3 सितंबर 2026
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महाराष्ट्र सहकारी चीनी मिलों को ₹2,000 करोड़ का सॉफ्ट लोन, गन्ना किसानों के बकाये का होगा समाधान

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महाराष्ट्र सहकारी चीनी मिलों को ₹2,000 करोड़ का सॉफ्ट लोन, गन्ना किसानों के बकाये का होगा समाधान

सारांश

महाराष्ट्र सरकार ₹2,000 करोड़ की सॉफ्ट लोन योजना और व्यापक उप-उत्पाद नीति के ज़रिए सहकारी चीनी मिलों को संकट से उबारने की कोशिश कर रही है — यह सिर्फ राहत पैकेज नहीं, बल्कि चीनी उद्योग को एथेनॉल, ग्रीन हाइड्रोजन और SAF की ओर ले जाने का दीर्घकालिक दाँव भी है।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र सरकार सहकारी चीनी मिलों के लिए ₹2,000 करोड़ की कम ब्याज वाली सॉफ्ट लोन योजना लाने की तैयारी में है।
ऋण चुकाने के लिए 7 वर्ष का समय; राज्य सरकार प्रतिवर्ष लगभग ₹100 करोड़ का ब्याज वहन करेगी।
फंड डीसीसीबी और एमएससीबी के माध्यम से प्रत्येक मिल की पेराई क्षमता की समीक्षा के बाद दिया जाएगा।
मिलों पर पिछले पेराई सीजन का किसानों का लगभग ₹200 करोड़ का बकाया है।
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने एथेनॉल, CBG, ग्रीन हाइड्रोजन और SAF पर केंद्रित व्यापक उप-उत्पाद नीति बनाने के निर्देश दिए।
गन्ने की खेती राज्य की कृषि भूमि का 4% है, लेकिन सिंचाई जल का 60-70% उपयोग करती है।

महाराष्ट्र सरकार राज्य की आर्थिक संकट में फँसी सहकारी चीनी मिलों को राहत देने के लिए ₹2,000 करोड़ की कम ब्याज वाली सॉफ्ट लोन योजना लाने की तैयारी में है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इस प्रस्ताव को शीघ्र राज्य कैबिनेट के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाए। इस योजना का उद्देश्य गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और मिलों को आगामी पेराई सीजन के लिए तैयार करना है।

योजना की मुख्य संरचना

प्रस्तावित योजना के अंतर्गत पात्र सहकारी चीनी मिलों को ₹2,000 करोड़ का कम ब्याज वाला ऋण कोष उपलब्ध कराया जाएगा। ऋण चुकाने के लिए मिलों को 7 वर्ष का समय दिया जाएगा और राज्य सरकार प्रतिवर्ष लगभग ₹100 करोड़ के ब्याज का बोझ स्वयं वहन करेगी।

यह फंड प्रत्येक कारखाने की गन्ना पेराई क्षमता और वित्तीय स्थिति की समीक्षा के बाद जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (डीसीसीबी) और महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) के माध्यम से वितरित किया जाएगा। यह ढाँचा केंद्र सरकार की मौजूदा नीति पर आधारित बताया जा रहा है।

संकट की पृष्ठभूमि

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब राज्य की चीनी मिलें गंभीर वित्तीय दबाव में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पिछले पेराई सीजन से किसानों का लगभग ₹200 करोड़ का बकाया अभी भी मिलों पर चढ़ा हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) व्यवस्था के तहत कारखानों को गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान करना अनिवार्य है। हालाँकि, घरेलू चीनी बिक्री से मिलने वाली आय और FRP भुगतान की बाध्यता के बीच असंतुलन के कारण कार्यशील पूंजी की कमी बार-बार समस्या बन जाती है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में गन्ने की खेती राज्य की कुल कृषि भूमि का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन यह सिंचाई जल का 60 से 70 प्रतिशत तक उपयोग करती है — जो फसल विविधीकरण और ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य बनाने की बहस को लगातार हवा देता रहा है।

उप-उत्पाद नीति: विविधीकरण की ओर कदम

उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने मंगलवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में चीनी उद्योग की कच्ची चीनी पर निर्भरता घटाने के लिए एक व्यापक उप-उत्पाद नीति तैयार करने के निर्देश दिए। इस रोडमैप के तहत सौर ऊर्जा, को-जनरेशन बिजली, प्रथम और द्वितीय पीढ़ी (1G और 2G) एथेनॉल, कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG), ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) जैसे वैकल्पिक क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।

पवार ने कहा कि मूल्य संवर्धित उप-उत्पादों में विविधीकरण से उद्योग की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती बढ़ेगी, आय के नए स्रोत विकसित होंगे और गन्ना किसानों को मौसमी मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।

बायोरिफाइनरी मॉडल की ओर उद्योग का रुझान

सूत्रों के अनुसार, चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने के लिए चीनी मिलें अब एकीकृत बायोरिफाइनरी मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। भारत के एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत बी-हेवी मोलासेस और सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल उत्पादन पर सफेद चीनी की बिक्री की तुलना में नकदी प्रवाह अधिक तेज़ी से प्राप्त होता है। इसके साथ ही, गन्ने की प्रसंस्करण के बाद बची रेशेदार सामग्री बैगास का उपयोग नवीकरणीय बिजली उत्पादन के लिए किया जा रहा है।

सहकारी चीनी कारखानों के सूत्रों ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि CBG, ग्रीन हाइड्रोजन और SAF जैसे क्षेत्रों में विस्तार राज्य सरकार की उस व्यापक योजना के अनुरूप है जो चीनी कारखानों के राजस्व मॉडल को पारंपरिक चीनी उत्पादन से आगे बढ़ाकर बहुआयामी बनाना चाहती है।

आगे की राह

अब सबकी नज़रें राज्य कैबिनेट की बैठक पर टिकी हैं, जहाँ इस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी मिलनी है। अधिक उत्पादन वाले वर्षों में चीनी की कीमतों में गिरावट और किसानों के बकाये की पुरानी समस्या को देखते हुए, इस योजना की सफलता काफी हद तक इसके क्रियान्वयन की गति और पारदर्शिता पर निर्भर करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 करोड़ की यह योजना तात्कालिक राहत तो देती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह उस ढाँचागत असंतुलन को दूर करती है जो FRP भुगतान की बाध्यता और घरेलू चीनी मूल्य अस्थिरता के बीच दशकों से बना हुआ है। राज्य सरकार हर बड़े संकट में इसी तरह के ऋण हस्तक्षेप करती रही है, लेकिन बकाये की समस्या बार-बार लौटती है। उप-उत्पाद नीति का विचार सही दिशा में है — एथेनॉल और बायोगैस से नकदी प्रवाह तेज़ होता है — पर इसका लाभ तभी मिलेगा जब क्रियान्वयन में पारदर्शिता हो और छोटी मिलों को भी समान अवसर मिले, जो अब तक बड़े कारखानों के मुकाबले पिछड़ती रही हैं।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र सरकार की सहकारी चीनी मिलों के लिए सॉफ्ट लोन योजना क्या है?
यह एक प्रस्तावित ₹2,000 करोड़ का कम ब्याज वाला ऋण कोष है जो पात्र सहकारी चीनी मिलों को डीसीसीबी और एमएससीबी के माध्यम से दिया जाएगा। ऋण चुकाने के लिए 7 वर्ष का समय होगा और राज्य सरकार प्रतिवर्ष लगभग ₹100 करोड़ का ब्याज वहन करेगी।
इस योजना की ज़रूरत क्यों पड़ी?
राज्य की चीनी मिलों पर पिछले पेराई सीजन का किसानों का लगभग ₹200 करोड़ का बकाया है। FRP व्यवस्था के तहत 14 दिनों में भुगतान अनिवार्य है, लेकिन घरेलू चीनी बिक्री से आय और इस बाध्यता के बीच असंतुलन के कारण कार्यशील पूंजी की कमी बार-बार समस्या बनती है।
उप-उत्पाद नीति में क्या शामिल होगा?
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के निर्देश पर तैयार होने वाली इस नीति में सौर ऊर्जा, को-जनरेशन बिजली, 1G और 2G एथेनॉल, कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG), ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) जैसे क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसका लक्ष्य मिलों की कच्ची चीनी पर निर्भरता घटाना है।
इस योजना से गन्ना किसानों को क्या फायदा होगा?
इस फंड से मिलें किसानों का बकाया चुका सकेंगी और आगामी पेराई सीजन के लिए आसानी से तैयारी कर सकेंगी। उप-उत्पाद विविधीकरण से मिलों की आय के नए स्रोत बनेंगे, जिससे मौसमी मूल्य अस्थिरता के बावजूद किसानों को समय पर भुगतान की संभावना बढ़ेगी।
यह प्रस्ताव कब तक मंजूर होगा?
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने अधिकारियों को तुरंत औपचारिक प्रस्ताव राज्य कैबिनेट के समक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही योजना की अधिकृत तिथि और क्रियान्वयन की रूपरेखा सामने आएगी।
राष्ट्र प्रेस
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