एमपीएससी का बड़ा फैसला: पेपर लीक के बाद एफडीए ड्रग इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा रद्द, क्राइम ब्रांच जांच में हुआ खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) ने 26 अगस्त 2026 को फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) विभाग के ड्रग इंस्पेक्टर ग्रुप-बी भर्ती परीक्षा को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। मुंबई क्राइम ब्रांच की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में यह संकेत मिलने के बाद कि कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा से पूर्व ही प्रश्नपत्र उपलब्ध करा दिया गया था, आयोग ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को निरस्त करते हुए संबंधित विज्ञापन भी वापस ले लिया। आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस पद के लिए नई परीक्षा शीघ्र आयोजित की जाएगी।
भर्ती प्रक्रिया का पूरा घटनाक्रम
एमपीएससी ने 29 जुलाई 2025 को ड्रग इंस्पेक्टर ग्रुप-बी पद के लिए आधिकारिक विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद मार्च 2026 में महाराष्ट्र के छह विभागीय मुख्यालयों पर स्थित केंद्रों में ऑफलाइन मोड में स्क्रीनिंग परीक्षा संपन्न हुई। परीक्षा के बाद से ही अभ्यर्थियों में असंतोष की लहर थी और गड़बड़ी के आरोप सामने आने लगे थे।
शिकायतें और जांच की शुरुआत
परीक्षा के उपरांत कई अभ्यर्थियों ने पेपर लीक का आरोप लगाया। जुलाई 2026 में आयोग को ईमेल के माध्यम से अनेक शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें आरोप था कि कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र मिल गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए एमपीएससी ने 27 जुलाई 2026 को मुंबई पुलिस आयुक्त के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और जांच की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच को सौंपी गई।
क्राइम ब्रांच की रिपोर्ट में क्या निकला
क्राइम ब्रांच की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में कथित तौर पर यह तथ्य उभरकर सामने आया कि परीक्षा से पूर्व किसी उम्मीदवार तक प्रश्नपत्र पहुँचा था। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर एमपीएससी ने संपूर्ण भर्ती प्रक्रिया को निरस्त करने का निर्णय लिया। आयोग ने इस संबंध में आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की है।
एमपीएससी का पक्ष और आगे की राह
आयोग ने अपने बयान में कहा कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सर्वोच्च प्राथमिकता है। सभी योग्य अभ्यर्थियों को समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए दोबारा परीक्षा आयोजित की जाएगी। नई परीक्षा की तिथि और प्रक्रिया से संबंधित आधिकारिक सूचना जल्द जारी होने की उम्मीद है। यह घटना महाराष्ट्र में सरकारी भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर एक बार फिर सवाल खड़े करती है और आयोग पर निगरानी तंत्र को और सुदृढ़ करने का दबाव बढ़ाती है।