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मां नंदा देवी: उत्तराखंड की आराध्य देवी जो हैं हिमालय की बेटी और शिव की अर्धांगिनी

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मां नंदा देवी: उत्तराखंड की आराध्य देवी जो हैं हिमालय की बेटी और शिव की अर्धांगिनी

सारांश

उत्तराखंड में मां नंदा देवी सिर्फ देवी नहीं — वे इस देवभूमि की बेटी हैं। हर 12 साल में 280 किमी की दुर्गम नंदा राजजात यात्रा उनकी विदाई का प्रतीक है। मुख्यमंत्री धामी ने एक्स पर अल्मोड़ा मंदिर का वीडियो साझा कर इस आस्था को राष्ट्रीय मंच दिया।

मुख्य बातें

मां नंदा देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी (माता पार्वती का स्वरूप) माना जाता है।
वे कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आस्था का केंद्र हैं।
हर 12 वर्ष में नंदा राजजात यात्रा आयोजित होती है — 280 किलोमीटर की पदयात्रा, नौटी गांव (चमोली) से होमकुंड तक।
यात्रा का नेतृत्व चार सींग वाले काले मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) द्वारा किया जाता है।
नंदा अष्टमी पर केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियाँ बनाकर पूजा की जाती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अल्मोड़ा के प्राचीन नंदा देवी मंदिर का वीडियो एक्स पर साझा किया।

उत्तराखंड की देवभूमि में मां नंदा देवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि यहाँ की जनता की अपनी बेटी हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में पूजी जाने वाली मां नंदा देवी कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आस्था का केंद्र हैं। उनकी पूजा में श्रद्धा के साथ-साथ एक गहरा भावनात्मक अपनापन भी झलकता है, जो उन्हें अन्य देवियों से विशिष्ट बनाता है।

मां नंदा देवी का स्वरूप और महत्व

मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा देवी को माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। उनका नाम 'नंदा' संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है 'आनंद देने वाली'। वे संपूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति और आस्था की धुरी हैं तथा हिमालय की संरक्षक देवी के रूप में भी पूजी जाती हैं। उत्तराखंड के कण-कण में उनकी उपस्थिति महसूस की जाती है।

मुख्यमंत्री धामी ने किया मंदिर का उल्लेख

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अल्मोड़ा स्थित मां नंदा देवी मंदिर का भव्य वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा, 'अल्मोड़ा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक मां नंदा देवी का पावन मंदिर श्रद्धा, आस्था और विश्वास का दिव्य केंद्र है। पर्वतीय शिल्पकला से सुसज्जित यह प्राचीन मंदिर आदिशक्ति भगवती मां नंदा देवी को समर्पित है। आप भी अल्मोड़ा जनपद आगमन पर मां नंदा देवी के दर्शन अवश्य करें।' यह पोस्ट पर्यटन और आस्था दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

नंदा राजजात यात्रा — हर 12 साल में बेटी की विदाई

मान्यता है कि मां नंदा देवी हर 12 वर्ष में अपने मायके नौटी गांव (चमोली) आती हैं। इस अवसर पर नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होता है, जो 280 किलोमीटर की अत्यंत दुर्गम पदयात्रा है। यह यात्रा नौटी गांव से प्रारंभ होकर होमकुंड तक जाती है और देवी के मायके से ससुराल कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान की प्रतीक है।

इस यात्रा की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसका नेतृत्व एक चार सींग वाले काले मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) द्वारा किया जाता है, जिसे देवी का वाहन माना जाता है। यह यात्रा उत्तराखंड की सबसे बड़ी धार्मिक परंपराओं में से एक है और देश-विदेश के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

नंदा अष्टमी — केले की मूर्तियों से होती है पूजा

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को नंदा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व की विशेषता यह है कि केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा की जाती है। यह परंपरा उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। पूरे प्रदेश में इस दिन बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ उत्सव मनाया जाता है।

आगे का महत्व

मां नंदा देवी की यह परंपरा और आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्तराखंड की पहचान को जीवित रखती है। अल्मोड़ा स्थित उनका प्राचीन मंदिर, पर्वतीय शिल्पकला का अनुपम उदाहरण होने के साथ-साथ, राज्य के धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र भी बनता जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक पहचान का दस्तावेज़ है — जहाँ देवी को 'बेटी' कहना एक भावनात्मक स्वामित्व का बोध कराता है, जो मैदानी भारत की पूजा-पद्धति से गुणात्मक रूप से अलग है। नंदा राजजात यात्रा की 280 किलोमीटर की दुर्गमता यह भी बताती है कि हिमालयी समाज ने अपनी आस्था को कभी सुविधाजनक नहीं बनाया। मुख्यमंत्री धामी का एक्स पोस्ट इस परंपरा को डिजिटल दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या राज्य सरकार इस अनूठी धार्मिक विरासत के संरक्षण और पर्यटन विकास में उतनी ही निवेश करती है जितनी सोशल मीडिया पर दिखती है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मां नंदा देवी कौन हैं और उन्हें उत्तराखंड में क्यों पूजा जाता है?
मां नंदा देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उन्हें 'आनंद देने वाली देवी' के रूप में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में पूजा जाता है और वे उत्तराखंड की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पहचान का केंद्र हैं।
नंदा राजजात यात्रा क्या है और यह कब होती है?
नंदा राजजात यात्रा हर 12 वर्ष में एक बार आयोजित होने वाली 280 किलोमीटर की दुर्गम पदयात्रा है। यह नौटी गांव (चमोली) से होमकुंड तक जाती है और देवी नंदा के मायके से ससुराल कैलाश पर्वत जाने की विदाई का प्रतीक मानी जाती है।
नंदा राजजात यात्रा में चार सींग वाले मेढ़े का क्या महत्व है?
यात्रा का नेतृत्व एक विशेष चार सींग वाले काले मेढ़े — जिसे 'चौसिंग्या खाडू' कहा जाता है — द्वारा किया जाता है। इसे देवी नंदा का वाहन माना जाता है और यह इस यात्रा की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक है।
नंदा अष्टमी कब और कैसे मनाई जाती है?
नंदा अष्टमी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा की जाती है, जो उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
अल्मोड़ा स्थित नंदा देवी मंदिर पर्वतीय शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है और अल्मोड़ा की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में इस मंदिर का वीडियो एक्स पर साझा कर श्रद्धालुओं को दर्शन का आमंत्रण दिया।
राष्ट्र प्रेस
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