काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का 10 साल का शोध: लिवरवर्ट्स पौधों की मौसमी तनाव से लड़ने की अनोखी रणनीति उजागर
सारांश
मुख्य बातें
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आया है कि पादप जगत के सबसे प्राचीन वंशों में से एक — लिवरवर्ट्स — मौसमी पर्यावरणीय तनाव से निपटने के लिए अपने आणविक तंत्र को स्वयं संतुलित करते हैं। नई दिल्ली से 4 मई को सामने आई इस जानकारी के अनुसार, यह शोध लगभग दस वर्षों तक चला और इसके निष्कर्ष भविष्य की जलवायु-प्रतिरोधी फसलें विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।
शोध का परिचय और महत्व
BHU के विज्ञान संस्थान के वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत डॉ. योगेश मिश्रा के नेतृत्व में यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग वाला अध्ययन किया गया, जिसमें भारत के चार प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ-साथ स्वीडन के वैज्ञानिकों ने भी योगदान दिया। शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं प्लांट मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्टर (स्प्रिंगर नेचर) तथा जर्नल ऑफ ब्रायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
दो प्रजातियों की अलग-अलग रणनीतियाँ
वैज्ञानिकों ने मेघालय जैसे समान पर्यावरण में पाई जाने वाली दो प्रजातियों — डुमोर्टिएरा हिर्सूटा और प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम — का गहराई से विश्लेषण किया। अध्ययन में यह दिलचस्प तथ्य उभरा कि दोनों प्रजातियों ने कठिन परिस्थितियों से जूझने के लिए बिल्कुल भिन्न रणनीतियाँ विकसित की हैं।
डुमोर्टिएरा हिर्सूटा अनुकूल मौसम, विशेषकर मानसून के बाद, तेज़ी से विकास करती है और उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग करती है। परंतु जैसे ही परिस्थितियाँ कठोर होती हैं, यह अपनी ऊर्जा संचित कर स्वयं को सुरक्षित रखने लगती है। इसके विपरीत, प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम धीरे-धीरे किंतु निरंतर अपने जीन की गतिविधियों को नियंत्रित करती है, जिससे वह दीर्घकालिक पर्यावरणीय तनाव में भी स्थिर बनी रहती है।
सर्वाइवल मोड: जैव-रासायनिक स्तर पर बदलाव
शोध के अनुसार, जब मौसम प्रतिकूल होता है तो ये पौधे एक प्रकार के 'सर्वाइवल मोड' में चले जाते हैं। वे अपनी वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण को धीमा कर देते हैं और ऊर्जा को रक्षा तंत्र को मज़बूत करने में लगा देते हैं। इस दौरान तनाव से बचाने वाले प्रोटीनों की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि विकास से जुड़े प्रोटीन कम हो जाते हैं।
जैव-रासायनिक स्तर पर भी कई अहम संकेत मिले। जैसे-जैसे मौसम कठोर होता है, पौधों में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ता है, लेकिन सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज जैसे एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम सक्रिय होकर इस नुकसान को कम करते हैं। गौरतलब है कि मानसून के दौरान क्लोरोफिल की मात्रा अधिक पाई गई, जो बेहतर वृद्धि के अनुकूल वातावरण का संकेत देती है।
खेती और खाद्य सुरक्षा पर असर
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्राचीन पौधों के अनुकूलन तंत्र को समझकर ऐसी नई फसलें विकसित की जा सकती हैं, जो सूखा, बाढ़ और तापमान परिवर्तन जैसी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकें। BHU का कहना है कि यह शोध भविष्य के द्वार खोलता है। लिवरवर्ट्स, जो आकार में छोटे और प्रायः उपेक्षित जैव-संसाधन हैं, अब वैज्ञानिकों के लिए 'सर्वाइवल एक्सपर्ट' बनकर उभरे हैं। यह अध्ययन न केवल पादप विज्ञान की समझ को गहरा करता है, बल्कि आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकता है।