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क्रायोस्फीयर: महासागरों की रक्षा की नींव, यूनेस्को ने बताया क्यों है यह पृथ्वी का सबसे ज़रूरी बर्फीला तंत्र

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क्रायोस्फीयर: महासागरों की रक्षा की नींव, यूनेस्को ने बताया क्यों है यह पृथ्वी का सबसे ज़रूरी बर्फीला तंत्र

सारांश

पृथ्वी का बर्फीला तंत्र — क्रायोस्फीयर — महासागरों की धाराओं, तापमान और जल-स्तर का मूक नियंत्रक है। यूनेस्को की चेतावनी है कि ग्लेशियरों के पिघलने और पर्माफ्रॉस्ट से निकलती मीथेन ने इस तंत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है, जिसका असर तटीय शहरों और मछुआरा समुदायों तक पहुँच रहा है।

मुख्य बातें

क्रायोस्फीयर पृथ्वी पर बर्फ के सभी रूपों — ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट, समुद्री बर्फ, आइसबर्ग — का सम्मिलित तंत्र है।
यूनेस्को के अनुसार, क्रायोस्फीयर महासागरों की धाराओं, तापमान और जल-स्तर को सीधे नियंत्रित करता है।
पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से बड़ी मात्रा में मीथेन गैस निकल रही है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज़ कर रही है।
यूनेस्को ने IHP के तहत क्रायोस्फीयर साइंस के लिए कार्रवाई का दशक शुरू किया है।
तटीय शहरों पर बाढ़ का खतरा और मछुआरा समुदायों की आजीविका पर संकट क्रायोस्फीयर के बदलाव का सीधा परिणाम है।

पृथ्वी पर बर्फ के समस्त रूपों से मिलकर बना क्रायोस्फीयर महज़ ध्रुवीय इलाकों की विशेषता नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की जलवायु और महासागरों के संतुलन की धुरी है। यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर समुद्री बर्फ के घटने तक — क्रायोस्फीयर में हो रहे बदलाव सीधे महासागरों की सेहत, तटीय समुदायों की आजीविका और वैश्विक तापमान को प्रभावित कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि महासागरों का भविष्य काफी हद तक इसी बर्फीले तंत्र की स्थिति पर टिका है।

क्रायोस्फीयर क्या है

यह शब्द ग्रीक भाषा के 'क्रियोस' से लिया गया है, जिसका अर्थ है बर्फीली ठंड। पृथ्वी पर बर्फ के सभी रूपों — जमीन पर पड़ी बर्फ, नदियों-झीलों की बर्फ, हमेशा जमी रहने वाली ज़मीन (पर्माफ्रॉस्ट), अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की विशाल हिम चादरें, हिमनद (ग्लेशियर), हिम शिखर, आइसबर्ग और समुद्री बर्फ — को सम्मिलित रूप से क्रायोस्फीयर कहा जाता है।

ये सभी घटक मिलकर पृथ्वी के ठंडे इलाकों का निर्माण करते हैं और एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जलवायु परिवर्तन की बहस में क्रायोस्फीयर की केंद्रीय भूमिका इसलिए है क्योंकि इसमें होने वाला कोई भी बदलाव वैश्विक स्तर पर असर डालता है।

महासागरों से क्रायोस्फीयर का संबंध

यूनेस्को के अनुसार, क्रायोस्फीयर महासागरों को नियंत्रित करने में तीन प्रमुख तरीकों से भूमिका निभाता है। पहला — ग्लेशियरों और हिम चादरों से पिघलकर आने वाला मीठा पानी महासागरों की धाराओं को प्रभावित करता है। दूसरा — समुद्री बर्फ सूरज की किरणों को परावर्तित (रिफ्लेक्ट) करती है, जिससे पृथ्वी का तापमान नियंत्रित रहता है। तीसरा — जब यह बर्फ पिघलती है, तो समुद्र का जल-स्तर बढ़ता है और तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा गंभीर हो जाता है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है जब वैश्विक तापमान वृद्धि की रफ्तार पिछले कई दशकों की तुलना में तेज़ हो रही है।

क्रायोस्फीयर में बदलाव के खतरे

यूनेस्को के अनुसार, क्रायोस्फीयर में हो रहे तेज़ बदलाव पूरी दुनिया पर असर डाल रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्री बर्फ की मात्रा घट रही है और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से बड़ी मात्रा में मीथेन गैस वातावरण में घुल रही है — जो जलवायु परिवर्तन को और तेज़ करती है।

इन बदलावों के दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं: समुद्री जीव-जंतुओं का पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा है, मछुआरा समुदायों की आजीविका संकट में है और तटीय शहरों पर जलमग्न होने का खतरा मंडरा रहा है।

यूनेस्को की पहल: कार्रवाई का दशक

इस संकट की गंभीरता को देखते हुए यूनेस्को ने अपने अंतर-सरकारी जल विज्ञान कार्यक्रम (IHP) के तहत क्रायोस्फीयर साइंस के लिए कार्रवाई का दशक शुरू किया है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिकों, सरकारों और स्थानीय समुदायों को एक मंच पर लाकर क्रायोस्फीयर के बदलावों को बेहतर तरीके से समझना और समय रहते ज़रूरी कदम उठाना है।

यह पहल ऐसे समय में शुरू हुई है जब विश्व महासागर दिवस (8 जून) की पूर्व संध्या पर दुनियाभर में समुद्री संरक्षण की चर्चा ज़ोरों पर है। यूनेस्को का स्पष्ट संदेश है कि महासागरों की रक्षा केवल समुद्री सफाई अभियानों से नहीं, बल्कि क्रायोस्फीयर की सुरक्षा से भी शुरू होती है।

आगे क्या करना होगा

वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि क्रायोस्फीयर में परिवर्तन की रफ्तार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब ग्लोबल वार्मिंग में कमी लाना, हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना और प्रकृति संरक्षण के प्रयासों को मज़बूत करना अनिवार्य हो गया है। यदि इस दिशा में ठोस वैश्विक सहयोग नहीं हुआ, तो महासागरों और तटीय सभ्यताओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव अपरिवर्तनीय हो सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि विकासशील देश — जिनके तटीय समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हैं — इस ढाँचे में भागीदार बन पाते हैं या केवल दर्शक रहते हैं।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्रायोस्फीयर क्या होता है और इसमें क्या-क्या शामिल है?
क्रायोस्फीयर पृथ्वी पर बर्फ के सभी रूपों का सम्मिलित तंत्र है। इसमें ग्लेशियर, समुद्री बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट, अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की हिम चादरें, आइसबर्ग, नदियों-झीलों की बर्फ और हिम शिखर शामिल हैं।
क्रायोस्फीयर महासागरों के लिए क्यों ज़रूरी है?
यूनेस्को के अनुसार, क्रायोस्फीयर महासागरों की धाराओं को नियंत्रित करता है, सूर्य की किरणों को परावर्तित कर तापमान संतुलित रखता है और समुद्र के जल-स्तर को प्रभावित करता है। इसके बिगड़ने से तटीय बाढ़ और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र पर सीधा असर पड़ता है।
पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से क्या खतरा है?
पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से बड़ी मात्रा में मीथेन गैस वातावरण में घुलती है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। यूनेस्को के अनुसार, यह प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन को और तेज़ कर देती है, जिससे एक दुष्चक्र बनता है।
यूनेस्को ने क्रायोस्फीयर के लिए क्या पहल शुरू की है?
यूनेस्को ने अपने अंतर-सरकारी जल विज्ञान कार्यक्रम (IHP) के तहत 'क्रायोस्फीयर साइंस के लिए कार्रवाई का दशक' शुरू किया है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिकों, सरकारों और स्थानीय समुदायों को एकजुट कर क्रायोस्फीयर के बदलावों को समझना और समय पर कदम उठाना है।
क्रायोस्फीयर के बदलाव से आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?
क्रायोस्फीयर में बदलाव से तटीय शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ता है, मछुआरा समुदायों की आजीविका प्रभावित होती है और समुद्री जीव-जंतुओं का पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ता है। यह बदलाव सीधे तौर पर उन करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है जो तटीय इलाकों में रहते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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