30 जुलाई 2026
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लखनऊ में ई-सिम फ्रॉड: ₹70 लाख की साइबर ठगी, 'डिजिटल अरेस्ट' गिरोह के दो सदस्य गिरफ्तार

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लखनऊ में ई-सिम फ्रॉड: ₹70 लाख की साइबर ठगी, 'डिजिटल अरेस्ट' गिरोह के दो सदस्य गिरफ्तार

सारांश

लखनऊ पुलिस ने ई-सिम एक्टिवेशन के ज़रिए ₹70 लाख की ठगी करने वाले नेटवर्क का पर्दाफाश किया। एक जियो पीओएस एजेंट ग्राहकों के दस्तावेज़ों का दुरुपयोग कर सिम बनाता था, जो टेलीग्राम के ज़रिए कंबोडिया के साइबर अपराधियों को क्रिप्टोकरेंसी में बेचे जाते थे — और फिर 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम में इस्तेमाल होते थे।

मुख्य बातें

लखनऊ क्राइम ब्रांच ने 29 जुलाई 2026 को ई-सिम फ्रॉड नेटवर्क का भंडाफोड़ कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया।
पीड़ित को 7 दिनों तक 'डिजिटल अरेस्ट' में रखकर ₹70 लाख की ठगी की गई; पुलिस ने ₹35 लाख फ्रीज कराए।
आरोपी सुमित कुमार रावत (जियो पीओएस एजेंट) ग्राहकों के ई-केवाईसी दस्तावेज़ों का दुरुपयोग कर गुप्त सिम सक्रिय करता था।
ई-सिम ₹325 प्रति सिम पर बेचे जाते थे और फिर टेलीग्राम के ज़रिए 50 यूएसडीटी प्रति सिम पर कंबोडिया स्थित अपराधियों को उपलब्ध कराए जाते थे।
भुगतान क्रिप्टोकरेंसी में लिया जाता था; नंबरों का उपयोग डिजिटल अरेस्ट, ट्रेडिंग फ्रॉड और ओटीपी फ्रॉड में होता था।
कार्रवाई ऑपरेशन 'सीवाईवीएजेआरए' के तहत पुलिस आयुक्त तरुण गाबा के निर्देशन में की गई।

लखनऊ पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 29 जुलाई 2026 को ई-सिम एक्टिवेशन के ज़रिए संचालित एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, इस गिरोह ने एक पीड़ित को 7 दिनों तक 'डिजिटल अरेस्ट' में रखकर ₹70 लाख की ठगी की, और भारतीय मोबाइल नंबर कंबोडिया स्थित विदेशी साइबर अपराधियों को बेचे।

मुख्य घटनाक्रम

पुलिस आयुक्त लखनऊ तरुण गाबा के निर्देशन में साइबर क्राइम थाना टीम ने यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष अभियान ऑपरेशन 'सीवाईवीएजेआरए' के तहत की। पीड़ित को साइबर अपराधियों ने फोन कर खुद को एटीएस पुणे का अधिकारी बताया और मनी लॉन्ड्रिंग सहित गंभीर अपराधों में संलिप्तता का डर दिखाया।

वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल माध्यमों से लगातार मानसिक दबाव बनाकर पीड़ित से चार अलग-अलग बैंक खातों में कुल ₹70 लाख ट्रांसफर कराए गए। जाँच के दौरान पुलिस ने तीन बैंक खातों में ₹35 लाख की राशि फ्रीज करा दी है।

ई-सिम धोखाधड़ी का तरीका

जाँच में सामने आया कि गिरफ्तार आरोपी सुमित कुमार रावत एक अधिकृत जियो सिम विक्रेता (पीओएस एजेंट) था। वह नए सिम लेने या मोबाइल नंबर पोर्ट कराने वाले ग्राहकों के पहचान दस्तावेज़ों और ई-केवाईसी का दुरुपयोग करता था।

ग्राहक को एक वैध सिम दिया जाता था, जबकि उन्हीं दस्तावेज़ों के आधार पर गुप्त रूप से दूसरा सिम सक्रिय कर लिया जाता था। बाद में इन सिम को ई-सिम में बदलने के लिए एक्टिवेशन क्यूआर कोड तैयार किए जाते थे। दूसरे आरोपी ईशु यादव ने — जो एयरटेल सर्विस प्रोवाइडर के रूप में काम करता था — सुमित को करीब 100 ब्लैंक एयरटेल सिम उपलब्ध कराए।

क्रिप्टोकरेंसी में हुआ विदेशी भुगतान

पुलिस के अनुसार, सुमित ये सक्रिय ई-सिम प्रवीण श्रीवास्तव को ₹325 प्रति सिम की दर से बेचता था। प्रवीण श्रीवास्तव इन्हें टेलीग्राम के माध्यम से विदेशी साइबर अपराधियों को लगभग 50 यूएसडीटी प्रति ई-सिम की दर पर उपलब्ध कराता था। भुगतान क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिए लिया जाता था।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में क्रिप्टो-सक्षम साइबर अपराध के मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है और जाँच एजेंसियाँ डिजिटल संपत्ति ट्रेसिंग में क्षमता बढ़ा रही हैं।

कंबोडिया आधारित गिरोहों से कनेक्शन

पुलिस ने बताया कि इन भारतीय मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल मुख्य रूप से कंबोडिया स्थित साइबर अपराधी गिरोहों द्वारा डिजिटल अरेस्ट स्कैम, निवेश धोखाधड़ी, ट्रेडिंग फ्रॉड और ओटीपी फ्रॉड जैसे अपराधों में किया जा रहा था। भारतीय नागरिकों के नाम पर जारी नंबरों के ज़रिए विदेशी अपराधी खुद को भारत में सक्रिय दिखाने और जाँच एजेंसियों से बचने की कोशिश करते थे।

गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है — कंबोडिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से संचालित डिजिटल अरेस्ट स्कैम पिछले दो वर्षों में भारत में तेज़ी से फैले हैं। आगे की जाँच जारी है और पुलिस इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो ई-केवाईसी प्रणाली की निगरानी पर गंभीर सवाल उठते हैं। दूरसंचार विभाग और टेलीकॉम कंपनियों को यह बताना होगा कि एक ही दस्तावेज़ पर दो सिम सक्रिय होने पर स्वचालित अलर्ट क्यों नहीं आया। जब तक वितरण श्रृंखला में यह खामी बंद नहीं होती, ऑपरेशन चाहे जितने हों — अपराधी नए एजेंट खोज लेंगे।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखनऊ ई-सिम एक्टिवेशन फ्रॉड क्या है?
लखनऊ में एक जियो पीओएस एजेंट ग्राहकों के ई-केवाईसी दस्तावेज़ों का दुरुपयोग कर गुप्त रूप से दूसरे सिम सक्रिय करता था और उन्हें ई-सिम में बदलकर कंबोडिया स्थित साइबर अपराधियों को बेचता था। इन नंबरों का इस्तेमाल 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम सहित कई तरह की साइबर ठगी में होता था।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम कैसे काम करता है?
साइबर अपराधी पीड़ित को फोन कर खुद को सरकारी अधिकारी बताते हैं और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोपों का डर दिखाते हैं। फिर पीड़ित को वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' में रखकर लगातार मानसिक दबाव से बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई जाती है।
इस मामले में कितनी राशि की ठगी हुई और पुलिस ने कितनी वापस कराई?
पुलिस के अनुसार, पीड़ित से कुल ₹70 लाख चार अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कराए गए। जाँच के दौरान पुलिस ने तीन बैंक खातों में ₹35 लाख की राशि फ्रीज करा दी है।
गिरफ्तार आरोपी कौन हैं और उनकी भूमिका क्या थी?
मुख्य आरोपी सुमित कुमार रावत अधिकृत जियो सिम विक्रेता था जो दोहरे सिम बनाता था। ईशु यादव ने उसे करीब 100 ब्लैंक एयरटेल सिम उपलब्ध कराए। तीसरा व्यक्ति प्रवीण श्रीवास्तव इन ई-सिम को टेलीग्राम के ज़रिए विदेशी अपराधियों को बेचता था।
इन भारतीय सिम का विदेशी अपराधी किस तरह इस्तेमाल करते थे?
कंबोडिया स्थित साइबर गिरोह इन भारतीय नंबरों का उपयोग डिजिटल अरेस्ट स्कैम, निवेश धोखाधड़ी, ट्रेडिंग फ्रॉड और ओटीपी फ्रॉड में करते थे। भारतीय नंबरों से वे खुद को भारत में सक्रिय दिखाकर जाँच एजेंसियों की पकड़ से बचने की कोशिश करते थे।
राष्ट्र प्रेस
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