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क्या शिवलिंग की उत्पत्ति एक पौराणिक कथा है?

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क्या शिवलिंग की उत्पत्ति एक पौराणिक कथा है?

सारांश

क्या आपने कभी सोचा है कि शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई? यह लेख आपको भगवान शिव के प्रतीक के पीछे की पौराणिक कथाओं के बारे में बताएगा। जानिए इस रहस्यमय ज्योतिर्लिंग की कहानी को, जो सदियों से भक्तों का आस्था का केंद्र रहा है।

मुख्य बातें

शिवलिंग का प्रतीक सृष्टि का है।
यह भगवान शिव का निराकार स्वरूप है।
शिवलिंग की पूजा में श्रद्धा का महत्व है।
भगवान ब्रह्मा के झूठ का परिणाम है केतकी का श्राप।
शिवलिंग की उत्पत्ति की कहानी शिव पुराण में है।

नई दिल्ली, 4 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। भगवान शिव का प्रतीक शिवलिंग हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और रहस्यमय रूपों में से एक माना जाता है। सदियों से भक्त श्रद्धा के साथ शिवलिंग की पूजा करते आ रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई थी?

इसका आधार कई पौराणिक कथाएं हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध कथा शिव पुराण में वर्णित ज्योतिर्लिंग की कहानी है। इस कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब सृष्टि की रचना हो चुकी थी। तब भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच यह विवाद हो गया कि उनमें से कौन सबसे महान है। दोनों अपने-अपने ज्ञान और शक्ति पर गर्व कर रहे थे।

इसी दौरान अचानक एक विशाल और अनंत प्रकाश स्तंभ प्रकट हुआ। यह अग्नि का इतना तेजस्वी स्तंभ था कि इसकी कोई शुरुआत या अंत नहीं दिखाई देता था। तभी आकाशवाणी हुई कि जो इस स्तंभ का आदि या अंत खोज लेगा, वही सबसे श्रेष्ठ देवता कहलाएगा। भगवान ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया और ऊपर की ओर उड़ चले ताकि वे उस स्तंभ का सिरा खोज सकें। वहीं, भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) का रूप लिया और नीचे की ओर पृथ्वी के गर्भ में जाकर उसका प्रारंभिक सिरा खोजने निकले।

दोनों देवताओं ने काफी कोशिश की, लेकिन किसी को भी उस प्रकाश स्तंभ का अंत या आरंभ नहीं मिला। अंत में, विष्णु जी ने हार मान ली और लौट आए, लेकिन ब्रह्मा जी ने सोचा कि अगर वे कह दें कि उन्होंने स्तंभ का सिरा देख लिया है, तो उन्हें श्रेष्ठता मिल जाएगी। उन्होंने झूठ बोल दिया और केतकी के फूल से झूठी गवाही दिलवा दी।

तभी अचानक वह अग्नि स्तंभ फट गया और उसके मध्य से स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए। उनका रूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य था। शिव जी ब्रह्मा के झूठ से बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा इस धरती पर कहीं नहीं की जाएगी और केतकी के फूल को भी श्राप दिया कि वह उनके पूजन में कभी इस्तेमाल नहीं होगा।

शिव जी ने तब बताया कि यह अग्नि स्तंभ वास्तव में उनका निराकार स्वरूप ज्योतिर्लिंग है, जिसका न कोई आरंभ है और न कोई अंत। यह सम्पूर्ण सृष्टि, ऊर्जा और ब्रह्मांड का प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और आस्था को और भी गहरा बनाती है।
RashtraPress
27 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है?
शिवलिंग की पूजा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक तरीका है। यह सृष्टि और ऊर्जा का प्रतीक है।
क्या शिवलिंग का कोई विशेष महत्व है?
हाँ, शिवलिंग का महत्व इसके निराकार स्वरूप में है, जो सृष्टि के आरंभ और अंत को दर्शाता है।
शिवलिंग की उत्पत्ति की कहानी क्या है?
शिवलिंग की उत्पत्ति की कहानी शिव पुराण में वर्णित है, जिसमें भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच एक विवाद का उल्लेख है।
क्या शिवलिंग की पूजा केवल हिन्दू धर्म में होती है?
मुख्यतः हिदू धर्म में, लेकिन इसके प्रति सम्मान अन्य धर्मों में भी है।
केतकी का फूल शिव पूजा में क्यों नहीं होता?
केतकी का फूल भगवान शिव द्वारा श्रापित किया गया था, इसलिए इसका प्रयोग नहीं होता।
राष्ट्र प्रेस
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