मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण: उमंग सिंघार ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
सारांश
मुख्य बातें
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 17 अक्टूबर 2026 को प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ सुनिश्चित कराने के लिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आवश्यक संवैधानिक एवं विधिक कार्यवाही किए जाने का आग्रह किया है। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि ओबीसी वर्ग को सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक न्याय दिलाने तथा शासन-प्रशासन में उसकी समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि: 27% आरक्षण का विधिक इतिहास
वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का अध्यादेश पारित किया था। इस निर्णय को बाद में न्यायालय में चुनौती दी गई और हाल ही में उच्च न्यायालय ने सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया। गौरतलब है कि यह मामला अब मोहन यादव सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) दाखिल करने के बाद उच्चतम न्यायिक स्तर पर पहुँच चुका है।
सिंघार की प्रमुख माँगें
नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में कई ठोस माँगें रखी हैं। उन्होंने आग्रह किया कि ओबीसी आरक्षण संबंधी प्रावधानों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की संभावनाओं पर विचार किया जाए और इसके लिए केंद्र सरकार के समक्ष आवश्यक पहल की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि ओबीसी समुदाय की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति से जुड़े अद्यतन एवं विश्वसनीय आँकड़ों के आधार पर विधिक प्रस्ताव तैयार किए जाने चाहिए।
सिंघार ने यह भी माँग की कि उच्च न्यायालय के संबंधित निर्णयों और लागू संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप उपलब्ध विधिक विकल्पों पर गंभीरता से विचार हो, ताकि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ सुनिश्चित करने की दिशा में प्रभावी कार्यवाही संभव हो सके।
राज्य शासन से समयबद्ध कार्यवाही का आग्रह
नेता प्रतिपक्ष ने इस पूरे प्रकरण में राज्य शासन द्वारा की गई कार्यवाही की समीक्षा करने और मामले के शीघ्र एवं समयबद्ध निराकरण के लिए ठोस पहल करने का आग्रह किया। उन्होंने आशा जताई कि राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री मोहन यादव इस महत्वपूर्ण सामाजिक न्याय के विषय पर संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप आवश्यक कदम उठाएंगे।
विधिक स्थिति और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब मोहन यादव सरकार पहले से ही उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दायर कर चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल होने पर आरक्षण प्रावधानों को न्यायिक समीक्षा से कुछ हद तक संरक्षण मिल सकता है, हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में स्पष्ट किया है कि नौवीं अनुसूची के प्रावधान भी मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं। ओबीसी आरक्षण का यह मामला मध्यप्रदेश की राजनीति में लंबे समय से केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है और अब विपक्ष ने इसे फिर से सियासी एजेंडे में सबसे ऊपर रखने की कोशिश की है।