झारखंड में बिना पंजीकरण हॉस्पिटल का संचालन अवैध: हाईकोर्ट का आदेश

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झारखंड में बिना पंजीकरण हॉस्पिटल का संचालन अवैध: हाईकोर्ट का आदेश

सारांश

झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि बिना पंजीकरण के अस्पतालों का संचालन अवैध है। यह आदेश जनहित याचिका पर दिया गया है, जिसमें चिकित्सा लापरवाही का आरोप लगाया गया था।

Key Takeaways

  • क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट अधिनियम का पालन अनिवार्य है।
  • बिना पंजीकरण के अस्पतालों का संचालन अवैध होगा।
  • अस्पतालों को मेडिकल रिकॉर्ड 72 घंटे में उपलब्ध कराना होगा।
  • राज्य सरकार को अस्पतालों की निगरानी करनी होगी।
  • उच्च न्यायालय ने रंजीव रंजन की याचिका पर कार्रवाई की है।

रांची, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड उच्च न्यायालय ने सोमवार को राज्य सरकार को क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम, 2010 को कड़ाई से लागू करने का आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि कानून की उपलब्धता है, किंतु झारखंड में इसका अनुपालन अभी भी कमजोर और प्रभावी तरीके से नहीं हो रहा है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की पीठ ने रांची निवासी रंजीव रंजन द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर यह निर्देश दिया।

अदालत ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट और झारखंड राज्य क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट नियम, 2013 के तहत पंजीकरण के बिना राज्य में कोई भी अस्पताल या क्लिनिक संचालित न हो।

उच्च न्यायालय ने स्टेट काउंसिल फॉर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट को निर्देश दिया कि राज्य में सभी अस्पतालों और क्लिनिकों का रजिस्टर तुरंत तैयार करके उसे अद्यतन किया जाए। साथ ही राष्ट्रीय रजिस्टर को हर महीने डिजिटल जानकारी भेजी जाए और कानून के अनुपालन पर हर साल रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि जिला स्तर पर पंजीकरण से संबंधित संस्थाएं सक्रिय रूप से काम करें और अस्पतालों व क्लिनिकों का नियमित निरीक्षण करें। पीठ ने सुझाव दिया कि सरकार विशेषज्ञों की ‘फ्लाइंग स्क्वॉड’ टीम बनाने पर विचार कर सकती है, जो समय-समय पर अस्पतालों और क्लिनिकों की जांच कर कानून के पालन की निगरानी करे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी भी अस्पताल या क्लिनिक को पंजीकरण देने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वह कानून में निर्धारित सभी शर्तों का पालन कर रहा है या नहीं।

अदालत ने भारतीय चिकित्सा परिषद (प्रोफेशनल कंडक्ट, एटीकेट एंड एथिक्स) विनियम, 2002 का उल्लेख करते हुए कहा कि अस्पतालों और डॉक्टरों के लिए यह अनिवार्य है कि मरीज या उनके अधिकृत परिजन द्वारा मांग करने पर 72 घंटे के भीतर मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं।

अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी अस्पतालों और क्लिनिकों को इस नियम की जानकारी दी जाए और इसका पालन सुनिश्चित कराया जाए। उच्च न्यायालय ने राज्य के स्वास्थ्य सेवा निदेशक को निर्देश दिया कि चार महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत कर यह बताया जाए कि राज्य में इस कानून और नियमों को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

यह जनहित याचिका रांची निवासी रंजीव रंजन ने दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2017 में एक निजी अस्पताल में उनके पिता की मौत चिकित्सा लापरवाही के कारण हुई थी और अस्पतालों की निगरानी प्रणाली भी कमजोर है।

हालांकि, अदालत ने व्यक्तिगत स्तर पर चिकित्सा लापरवाही और साइबर अपराध से जुड़े आरोपों की जांच करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे मामलों को संबंधित कानूनी मंचों पर उठाया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मुआवजे या अन्य कानूनी उपायों के लिए उपयुक्त मंच का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

Point of View

NationPress
17/03/2026

Frequently Asked Questions

क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट अधिनियम क्या है?
यह अधिनियम अस्पतालों और क्लिनिकों के पंजीकरण और नियमन के लिए बनाया गया है।
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को क्या निर्देश दिया?
उच्च न्यायालय ने कहा है कि बिना पंजीकरण के कोई भी अस्पताल या क्लिनिक संचालित नहीं हो सकता।
क्या अस्पतालों को मरीजों के रिकॉर्ड उपलब्ध कराना अनिवार्य है?
हां, अस्पतालों को 72 घंटे के भीतर मरीज का मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
क्या सरकार को अस्पतालों का निरीक्षण करना चाहिए?
हां, उच्च न्यायालय ने अस्पतालों का नियमित निरीक्षण सुनिश्चित करने के लिए कहा है।
क्या रंजीव रंजन की याचिका पर अदालत ने कार्रवाई की?
हां, अदालत ने रंजीव रंजन की याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं।
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