महाराष्ट्र फसल ऋण माफी योजना वित्त वर्ष 2026-27 तक बढ़ी, ₹2 लाख से अधिक बकाया किसानों को भी राहत
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शुक्रवार, 10 जुलाई को राज्य की संशोधित फसल ऋण माफी योजना का ऐलान किया, जिसके तहत पात्र डिफॉल्ट की कटऑफ तिथि को वित्त वर्ष 2025-26 से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2026-27 तक कर दिया गया है। मुंबई में राज्य विधानसभा में पिछले सप्ताह के प्रस्ताव पर हुई बहस के जवाब में की गई यह घोषणा संकटग्रस्त किसानों को निजी साहूकारों के चंगुल से बचाने और बैंकिंग प्रणाली से जोड़े रखने के उद्देश्य से की गई है।
संशोधित योजना में क्या बदला
नई पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर ऋण माफी योजना अपनी पूर्ववर्ती महात्मा फुले ऋण माफी योजना की सबसे बड़ी खामी को दूर करती है। पुरानी योजना में माफी की अधिकतम सीमा ₹2 लाख थी और यदि किसी किसान पर इससे एक रुपया भी अधिक बकाया होता, तो वह योजना के किसी भी लाभ से पूरी तरह वंचित हो जाता था।
संशोधित योजना इस कठोर 'ऑल-ऑर-नथिंग' बाधा को हटा देती है। अब ₹2 लाख से अधिक बकाया वाले किसान भी राहत के पात्र होंगे, बशर्ते वे अतिरिक्त राशि का स्वयं भुगतान कर दें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि वे भविष्य में बैंकिंग सुविधाओं से वंचित न रहें।
पैकेज में क्या-क्या शामिल
इस व्यापक राहत पैकेज के तीन मुख्य घटक हैं — पूर्ण कृषि ऋण माफी, एकमुश्त निपटान (ओटीएस) का विकल्प, और नियमित रूप से बकाया चुकाने वाले किसानों के लिए प्रोत्साहन बोनस। राज्य सरकार के अनुसार, यह तीन-स्तरीय ढाँचा किसानों को संस्थागत ऋण प्रणाली से जोड़े रखने की दिशा में एक संरचनात्मक कदम है।
राजनीतिक विवाद और सरकार का पक्ष
घोषणा के समय को लेकर विपक्ष ने चुनावी लाभ का आरोप लगाया। इसे खारिज करते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा, 'हम 2029 तक इंतजार कर सकते थे, लेकिन हमने कार्रवाई करने का फैसला किया क्योंकि हमारे किसान गहरे संकट में हैं।'
विपक्ष के इस दावे को — कि इस योजना से केवल 12,000 से 13,000 किसानों को ही लाभ होगा और 36 लाख अन्य किसानों की अनदेखी की जाएगी — राज्य सरकार ने पूरी तरह निराधार बताया है। हालाँकि, सरकार ने अभी तक संभावित लाभार्थियों की अपनी अनुमानित संख्या सार्वजनिक नहीं की है।
ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि महाराष्ट्र में कृषि ऋण माफी कोई नई परिघटना नहीं है। राज्य ने 2017 में भी एक बड़ी ऋण माफी योजना लागू की थी, जो उस समय देश की सबसे बड़ी राज्य-स्तरीय माफियों में से एक थी। आलोचकों का कहना है कि बार-बार की जाने वाली माफियाँ किसानों में 'क्रेडिट कल्चर' को कमज़ोर करती हैं और बैंकों की बैलेंस शीट पर दबाव डालती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में किसान आत्महत्याओं की दर चिंताजनक बनी हुई है।
आगे क्या होगा
संशोधित योजना के क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा और लाभार्थी सूचीकरण की प्रक्रिया अभी घोषित होनी बाकी है। किसान संगठनों ने योजना का स्वागत करते हुए माँग की है कि पारदर्शी सत्यापन तंत्र सुनिश्चित किया जाए, ताकि वास्तविक जरूरतमंद किसान लाभ से न चूकें।