18 अगस्त 2026
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केरल हाईकोर्ट ने 2015 विधानसभा हंगामा मामले में चार पूर्व यूडीएफ विधायकों के खिलाफ केस किया रद्द

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केरल हाईकोर्ट ने 2015 विधानसभा हंगामा मामले में चार पूर्व यूडीएफ विधायकों के खिलाफ केस किया रद्द

सारांश

केरल हाईकोर्ट ने 2015 विधानसभा हंगामा मामले में चार पूर्व यूडीएफ विधायकों के खिलाफ दर्ज जवाबी केस रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि महिला विधायकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने का आरोप साबित नहीं होता। एलडीएफ के छह नेताओं पर मुख्य संपत्ति नुकसान मामला अब भी जारी है।

मुख्य बातें

केरल हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को 2015 विधानसभा हंगामा मामले में चार पूर्व यूडीएफ विधायकों के खिलाफ दर्ज जवाबी केस पूरी तरह रद्द किया।
बरी किए गए नेता: के.
शिवदासन नायर , एमए वाहिद , डोमिनिक प्रेजेंटेशन और एटी जॉर्ज ।
अदालत ने कहा — महिला विधायकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने का आरोप साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं होता।
मूल घटना 13 मार्च 2015 की है, जब एलडीएफ विधायकों ने तत्कालीन वित्त मंत्री केएम मणि को बजट पेश करने से रोका था।
एलडीएफ के छह नेता — वी.
शिवनकुट्टी, ईपी जयराजन, केटी जलील, के.
कुन्हाम्मद मास्टर, सीके सदाशिवन — सार्वजनिक संपत्ति नुकसान मामले में अब भी आरोपी।
सर्वोच्च न्यायालय पहले ही एलडीएफ सरकार की मामला वापस लेने की माँग कड़ी टिप्पणियों के साथ ठुकरा चुका है।

केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को 2015 के विधानसभा हंगामा मामले में चार पूर्व यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) विधायकों के खिलाफ दर्ज जवाबी आपराधिक मामला पूरी तरह रद्द कर दिया। इस फैसले को सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

मुख्य घटनाक्रम

हाईकोर्ट ने तत्कालीन विधायक के. शिवदासन नायर, एमए वाहिद, डोमिनिक प्रेजेंटेशन और एटी जॉर्ज को बरी करते हुए तिरुवनंतपुरम की मजिस्ट्रेट अदालत के उस पुराने आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें इन नेताओं को मुकदमे का सामना करने का निर्देश दिया गया था। इन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 341, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज था।

आरोप था कि इन नेताओं ने विधानसभा के भीतर हुए हंगामे के दौरान तत्कालीन एलडीएफ महिला विधायकों केके लथिका और जमिला प्रकाशम को रोका, उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाई।

अदालत का तर्क

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला विधायकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने का आरोप साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित नहीं होता और मामले को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार भी मौजूद नहीं है। अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द किया जिसमें मामले को सुनवाई योग्य घोषित किया गया था।

मूल घटना और राजनीतिक पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद 13 मार्च 2015 की उस घटना से जुड़ा है, जब एलडीएफ विधायकों ने तत्कालीन वित्त मंत्री केएम मणि को बजट पेश करने से रोकने के लिए केरल विधानसभा के भीतर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी, कंप्यूटर, माइक्रोफोन और अन्य उपकरण तोड़फोड़ का शिकार हुए थे, जिससे सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा था।

गौरतलब है कि एलडीएफ के सत्ता में आने के बाद क्राइम ब्रांच ने चार यूडीएफ नेताओं के खिलाफ यह जवाबी मामला दर्ज कराया था। उस समय इसे व्यापक रूप से एक राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देखा गया था, क्योंकि एलडीएफ के अपने नेताओं पर सार्वजनिक संपत्ति नुकसान का मुख्य मामला चल रहा था।

एलडीएफ नेताओं पर मुकदमा जारी

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सार्वजनिक संपत्ति नुकसान के मुख्य मामले में एलडीएफ के छह प्रमुख नेता — वी. शिवनकुट्टी, ईपी जयराजन, केटी जलील, के. अजित, के. कुन्हाम्मद मास्टर और सीके सदाशिवन — अब भी आरोपी हैं और उन्हें अदालत का सामना करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि एलडीएफ सरकार ने अपने नेताओं के खिलाफ चल रहे मामले को वापस लेने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का भी दरवाज़ा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने कड़ी टिप्पणियों के साथ यह माँग ठुकरा दी थी।

राजनीतिक समीकरण पर असर

यूडीएफ नेताओं का शुरू से यह कहना था कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है ताकि सत्तारूढ़ मोर्चे के नेताओं पर लगे आरोपों का राजनीतिक दबाव कम किया जा सके। हाईकोर्ट के ताज़े फैसले ने इस जवाबी मामले को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब विधानसभा हंगामा मामले में केवल एलडीएफ नेताओं को ही न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना है, जो आने वाले समय में केरल की राजनीति में एक अहम मुद्दा बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह अदालत में टिक नहीं सका — यह सत्तारूढ़ दल की कानूनी रणनीति की सीमाओं को उजागर करता है। दूसरी ओर, एलडीएफ के छह नेताओं पर मुख्य मामला अब भी चल रहा है और सर्वोच्च न्यायालय ने वापसी की अर्ज़ी ठुकरा दी है — यानी राजनीतिक समीकरण अब एलडीएफ के लिए और असुविधाजनक हो गया है। केरल में विधायिका के भीतर हिंसा और तोड़फोड़ के इस दशक पुराने मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि संसदीय मर्यादाओं के उल्लंघन पर जवाबदेही कब और कैसे सुनिश्चित होगी।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाईकोर्ट ने 2015 विधानसभा हंगामा मामले में क्या फैसला दिया?
केरल हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को चार पूर्व यूडीएफ विधायकों — के. शिवदासन नायर, एमए वाहिद, डोमिनिक प्रेजेंटेशन और एटी जॉर्ज — के खिलाफ दर्ज जवाबी आपराधिक मामला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि महिला विधायकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने का आरोप साबित नहीं होता और मामले को आगे बढ़ाने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है।
2015 केरल विधानसभा हंगामा मामला क्या था?
13 मार्च 2015 को एलडीएफ विधायकों ने तत्कालीन वित्त मंत्री केएम मणि को बजट पेश करने से रोकने के लिए विधानसभा के भीतर जोरदार विरोध किया था। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी, कंप्यूटर, माइक्रोफोन और अन्य उपकरण तोड़े गए थे, जिससे सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा था।
एलडीएफ नेताओं पर अब भी मामला क्यों जारी है?
सार्वजनिक संपत्ति नुकसान का मुख्य मामला एलडीएफ के छह नेताओं — वी. शिवनकुट्टी, ईपी जयराजन, केटी जलील, के. अजित, के. कुन्हाम्मद मास्टर और सीके सदाशिवन — के खिलाफ अलग से चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने एलडीएफ सरकार की इस मामले को वापस लेने की माँग कड़ी टिप्पणियों के साथ पहले ही खारिज कर दी थी।
यूडीएफ विधायकों के खिलाफ जवाबी मामला कब और कैसे दर्ज हुआ था?
एलडीएफ के सत्ता में आने के बाद क्राइम ब्रांच ने चार यूडीएफ नेताओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 341, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था। आरोप था कि इन नेताओं ने एलडीएफ की महिला विधायकों केके लथिका और जमिला प्रकाशम को रोका और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। यूडीएफ नेताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया था।
इस फैसले का केरल की राजनीति पर क्या असर होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद यूडीएफ नेता इस जवाबी मामले से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं, जबकि एलडीएफ नेताओं को मुख्य मामले में अदालत का सामना जारी रखना होगा। राजनीतिक रूप से यह एलडीएफ के लिए असुविधाजनक स्थिति है, क्योंकि विधानसभा हंगामा मामले में अब केवल सत्तारूढ़ मोर्चे के नेता ही आरोपी बचे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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