मां नंदा देवी: उत्तराखंड की आराध्य देवी जो हैं हिमालय की बेटी और शिव की अर्धांगिनी
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड की देवभूमि में मां नंदा देवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि यहाँ की जनता की अपनी बेटी हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में पूजी जाने वाली मां नंदा देवी कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आस्था का केंद्र हैं। उनकी पूजा में श्रद्धा के साथ-साथ एक गहरा भावनात्मक अपनापन भी झलकता है, जो उन्हें अन्य देवियों से विशिष्ट बनाता है।
मां नंदा देवी का स्वरूप और महत्व
मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा देवी को माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। उनका नाम 'नंदा' संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है 'आनंद देने वाली'। वे संपूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति और आस्था की धुरी हैं तथा हिमालय की संरक्षक देवी के रूप में भी पूजी जाती हैं। उत्तराखंड के कण-कण में उनकी उपस्थिति महसूस की जाती है।
मुख्यमंत्री धामी ने किया मंदिर का उल्लेख
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अल्मोड़ा स्थित मां नंदा देवी मंदिर का भव्य वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा, 'अल्मोड़ा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक मां नंदा देवी का पावन मंदिर श्रद्धा, आस्था और विश्वास का दिव्य केंद्र है। पर्वतीय शिल्पकला से सुसज्जित यह प्राचीन मंदिर आदिशक्ति भगवती मां नंदा देवी को समर्पित है। आप भी अल्मोड़ा जनपद आगमन पर मां नंदा देवी के दर्शन अवश्य करें।' यह पोस्ट पर्यटन और आस्था दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नंदा राजजात यात्रा — हर 12 साल में बेटी की विदाई
मान्यता है कि मां नंदा देवी हर 12 वर्ष में अपने मायके नौटी गांव (चमोली) आती हैं। इस अवसर पर नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होता है, जो 280 किलोमीटर की अत्यंत दुर्गम पदयात्रा है। यह यात्रा नौटी गांव से प्रारंभ होकर होमकुंड तक जाती है और देवी के मायके से ससुराल कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान की प्रतीक है।
इस यात्रा की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसका नेतृत्व एक चार सींग वाले काले मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) द्वारा किया जाता है, जिसे देवी का वाहन माना जाता है। यह यात्रा उत्तराखंड की सबसे बड़ी धार्मिक परंपराओं में से एक है और देश-विदेश के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
नंदा अष्टमी — केले की मूर्तियों से होती है पूजा
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को नंदा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व की विशेषता यह है कि केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा की जाती है। यह परंपरा उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। पूरे प्रदेश में इस दिन बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ उत्सव मनाया जाता है।
आगे का महत्व
मां नंदा देवी की यह परंपरा और आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्तराखंड की पहचान को जीवित रखती है। अल्मोड़ा स्थित उनका प्राचीन मंदिर, पर्वतीय शिल्पकला का अनुपम उदाहरण होने के साथ-साथ, राज्य के धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र भी बनता जा रहा है।