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ग्रेट बैरियर रीफ की सेहत जाँचने का नया फ्रेमवर्क, 30 साल के डेटा से यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी ने बनाया टूल

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ग्रेट बैरियर रीफ की सेहत जाँचने का नया फ्रेमवर्क, 30 साल के डेटा से यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी ने बनाया टूल

सारांश

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने 30 साल के डेटा से एक ऐसा टूल बनाया है जो ग्रेट बैरियर रीफ को 'स्वस्थ', 'संघर्षरत' या 'खतरे में' — तीन श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकता है। कोरल कवर के 65% से नीचे जाने पर रीफ संकट में मानी जाएगी। यह फ्रेमवर्क समय पर संरक्षण कार्रवाई का रास्ता खोल सकता है।

मुख्य बातें

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी (USYD) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट बैरियर रीफ की स्थिति मापने का नया वैज्ञानिक फ्रेमवर्क विकसित किया।
फ्रेमवर्क में 1995 से अब तक के 30 से अधिक वर्षों के कोरल कवर और शैवाल डेटा का विश्लेषण किया गया।
रीफ को तीन श्रेणियों में बाँटा गया — स्वस्थ , संघर्षरत (ऐतिहासिक अधिकतम के 65% से नीचे) और खतरे में ( 35% से नीचे)।
जटिल आकार के कोरल सबसे अधिक प्रभावित, जिससे रीफ का चपटा होना और मछलियों के आवास का नुकसान।
अध्ययन समुद्री पर्यावरण अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशित; प्रमुख लेखिका केट व्हिटन , पीएचडी शोधार्थी, USYD।

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी (USYD) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट बैरियर रीफ पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को सटीक रूप से मापने के लिए एक नया वैज्ञानिक फ्रेमवर्क विकसित किया है, जिसमें 1995 से अब तक के 30 से अधिक वर्षों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। यह फ्रेमवर्क कोरल रीफ के क्षरण को समय के साथ मापता है और अन्य शोधकर्ताओं को रीफ की 'स्वास्थ्य जाँच' करने का एक व्यावहारिक तरीका देता है। इस अध्ययन के निष्कर्ष समुद्री पर्यावरण अनुसंधान (Marine Environmental Research) पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

फ्रेमवर्क कैसे काम करता है

शोध टीम ने रीफ सिस्टम में 'पूर्ण कोरल कवर' के औसत पर निर्भर रहने के बजाय एक नई पद्धति अपनाई — हर रीफ की तुलना उसके अपने 1980 के दशक के अंत से संकलित ऐतिहासिक डेटा से की गई। इस अध्ययन में कोरल कवर और शैवाल (algae) की वृद्धि को प्रमुख संकेतक के रूप में रखा गया। अधिक कोरल कवर स्वस्थ समुद्री जीवन का सूचक है, जबकि शैवाल की अधिकता रीफ के बिगड़ते स्वास्थ्य का संकेत देती है।

USYD ने मंगलवार, 18 अगस्त को जारी एक आधिकारिक बयान में कहा, "इसका इस्तेमाल कोरल ब्लीचिंग, चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर घटनाओं के रीफ पर पड़ने वाले असर को मापने के लिए किया जा सकता है।"

तीन पारिस्थितिक श्रेणियाँ

इस अध्ययन में रीफ को तीन पारिस्थितिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है — स्वस्थ, संघर्षरत और खतरे में। शोध के अनुसार, जब कोरल कवर ऐतिहासिक अधिकतम स्तर के लगभग 65 फीसदी से नीचे गिर जाता है, तो रीफ आमतौर पर 'संघर्षरत' श्रेणी में आ जाती है। वहीं, 35 फीसदी से नीचे की गिरावट 'खतरे में' वाली अवस्था से जुड़ी पाई गई, जिसमें शैवाल तेज़ी से बढ़ते हैं और रीफ बनाने वाले कोरल में भारी कमी आती है।

इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका और USYD की पीएचडी शोधार्थी केट व्हिटन ने कहा, "एक जगह पर 30 फीसदी कोरल कवर वाली रीफ को स्वस्थ माना जा सकता है, लेकिन दूसरी जगह पर यही गिरावट का बड़ा संकेत हो सकता है।" व्हिटन ने यह भी बताया कि यह फ्रेमवर्क वैज्ञानिकों को खतरे में पड़ी रीफ की समय पर पहचान करने और संरक्षण उपाय सुझाने में सहायक होगा।

जटिल कोरल सबसे अधिक संकट में

शोधकर्ताओं ने पाया कि जटिल आकार वाले कोरल, साधारण गोल कोरल की तुलना में अधिक प्रभावित होते हैं। इससे रीफें चपटी होती जाती हैं, मछलियों के लिए छिपने की जगहें घटती हैं और तूफानी लहरों से प्राकृतिक सुरक्षा भी कमज़ोर पड़ती है। यह स्थिति समुद्री जीवों के पनपने और कोरल के पुनर्जनन दोनों को कठिन बना देती है।

ग्रेट बैरियर रीफ: एक परिचय

ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के निकट प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रणाली है। यह 2,300 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली है, जिसमें 2,900 से अधिक अलग-अलग चट्टानें और 900 द्वीप शामिल हैं — और इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार होने वाली कोरल ब्लीचिंग इस विश्व धरोहर स्थल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।

यह फ्रेमवर्क वैश्विक स्तर पर अन्य रीफ प्रणालियों की निगरानी में भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है, और आने वाले वर्षों में समुद्री संरक्षण नीतियों को नई दिशा दे सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि ऑस्ट्रेलिया की सरकारें जीवाश्म ईंधन निर्यात और रीफ संरक्षण के बीच संतुलन साधने में वर्षों से संघर्षरत हैं। 65% और 35% की सीमाएँ वैज्ञानिक दृष्टि से स्पष्ट हैं, लेकिन जब तक ये आँकड़े बाध्यकारी नीति-ट्रिगर नहीं बनते, यह फ्रेमवर्क चेतावनी देता रहेगा और नुकसान होता रहेगा।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी का ग्रेट बैरियर रीफ फ्रेमवर्क क्या है?
यह एक वैज्ञानिक टूल है जो ग्रेट बैरियर रीफ की स्थिति को 'स्वस्थ', 'संघर्षरत' और 'खतरे में' — तीन श्रेणियों में मापता है। इसे 1995 से अब तक के 30 से अधिक वर्षों के कोरल कवर और शैवाल डेटा के आधार पर विकसित किया गया है।
कोरल कवर किस स्तर पर गिरने पर रीफ खतरे में मानी जाती है?
शोध के अनुसार, जब कोरल कवर ऐतिहासिक अधिकतम के 65% से नीचे जाता है तो रीफ 'संघर्षरत' मानी जाती है, और 35% से नीचे जाने पर 'खतरे में' की श्रेणी में आती है। इस स्थिति में शैवाल बढ़ जाते हैं और कोरल का पुनर्जनन बेहद कठिन हो जाता है।
इस फ्रेमवर्क की ज़रूरत क्यों पड़ी?
पुरानी पद्धतियाँ रीफ सिस्टम में 'पूर्ण कोरल कवर' के औसत पर निर्भर थीं, जो भ्रामक हो सकती थीं क्योंकि अलग-अलग रीफों की प्राकृतिक स्थितियाँ अलग होती हैं। नया फ्रेमवर्क हर रीफ की तुलना उसके अपने ऐतिहासिक डेटा से करता है, जिससे सटीक और तुलनीय आकलन संभव होता है।
ग्रेट बैरियर रीफ के लिए जलवायु परिवर्तन कितना बड़ा खतरा है?
ग्रेट बैरियर रीफ 2,300 किलोमीटर से अधिक में फैली दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रणाली है। जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार होने वाली कोरल ब्लीचिंग, चक्रवात और बाढ़ इसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं।
यह शोध कहाँ प्रकाशित हुआ और इसकी प्रमुख लेखिका कौन हैं?
यह अध्ययन 'समुद्री पर्यावरण अनुसंधान' (Marine Environmental Research) पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसकी प्रमुख लेखिका यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी की पीएचडी शोधार्थी केट व्हिटन हैं।
राष्ट्र प्रेस
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