खड़गे रैली के बाद 'शुद्धिकरण' विवाद: कांग्रेस ने भाजपा-आरएसएस पर साधा निशाना, संसद गतिरोध पर भी तीखे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उत्तराखंड के हल्द्वानी में आयोजित रैली के बाद रामलीला मैदान में कथित 'शुद्धिकरण' हवन किए जाने का विवाद 13 अगस्त को और गहरा गया। कांग्रेस ने इस घटना को दलित समुदाय के प्रति भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कथित मानसिकता का प्रतीक बताते हुए तीखा हमला बोला। इसी बीच संसद के मानसून सत्र में भी गतिरोध जारी रहा, जिसे लेकर विपक्ष ने सरकार पर सीधे आरोप मढ़े।
शुद्धिकरण विवाद: कांग्रेस का पलटवार
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने इस घटना को 'बेहद गलत और निंदनीय' करार दिया। उन्होंने कहा कि यदि खड़गे जैसे वरिष्ठ दलित नेता किसी राजनीतिक कार्यक्रम को संबोधित करें और उसके बाद 'शुद्धिकरण' की रस्म अदा की जाए, तो यह राजनीति के अत्यंत निचले स्तर को उजागर करता है। शुक्ला ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस मामले पर स्पष्ट बयान देने की माँग की।
कांग्रेस सांसद अमन सिंह ने आरोप लगाया कि RSS और BJP की सोच समाज में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC वर्गों की भागीदारी को स्वीकार नहीं करती। कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि खड़गे देश के प्रमुख दलित नेताओं में से हैं और उनके लंबे संसदीय जीवन में उन्होंने राष्ट्र की सेवा की है। उन्होंने BJP अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रधानमंत्री से सीधा सवाल किया कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद यह 'शुद्धिकरण' क्यों किया गया।
संसद गतिरोध पर विपक्ष के तीखे सवाल
मानसून सत्र के दौरान एनडीए सांसदों के संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन पर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि उन्होंने संसद परिसर में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा। उनकी यह प्रतिक्रिया सत्ता पक्ष के सांसदों के असामान्य प्रदर्शन को लेकर थी।
कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने गृह मंत्री से सदन में आकर संबंधित मुद्दे पर चर्चा करने की माँग की। उन्होंने कहा कि विपक्ष चर्चा और जवाबदेही के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन गृह मंत्री सदन में आने के बजाय अनुपस्थित हैं। वेणुगोपाल ने सदन की कार्यवाही में रुकावट की पूरी जिम्मेदारी सरकार पर डाली और कहा कि सरकार के एजेंडों को देश की जनता ने नकार दिया है।
विधायी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने पूरे मानसून सत्र को 'निराशाजनक' बताया। उनके अनुसार, परीक्षा संबंधी विधेयक पर चर्चा तो हुई, किंतु कई विधेयक पर्याप्त बहस के बिना ही पारित कर दिए गए और कुछ को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रश्नकाल और शून्यकाल के दौरान सदस्यों को जनता से जुड़े मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
कार्ति ने स्पष्ट कहा कि सदन चलाने की जिम्मेदारी सरकार की है और बहुमत होने के बावजूद विपक्ष की आवाज को दबाना लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि सरकार यह तय नहीं कर सकती कि विपक्ष कौन से मुद्दे उठाए।
सरकार की स्थिति और आगे की राह
इमरान प्रतापगढ़ी ने यह भी बताया कि जब देशभर में यह संदेश फैलने लगा कि सरकार संसद से भाग रही है और छात्रों, युवाओं तथा आम नागरिकों में इसे लेकर नाराजगी बढ़ रही है, तभी सरकार ने स्पीकर को पत्र लिखकर बातचीत की इच्छा जताई। उन्होंने सवाल किया कि यह पहल पहले क्यों नहीं की गई। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम चरण में है और दोनों पक्षों के बीच टकराव चरम पर है।