महाराष्ट्र कर्जमाफी योजना से 34 लाख किसान बाहर, शिवसेना (यूबीटी) ने सरकार पर लगाया छलावे का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार की पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर शेतकरी कर्जमुक्ति योजना के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच गहरी खाई उजागर होने के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने मंगलवार, 9 जून को महाराष्ट्र सरकार पर तीखा हमला बोला। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार कर्ज में डूबे किसानों के साथ वही छल कर रही है जो उसने लाडकी बहिन योजना की लाभार्थी महिलाओं के साथ किया था।
सरकारी दावे बनाम असली तस्वीर
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय के अनुसार, राज्य में कुल 1.25 करोड़ किसान हैं। सरकार का दावा है कि उसने 55 लाख किसानों का ₹2 लाख तक का फसल ऋण माफ किया है, जो कुल ₹36,585 करोड़ का राहत पैकेज बनता है। लेकिन संपादकीय में तर्क दिया गया कि इन 55 लाख लाभार्थियों और आयकर देने वाले 6 लाख किसानों को हटाने के बाद भी 34 लाख किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं और राहत की प्रतीक्षा में हैं।
योजना की संरचनात्मक खामियाँ
पार्टी ने उन प्रमुख शर्तों को रेखांकित किया जो बड़ी संख्या में किसानों को अयोग्य बनाती हैं। यह योजना केवल 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2025 के बीच लिए गए फसल ऋण और पुनर्गठित ऋणों तक सीमित है। इसके चलते पशुपालन या खेती से जुड़े अन्य कार्यों के लिए कर्ज लेने वाले लाखों किसान स्वतः अयोग्य हो जाते हैं।
इसके अलावा, जिन 32 लाख से अधिक किसानों को 2019 में तत्कालीन महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार की महात्मा ज्योतिबा फुले कर्ज माफी योजना का लाभ मिला था, उन्हें नई योजना के तहत पूर्ण राहत से वंचित कर दिया गया है। उन्हें केवल ₹50,000 का 'प्रोत्साहन भत्ता' दिया जा रहा है। संपादकीय में उद्धृत जानकारों का कहना है कि यदि यह वास्तव में प्रोत्साहन होता, तो यह राशि कम से कम ₹1 लाख होनी चाहिए थी।
किसान विधवाओं और आत्महत्या पीड़ित परिवारों की अनदेखी
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि नई नीति उन किसानों की विधवाओं या आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों के लिए कोई विशेष आर्थिक प्रावधान या रियायत देने में पूरी तरह विफल रही है। संपादकीय के अनुसार, जटिल पात्रता मानदंडों के कारण राज्य के 50 प्रतिशत से अधिक किसान इस योजना के लाभ से वंचित रह जाएंगे।
लाडकी बहिन योजना से तुलना
ठाकरे गुट ने इस पैटर्न को लाडकी बहिन योजना से जोड़ा। विधानसभा चुनावों से पहले सत्ताधारी गठबंधन ने महिलाओं को मासिक सहायता ₹1,500 से बढ़ाकर ₹2,100 करने का वादा किया था। लेकिन चुनाव बाद अनिवार्य ई-केवाईसी सत्यापन की शर्त लागू कर लगभग 80 लाख महिलाओं को योजना से बाहर कर दिया गया। 'सामना' के संपादकीय में कहा गया, 'अब किसान समुदाय के साथ भी ठीक यही तरीका अपनाया जा रहा है — ₹2 लाख की कर्जमाफी को सरकारी कागजी कार्रवाई और नियमों के जाल में उलझाकर, प्रशासन ने लाखों गरीब और कर्ज में डूबे किसानों को अयोग्यता के चक्र में फंसा दिया है।'
सरकार की चुप्पी और आगे की राह
शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, सत्ताधारी गठबंधन के नेता, जिन्होंने पहले इस योजना का उत्साहपूर्वक जश्न मनाया था, अब 34 लाख किसानों के छूट जाने के सवाल पर मौन हैं। पार्टी ने यह भी दावा किया कि सरकारी अधिकारी निजी तौर पर मानते हैं कि कड़े अयोग्यता मानदंड सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए जानबूझकर बनाए गए हैं। यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब राज्य में किसान आत्महत्याओं की घटनाएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं और कृषि संकट गहराता जा रहा है।