सुप्रीम कोर्ट का आदेश: 70+ उम्र और बीमार कैदियों की समय-पूर्व रिहाई नीति तीन महीने में बनाएं सभी राज्य
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 16 जुलाई 2026 को देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि 70 वर्ष से अधिक आयु के, लाइलाज बीमारी से पीड़ित, गंभीर रूप से बीमार या शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों की मानवीय आधार पर समय-पूर्व रिहाई के लिए तीन महीने के भीतर एक सुस्पष्ट नीति तैयार की जाए। यह ऐतिहासिक आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
NALSA की याचिका में देशभर की जेलों में बुजुर्ग और शारीरिक रूप से कमज़ोर कैदियों की बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी। याचिका के अनुसार, ऐसे अनेक कैदी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, किंतु उन्हें जेल परिसर में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। याचिका में तर्क दिया गया था कि ऐसे कैदियों को जेल में रखे जाना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी अनुरूप नहीं है।
नीति में क्या होना चाहिए
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यों द्वारा तैयार की जाने वाली नई नीति में पात्रता की शर्तें, 'टर्मिनल इलनेस' (लाइलाज बीमारी) की सुस्पष्ट परिभाषा और स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा निष्पक्ष स्वास्थ्य जाँच की अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि समय-पूर्व रिहाई के सभी आवेदनों का निपटारा बिना किसी अनावश्यक देरी के किया जाए।
ई-प्रिजन्स पोर्टल की भूमिका
न्यायालय ने निर्देश दिया कि रिहाई से संबंधित सभी आवेदन ई-प्रिजन्स पोर्टल के माध्यम से संसाधित किए जाएँ। पोर्टल पर आवेदन दाखिल होने से लेकर मेडिकल जाँच, जेल अधिकारियों की रिपोर्ट, मेडिकल बोर्ड और अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी की सिफारिश, सक्षम प्राधिकारी का अंतिम निर्णय और उसके कारण तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से दर्ज की जाएगी। पोर्टल में समय-सीमा का पालन सुनिश्चित करने के लिए अलर्ट सिस्टम और डेडलाइन मॉनिटरिंग की सुविधा भी अनिवार्य की गई है। कैदियों की चिकित्सकीय और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुरक्षित रखना भी अदालत ने अनिवार्य बताया।
केंद्र सरकार को निर्देश
इन आदेशों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को तकनीकी सहायता, डिजिटल ढाँचा, सॉफ्टवेयर सहयोग और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। NIC को ई-प्रिजन्स पोर्टल को अपग्रेड कर नियमित रूप से अनुरक्षित रखने का भी आदेश दिया गया है।
अनुपालन हलफनामे की समय-सीमा
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में अदालती आदेशों के पालन के लिए उठाए गए कदम, नई नीति की स्थिति, रिहाई के लिए चिह्नित कैदियों की संख्या और विचाराधीन मामलों का पूरा विवरण देना होगा। यह फैसला भारतीय जेल प्रणाली में मानवीय सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।