवरी में सामने आया था, जब केरल उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने संबंधित पार्षदों को नोटिस जारी किए थे। याचिका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] के पार्षद एस. पी. दीपक ने दायर की थी। उनका आरोप था कि कई BJP पार्षदों ने शपथ के दौरान कानून में निर्धारित प्रारूप का पालन करने के बजाय विशिष्ट देवी-देवताओं के नाम लिए, जो वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।
अदालत का रुख
पिछली सुनवाई में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि वैधानिक प्रारूप के अनुसार निर्वाचित प्रतिनिधियों को या तो 'ईश्वर के नाम पर शपथ' लेनी होती है अथवा 'गंभीर प्रतिज्ञान' करना होता है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि जब कानून में शपथ का एक निश्चित प्रारूप तय है, तो उसे अनेक देवी-देवताओं के नाम पर कैसे लिया जा सकता है। बुधवार के आदेश में अदालत ने इसी तर्क को आधार बनाते हुए दोबारा शपथ का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता की प्रतिक्रिया
याचिकाकर्ता दीपक ने कहा कि अदालत का यह आदेश उनके तर्क की पुष्टि करता है कि शपथ प्रक्रिया में मानकों का उल्लंघन हुआ था। उनके अनुसार, कुछ पार्षदों ने निर्धारित शब्दों की जगह विशिष्ट देवी-देवताओं के नाम लेकर शपथ ली थी। उन्होंने अपनी याचिका में शपथों को पूरी तरह रद्द करने की माँग भी की थी।
अंतरिम राहत से इनकार
दीपक ने यह भी अनुरोध किया था कि मामले के अंतिम निर्णय तक पार्षदों को नगर निगम की बैठकों में भाग लेने और मानदेय प्राप्त करने से रोका जाए। हालाँकि, अदालत ने यह अंतरिम अनुरोध अस्वीकार कर दिया और पार्षदों को पद पर बने रहने की अनुमति दी। साथ ही यह स्पष्ट किया कि उनकी शपथ की वैधता मामले के अंतिम फैसले पर निर्भर रहेगी।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि BJP ने पहली बार केरल के इतिहास में तिरुवनंतपुरम नगर निगम में सत्ता हासिल की थी, जहाँ उसने चार दशकों से शासन कर रही CPI(M) को सत्ता से बाहर किया था। यह जीत BJP के लिए केरल में राजनीतिक पैठ का प्रतीक मानी जाती है, और इसी कारण यह शपथ-विवाद राज्य में राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि अगले चार सप्ताह में दोबारा शपथ की प्रक्रिया किस रूप में पूरी होती है और अदालत अंतिम फैसले में क्या निर्णय सुनाती है।