तिरुवनंतपुरम नगर निगम: पार्षद सुगथन की रिहाई पर टिका भाजपा का बहुमत, 24 जुलाई है आखिरी तारीख
सारांश
मुख्य बातें
तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का बहुमत एक जेल में बंद पार्षद की रिहाई पर टिका है। केरल असामाजिक गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (KAAPA) के तहत हिरासत में लिए गए पार्षद आर. सुगथन यदि 24 जुलाई से पहले रिहा होकर पुनः शपथ नहीं ले पाते, तो भाजपा 101 सदस्यीय निगम में अपना साधारण बहुमत गँवा देगी। यह केरल के सबसे बड़े नगर निकाय में पार्टी के ऐतिहासिक पहले शासन के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों को पद की शपथ का उल्लंघन करने के आधार पर अयोग्य घोषित किया था और उन्हें चार सप्ताह के भीतर पुनः शपथ लेने का निर्देश दिया था। इनमें से 19 पार्षदों ने समय रहते यह प्रक्रिया पूरी कर ली। अकेले सुगथन न्यायिक हिरासत में होने के कारण ऐसा नहीं कर सके।
गौरतलब है कि सुगथन की जमानत याचिका पर KAAPA सलाहकार बोर्ड ने 29 जून को सुनवाई की, लेकिन अब तक कोई निर्णय नहीं आया है। इसी देरी के चलते वे केरल उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी में हैं।
भाजपा के लिए राजनीतिक दाँव
वर्तमान में 101 सदस्यीय तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा के पास 50 पार्षद हैं और एक निर्दलीय पार्षद का समर्थन प्राप्त है — इसी मामूली बहुमत के बल पर पार्टी ने पहली बार इस निकाय में सत्ता हासिल की थी। यदि सुगथन 24 जुलाई की समय-सीमा से पहले शपथ नहीं ले पाते, तो वे अपनी सीट स्थायी रूप से गँवा देंगे और भाजपा की प्रभावी संख्या घटकर 49 रह जाएगी।
यह आँकड़ा साधारण बहुमत की सीमा से एक कम होगा, जिससे परिषद में पार्टी की स्थिति अनिश्चित हो जाएगी और महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों में अड़चनें आ सकती हैं।
विपक्ष की स्थिति
निगम में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) के पास 29 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) के पास 20 पार्षद हैं। दूसरा निर्दलीय पार्षद वामपंथी दलों के निकट माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि इस समीकरण से विपक्ष को तत्काल सत्ता नहीं मिलेगी, लेकिन भाजपा की स्थिति इतनी कमज़ोर ज़रूर हो जाएगी कि बजट पास कराने से लेकर महापौर चुनाव तक हर कदम पर उसे जद्दोजहद करनी पड़ेगी।
आगे क्या होगा
भाजपा की उम्मीदें अब उच्च न्यायालय में सुगथन की जमानत याचिका पर टिकी हैं। यदि न्यायालय 24 जुलाई से पहले राहत देता है, तो पार्टी अपना बहुमत बचा सकती है। यह मामला केरल में नगर निकाय राजनीति की उस नाज़ुक प्रकृति को उजागर करता है जहाँ एक सीट का फर्क सत्ता और विपक्ष के बीच की रेखा खींच सकता है।