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लखनऊ सीबीआई कोर्ट का फैसला: एलआईसी के ₹6.37 करोड़ घोटाले में पंकज सक्सेना को 10 साल की सजा, 3 अन्य दोषी

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लखनऊ सीबीआई कोर्ट का फैसला: एलआईसी के ₹6.37 करोड़ घोटाले में पंकज सक्सेना को 10 साल की सजा, 3 अन्य दोषी

सारांश

14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद लखनऊ की सीबीआई अदालत ने एलआईसी के ₹6.37 करोड़ के घोटाले में मुख्य आरोपी को 10 साल की सज़ा सुनाई। फर्जी पॉलिसीधारकों के नाम पर जाली वाउचर बनाकर की गई इस धोखाधड़ी का मामला 2012 में दर्ज हुआ था।

मुख्य बातें

सीबीआई विशेष अदालत, लखनऊ ने 30 सितंबर 2026 को एलआईसी के ₹6.37 करोड़ घोटाले में 4 लोगों को दोषी ठहराया।
मुख्य दोषी पंकज सक्सेना (पूर्व हायर ग्रेड असिस्टेंट, एलआईसी ट्रांसगोमती ब्रांच) को 10 साल कठोर कारावास व ₹5 लाख जुर्माना।
प्रेम शंकर उपाध्याय, रेखा उपाध्याय और मनीष सक्सेना को प्रत्येक को 3-3 साल जेल व ₹1.25-1.25 लाख जुर्माना।
घोटाला फरवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच फर्जी पॉलिसीधारकों के नाम पर जाली वाउचर बनाकर किया गया।
सीबीआई ने मामला 13 अगस्त 2012 को दर्ज किया था और 21 अगस्त 2014 को चार्जशीट दाखिल की थी।
इसी सप्ताह औरंगाबाद सीबीआई कोर्ट ने आईटीओ सतीश कुमार भदानी को रिश्वत मामले में 5 वर्ष की सज़ा सुनाई।

सीबीआई की विशेष अदालत, लखनऊ ने 30 सितंबर 2026 को भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में हुए ₹6 करोड़ 37 लाख 66 हजार 660 रुपए के बड़े घोटाले में चार दोषियों को कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। इस मामले में मुख्य आरोपी पंकज सक्सेना को सबसे लंबी सज़ा मिली है, जबकि तीन अन्य सहयोगियों को भी जेल भेजा गया है।

मुख्य दोषी और सज़ा का विवरण

कोर्ट ने पंकज सक्सेना — जो घटनाकाल में एलआईसी की ट्रांसगोमती ब्रांच, जानकीपुरम, लखनऊ में हायर ग्रेड असिस्टेंट के पद पर तैनात सरकारी कर्मचारी था — को 10 साल के कठोर कारावास और ₹5 लाख के जुर्माने की सज़ा सुनाई। तीन अन्य दोषियों — प्रेम शंकर उपाध्याय, रेखा उपाध्याय और मनीष सक्सेना — को प्रत्येक को तीन-तीन साल के कठोर कारावास और ₹1.25-1.25 लाख जुर्माने की सज़ा दी गई है।

घोटाले का तरीका: फर्जी पॉलिसीधारक और जाली वाउचर

सीबीआई के अनुसार, आरोपियों ने फरवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच आपसी साजिश के तहत गैर-मौजूद और फर्जी पॉलिसीधारकों के नाम पर जाली पेमेंट वाउचर और चेक तैयार किए। इन दस्तावेज़ों के आधार पर एलआईसी के खातों से धोखाधड़ी से रकम निकाली गई, जिससे कुल ₹6 करोड़ 37 लाख 66 हजार 660 रुपए का नुकसान हुआ। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया जब सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों में आंतरिक वित्तीय निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे थे।

जाँच और चार्जशीट की कालक्रम

एलआईसी ट्रांसगोमती ब्रांच के चीफ मैनेजर की शिकायत पर सीबीआई ने 13 अगस्त 2012 को यह मामला दर्ज किया था। जाँच पूरी होने के बाद 21 अगस्त 2014 को आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें एलआईसी की उसी ब्रांच के अधिकारी भी नामज़द थे। गौरतलब है कि मामला दर्ज होने के लगभग 14 वर्ष बाद यह फैसला आया है, जो न्याय प्रक्रिया की दीर्घकालिक प्रकृति को रेखांकित करता है।

सीबीआई कोर्ट का एक और फैसला: इनकम टैक्स अधिकारी दोषी

इसी सप्ताह औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) की सीबीआई अदालत ने रिश्वत के एक अलग मामले में सतीश कुमार भदानी को दोषी ठहराया। भदानी घटनाकाल में जलगांव, महाराष्ट्र के इनकम टैक्स कार्यालय में इनकम टैक्स ऑफिसर (ITO) के पद पर कार्यरत थे। उन्हें 5 वर्ष की कठोर सज़ा और ₹1.5 लाख का जुर्माना सुनाया गया। यह दोनों फैसले एक ही सप्ताह में आना इस बात का संकेत है कि सीबीआई की विशेष अदालतें लंबित भ्रष्टाचार प्रकरणों में सक्रियता से निर्णय दे रही हैं।

आगे की संभावनाएँ

दोषियों के पास उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प शेष है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों में इस तरह के मामलों में कठोर सज़ा एक निवारक संदेश देती है। एलआईसी प्रबंधन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या सार्वजनिक संस्थाएँ आंतरिक निगरानी को इतना मज़बूत करेंगी कि ऐसे घोटाले वर्षों नहीं, महीनों में ही पकड़े जाएँ।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने एलआईसी घोटाले में किन्हें और क्या सज़ा सुनाई?
सीबीआई विशेष अदालत, लखनऊ ने 30 सितंबर 2026 को पंकज सक्सेना को 10 साल कठोर कारावास व ₹5 लाख जुर्माना, तथा प्रेम शंकर उपाध्याय, रेखा उपाध्याय और मनीष सक्सेना को 3-3 साल जेल व ₹1.25-1.25 लाख जुर्माना सुनाया। कुल चार दोषियों को एलआईसी के ₹6.37 करोड़ के घोटाले में सज़ा मिली है।
एलआईसी ट्रांसगोमती ब्रांच घोटाला क्या था और यह कैसे अंजाम दिया गया?
फरवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच आरोपियों ने फर्जी और गैर-मौजूद पॉलिसीधारकों के नाम पर जाली पेमेंट वाउचर और चेक तैयार किए और एलआईसी के खातों से ₹6 करोड़ 37 लाख 66 हजार 660 रुपए धोखाधड़ी से निकाल लिए। यह षड्यंत्र एलआईसी की जानकीपुरम, लखनऊ स्थित ट्रांसगोमती ब्रांच के भीतर से रचा गया था।
सीबीआई ने यह मामला कब दर्ज किया और चार्जशीट कब दाखिल हुई?
सीबीआई ने एलआईसी ट्रांसगोमती ब्रांच के चीफ मैनेजर की शिकायत पर 13 अगस्त 2012 को मामला दर्ज किया था। जाँच के बाद 21 अगस्त 2014 को चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें ब्रांच के अधिकारी भी शामिल थे।
इसी सप्ताह सीबीआई कोर्ट का दूसरा बड़ा फैसला कौन सा था?
औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) की सीबीआई अदालत ने रिश्वत मामले में जलगांव, महाराष्ट्र के पूर्व इनकम टैक्स ऑफिसर सतीश कुमार भदानी को दोषी ठहराते हुए 5 वर्ष कठोर कारावास और ₹1.5 लाख जुर्माना सुनाया। यह फैसला एलआईसी मामले के फैसले से एक दिन पहले आया था।
क्या दोषी इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकते हैं?
हाँ, दोषियों के पास उच्च न्यायालय में अपील करने का कानूनी विकल्प उपलब्ध है। अब तक किसी भी दोषी की ओर से अपील की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
राष्ट्र प्रेस
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