हरीश राणा के अंगदान पर सुप्रीम कोर्ट ने की परिवार की सराहना, करुणा और मानवता का बताया अनुपम उदाहरण

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हरीश राणा के अंगदान पर सुप्रीम कोर्ट ने की परिवार की सराहना, करुणा और मानवता का बताया अनुपम उदाहरण

सारांश

13 साल कोमा जैसी स्थिति में रहे हरीश राणा के निधन के बाद उनके परिवार ने हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान किए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानवता और करुणा का अनुपम उदाहरण बताया और कहा कि इस मामले ने न्यायाधीशों को भी बहुत कुछ सिखाया।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई को हरीश राणा के परिवार की अंगदान के निर्णय के लिए मुक्त कंठ से सराहना की।
हरीश राणा का 24 मार्च को निधन हुआ; 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद उन्हें एम्स के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था।
निधन के बाद हार्ट वाल्व और आँखों की कॉर्निया दान की गईं — यही अंग दान के योग्य पाए गए।
हरीश राणा 13 वर्षों तक स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में थे; 100 प्रतिशत दिव्यांगता और ठीक होने की शून्य संभावना थी।
अदालत ने मृत्यु प्रमाण पत्र तीन वर्षों तक सुरक्षित रखने और एम्स रिपोर्ट सीलबंद रखने का निर्देश दिया।
केंद्र सरकार को जुलाई तक पूर्व निर्देशों के पालन पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार, 13 मई को 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। अदालत ने कहा कि पुत्र की मृत्यु के पश्चात उसके अंग दान करने का निर्णय मानवता और करुणा का असाधारण उदाहरण है। नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय में यह टिप्पणी उस मामले के समापन के दौरान आई, जिसमें लगभग 13 वर्षों तक कोमा जैसी स्थिति में रहे हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी गई थी।

मामले का पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

हरीश राणा को लगभग 13 वर्ष पूर्व चौथी मंजिल से गिरने के कारण गंभीर सिर की चोट आई थी। मेडिकल बोर्ड ने पाया था कि वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में थे — उन्हें 100 प्रतिशत दिव्यांगता और पूरे शरीर में लकवे जैसी स्थिति थी। सांस लेने और पोषण के लिए निरंतर चिकित्सकीय सहायता आवश्यक थी और ठीक होने की संभावना लगभग शून्य थी।

हरीश के माता-पिता ने पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर पैसिव यूथेनेशिया पर विचार हेतु मेडिकल बोर्ड गठित करने की माँग की थी। उच्च न्यायालय से राहत न मिलने पर परिवार सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ 11 मार्च के आदेश में चिकित्सकीय उपचार वापस लेने की अनुमति प्रदान की गई।

निधन और अंगदान का निर्णय

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के 11 मार्च के आदेश के बाद हरीश राणा को नई दिल्ली के एम्स के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था। 24 मार्च को उनका निधन हो गया।

परिवार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि हरीश राणा का मृत्यु प्रमाण पत्र रिकॉर्ड में जमा कर दिया गया है। उन्होंने यह भी सूचित किया कि निधन के पश्चात हरीश की हार्ट वाल्व और आँखों की कॉर्निया दान की गईं, क्योंकि ये ही अंग दान के योग्य पाए गए।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

पीठ ने कहा कि परिवार ने अपूरणीय दुख सहने के बावजूद अंगदान कर एक बड़ा और निस्वार्थ कार्य किया है। अदालत ने कहा कि हरीश ने 'प्यार और करुणा' के साथ दुनिया को अलविदा कहा और उनके अंगदान से कई लोगों के जीवन में रोशनी आएगी।

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि बिना आवश्यकता के लंबे समय तक मशीनों और ट्यूबों के सहारे जीवन को बढ़ाना हमेशा सम्मानजनक देखभाल नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा, 'इस मामले ने सभी को बहुत कुछ सिखाया है, हमें न्यायाधीश के रूप में भी।'

पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला दर्शाता है कि चिकित्सा विज्ञान की भी सीमाएँ हैं और व्यक्ति की गरिमा व इच्छा का सम्मान अनिवार्य है।

अदालत के निर्देश और सराहना

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि हरीश राणा का मृत्यु प्रमाण पत्र तीन वर्षों तक केस रिकॉर्ड में सुरक्षित रखा जाए। साथ ही एम्स की रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश दिया गया।

अदालत ने एम्स के चिकित्सकों, परिवार की ओर से पेश वकील रश्मि नंदकुमार और केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की भी सराहना की।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को जुलाई तक इस मामले में पहले दिए गए निर्देशों के पालन पर नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। यह मामला भविष्य में पैसिव यूथेनेशिया और अंत-समय की देखभाल से जुड़ी नीतियों के निर्माण में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन अदालतों तक पहुँचने की लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया अब भी परिवारों को हतोत्साहित करती है। इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय से राहत न मिलने और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक की यात्रा यह दर्शाती है कि नीतिगत स्पष्टता के बावजूद ज़मीनी क्रियान्वयन अभी भी अधूरा है। केंद्र सरकार से जुलाई तक स्टेटस रिपोर्ट माँगना एक सकारात्मक कदम है, किंतु असली ज़रूरत एक सुलभ, समयबद्ध और संवेदनशील संस्थागत ढाँचे की है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरीश राणा कौन थे और उनका मामला क्यों चर्चा में रहा?
हरीश राणा 31 वर्षीय युवक थे, जो लगभग 13 वर्ष पूर्व चौथी मंजिल से गिरने के बाद स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चले गए थे। उनके परिवार ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति के लिए पहले दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिससे यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना।
सुप्रीम कोर्ट ने लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति कब दी?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च के आदेश में हरीश राणा का चिकित्सकीय उपचार वापस लेने की अनुमति दी। इसके बाद उन्हें नई दिल्ली के एम्स के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया और 24 मार्च को उनका निधन हो गया।
हरीश राणा के परिवार ने कौन-से अंग दान किए?
निधन के बाद हरीश राणा की हार्ट वाल्व और आँखों की कॉर्निया दान की गईं, क्योंकि चिकित्सकीय परीक्षण में ये ही अंग दान के योग्य पाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को मानवता और करुणा का बड़ा उदाहरण बताया।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या महत्वपूर्ण निर्देश दिए?
अदालत ने हरीश राणा का मृत्यु प्रमाण पत्र तीन वर्षों तक केस रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने और एम्स की रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश दिया। साथ ही केंद्र सरकार को जुलाई तक पूर्व निर्देशों के पालन पर नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।
पैसिव यूथेनेशिया क्या है और भारत में इसकी कानूनी स्थिति क्या है?
पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति का जीवन-रक्षक उपचार बंद करना, ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे कानूनी रूप से वैध ठहराया था, बशर्ते मेडिकल बोर्ड और न्यायालय की अनुमति ली जाए।
राष्ट्र प्रेस
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