4 अक्टूबर 2026
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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: रजत मुकुट और पुष्पों से सुसज्जित बाबा महाकाल, देशभर से उमड़े श्रद्धालु

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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: रजत मुकुट और पुष्पों से सुसज्जित बाबा महाकाल, देशभर से उमड़े श्रद्धालु

सारांश

आश्विन कृष्ण नवमी पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ। रजत मुकुट, मोगरे-गुलाब के पुष्प और भांग की माला से सुसज्जित बाबा महाकाल के साकार दर्शन के लिए देशभर से हज़ारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचे और 'हर हर महादेव' के जयकारों से परिसर गुंजायमान रहा।

मुख्य बातें

4 अक्टूबर 2026 को आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में भस्म आरती का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
बाबा महाकाल को रजत मुकुट, अंजीर माला और भांग की माला से अलंकृत किया गया; मोगरे-गुलाब के पुष्पों से विशेष श्रृंगार हुआ।
परंपरानुसार भगवान वीरभद्र की आज्ञा के बाद ढोल-नगाड़ों व शंखनाद से कपाट खुले; पंचामृत अभिषेक के बाद श्रृंगार संपन्न किया गया।
महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से पवित्र भस्म अर्पित की गई, जिसके बाद भस्म आरती प्रारंभ हुई।
देशभर से हज़ारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचे और 'जय श्री महाकाल' व 'हर हर महादेव' के उद्घोष से मंदिर परिसर गुंजायमान रहा।

उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 4 अक्टूबर 2026 को आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर भोर में भस्म आरती का भव्य अनुष्ठान संपन्न हुआ। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले बाबा महाकाल के दिव्य श्रृंगार के दर्शन को देश के कोने-कोने से आए हज़ारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में एकत्र हुए। 'जय श्री महाकाल' और 'हर हर महादेव' के उद्घोष से पूरा परिसर गुंजायमान रहा।

परंपरागत विधि से खुले मंदिर के कपाट

सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, सर्वप्रथम भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के बीच मंदिर के कपाट खोले गए। प्रातःकाल पट खुलते ही गर्भगृह में पुजारी-पुरोहितों ने विधि-विधान से पूजन का शुभारंभ किया। सबसे पहले प्रथम घंटाल बजाकर बाबा को हरिओम जल अर्पित किया गया।

इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से भगवान का पवित्र अभिषेक किया गया। यह अनुष्ठान महाकालेश्वर मंदिर की दैनिक उपासना परंपरा का अभिन्न अंग है, जो पीढ़ियों से अनवरत जारी है।

रजत मुकुट और पुष्पों से हुआ अलौकिक श्रृंगार

अभिषेक के उपरांत बाबा महाकाल का विहंगम श्रृंगार किया गया। पुजारियों ने भांग, चंदन और सिंदूर से बाबा को अलंकृत किया। इसके पश्चात मोगरे और गुलाब जैसे सुगंधित पुष्पों से विशेष श्रृंगार संपन्न किया गया।

बाबा महाकाल ने रजत मुकुट, अंजीर माला और भांग की माला धारण की। फूलों से निर्मित सुगंधित मालाएं भी भगवान को समर्पित की गईं। फल, सूखे मेवे और मिष्ठान का भोग लगाकर पूजन को विशेष बनाया गया।

महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा भस्म अर्पण और आरती

इससे पूर्व महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई, जिसके बाद भस्म आरती का शुभारंभ हुआ। जैसे ही भस्म रमाने के पश्चात बाबा महाकाल के साकार रूप के दर्शन हुए, पूरा प्रांगण भक्ति में डूब गया।

झांझ-मंजीरों, ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के बीच संपन्न इस आरती को देखकर हज़ारों श्रद्धालु भावविभोर हो गए और हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए। गौरतलब है कि महाकाल मंदिर की भस्म आरती की यह परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहरी धार्मिक मान्यता वाली है।

भस्म आरती की धार्मिक महत्ता

मान्यता के अनुसार, भस्म अर्पित होने के बाद ही बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही अलौकिक आस्था देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं को उज्जैन खींच लाती है। यह ऐसे समय में आया है जब नवरात्रि के समीप धार्मिक उत्सवों का वातावरण पूरे मध्य भारत में बना हुआ है, और महाकालेश्वर मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।

आने वाले दिनों में नवरात्रि और अन्य धार्मिक पर्वों के मद्देनज़र मंदिर प्रशासन की ओर से और अधिक श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना जताई जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का केंद्रबिंदु है जो नवरात्रि जैसे पर्वों के आसपास लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब धार्मिक पर्यटन मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार बनता जा रहा है। मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाएं और सुरक्षा मानक कड़े बने रहें।
RashtraPress
4 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है और यह क्यों खास है?
भस्म आरती महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन की सबसे प्राचीन और पवित्र परंपराओं में से एक है, जिसमें महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद ही भगवान निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, इसीलिए यह आरती देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
4 अक्टूबर 2026 को भस्म आरती में बाबा महाकाल का श्रृंगार कैसे किया गया?
4 अक्टूबर 2026 को बाबा महाकाल को भांग, चंदन और सिंदूर से अलंकृत किया गया। इसके बाद मोगरे और गुलाब के पुष्पों से विशेष श्रृंगार हुआ और बाबा ने रजत मुकुट, अंजीर माला तथा भांग की माला धारण की; साथ ही फल, सूखे मेवे और मिष्ठान का भोग लगाया गया।
महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती में कपाट खुलने की परंपरा क्या है?
परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम भगवान वीरभद्र की आज्ञा ली जाती है, उसके बाद ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के साथ मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। कपाट खुलते ही पुजारी-पुरोहित गर्भगृह में विधि-विधान से पूजन प्रारंभ करते हैं और हरिओम जल तथा पंचामृत से अभिषेक करते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए कहाँ-कहाँ से श्रद्धालु आते हैं?
महाकालेश्वर मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण देश के हर कोने के साथ-साथ विदेशों से भी श्रद्धालु यहाँ आते हैं। भस्म आरती की अलौकिक परंपरा इसे विशेष रूप से आकर्षक बनाती है, और नवरात्रि जैसे पर्वों के आसपास आगमन और भी बड़ी संख्या में होता है।
महाकालेश्वर मंदिर कहाँ स्थित है और इसका क्या महत्व है?
महाकालेश्वर मंदिर मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है और यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, जो इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करता है और इसे भारत के सबसे प्रमुख शैव तीर्थस्थलों में स्थान दिलाता है।
राष्ट्र प्रेस
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