17 जुलाई 2026
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महाराष्ट्र में इच्छामृत्यु और जीवन इच्छा पत्र के नियम अब सरकारी व निजी अस्पतालों में लागू

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महाराष्ट्र में इच्छामृत्यु और जीवन इच्छा पत्र के नियम अब सरकारी व निजी अस्पतालों में लागू

सारांश

महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में इच्छामृत्यु और जीवन इच्छा पत्र के नियम लागू करने का आदेश दिया है। यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर आधारित है और मरीज़ों के 'गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार' को सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र सरकार ने 17 जुलाई 2026 को राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में इच्छामृत्यु व जीवन इच्छा पत्र के नियम अनिवार्य किए।
यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित दिशा-निर्देशों के अनुरूप है, जो गंभीर और लाइलाज बीमारी में मरीज़ की इच्छा के सम्मान को मान्यता देते हैं।
जीवन इच्छा पत्र के ज़रिये कोई व्यक्ति पहले से यह दर्ज कर सकता है कि लाइलाज स्थिति में उसे कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए।
नियमों के अनुपालन और निगरानी के लिए एक समिति का गठन किया गया है।
इस फैसले से सरकारी व निजी अस्पतालों में अंत्येष्टि देखभाल की प्रक्रिया में एकरूपता और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

महाराष्ट्र सरकार ने 17 जुलाई 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) और जीवन इच्छा पत्र (Living Will) से संबंधित नियमों को अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश दिया है। इस फैसले का उद्देश्य गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों के 'गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार' को सुनिश्चित करना है। यह कदम सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित दिशा-निर्देशों के अनुरूप उठाया गया है।

मुख्य घटनाक्रम

राज्य सरकार ने इस आदेश के साथ आवश्यक प्रक्रियाएँ तय करने और मामलों की निगरानी के लिए एक समिति का गठन भी किया है। अब तक ये नियम मुख्यतः सरकारी अस्पतालों तक सीमित थे, किंतु नए आदेश के बाद निजी अस्पतालों को भी इन्हें बाध्यकारी रूप से अपनाना होगा। इससे पूरे राज्य में उपचार के अंतिम चरण से जुड़े निर्णयों में एकरूपता आएगी।

जीवन इच्छा पत्र क्या है

जीवन इच्छा पत्र एक कानूनी दस्तावेज़ है, जिसमें कोई व्यक्ति पूर्व में यह लिखित रूप से दर्ज कर सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी गंभीर स्थिति में पहुँच जाए जहाँ ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो उसे जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे कृत्रिम रूप से जीवित न रखा जाए। ऐसी स्थिति में उपचार जारी रखने या बंद करने का निर्णय तय कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत लिया जाएगा। यह दस्तावेज़ मरीज़ की स्वायत्तता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश और कानूनी आधार

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के फैसलों में स्पष्ट किया है कि गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीजों की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार का यह आदेश उन्हीं दिशा-निर्देशों को ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वित करने की दिशा में एक अहम कदम है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में अंत्येष्टि देखभाल (palliative care) और मरीज़ अधिकारों को लेकर बहस तेज़ हो रही है।

आम जनता और अस्पतालों पर असर

राज्य सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था से सरकारी और निजी अस्पतालों में एक समान प्रक्रिया सुनिश्चित होगी। मरीज़ों की पहले से दर्ज इच्छा का सम्मान किया जा सकेगा और जीवन के अंतिम चरण में उपचार से जुड़े फैसले पारदर्शी एवं कानूनी तरीके से लिए जाएँगे। इससे परिवारों को भी भावनात्मक और नैतिक द्वंद्व की स्थिति में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलेगा।

क्या होगा आगे

गठित समिति अस्पतालों में अनुपालन की निगरानी करेगी और प्रक्रियागत दिशा-निर्देश जारी करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के सफल क्रियान्वयन के लिए चिकित्सा कर्मियों को प्रशिक्षण और जनजागरूकता अभियान की भी आवश्यकता होगी। महाराष्ट्र का यह कदम अन्य राज्यों के लिए एक नीतिगत मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन में है — विशेषकर उन निजी अस्पतालों में जहाँ व्यावसायिक हित और नैतिक दायित्व अक्सर टकराते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश वर्षों से मौजूद हैं, फिर भी देश के अधिकांश अस्पतालों में जीवन इच्छा पत्र की प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से अनुपस्थित रही है। गठित समिति की निगरानी-शक्ति और दंडात्मक प्रावधानों का खुलासा न होना एक बड़ा सवाल छोड़ता है। बिना जन-जागरूकता और चिकित्सा प्रशिक्षण के, यह आदेश एक और अधूरी नीतिगत घोषणा बनने का जोखिम उठाता है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र में जीवन इच्छा पत्र क्या है और यह कैसे काम करता है?
जीवन इच्छा पत्र एक कानूनी दस्तावेज़ है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से यह दर्ज कर सकता है कि लाइलाज और गंभीर स्थिति में उसे कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए। महाराष्ट्र सरकार के नए आदेश के तहत इस दस्तावेज़ को राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में मान्यता और अनुपालन अनिवार्य है।
महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला किस कानूनी आधार पर लिया गया है?
यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय के उन दिशा-निर्देशों पर आधारित है जिनमें न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीज़ों की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में संवैधानिक मान्यता दी है।
क्या निजी अस्पतालों पर भी ये नियम बाध्यकारी होंगे?
हाँ, महाराष्ट्र सरकार के नए आदेश के अनुसार राज्य के सभी निजी अस्पतालों को भी ये नियम अनिवार्य रूप से लागू करने होंगे। इससे पहले ये प्रक्रियाएँ मुख्यतः सरकारी अस्पतालों तक ही सीमित थीं।
इन नियमों की निगरानी कौन करेगा?
राज्य सरकार ने आवश्यक प्रक्रियाएँ तय करने और मामलों की निगरानी के लिए एक समिति का गठन किया है। यह समिति अस्पतालों में अनुपालन सुनिश्चित करने और दिशा-निर्देश जारी करने के लिए उत्तरदायी होगी।
इस फैसले से मरीज़ों और उनके परिवारों को क्या फायदा होगा?
इस व्यवस्था से मरीज़ की पहले से दर्ज इच्छा का सम्मान सुनिश्चित होगा और जीवन के अंतिम चरण में उपचार संबंधी निर्णय पारदर्शी व कानूनी तरीके से लिए जाएँगे। परिवारों को भी कठिन परिस्थितियों में स्पष्ट कानूनी मार्गदर्शन मिलेगा, जिससे भावनात्मक और नैतिक द्वंद्व कम होगा।
राष्ट्र प्रेस
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