काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का 10 साल का शोध: लिवरवर्ट्स पौधों की मौसमी तनाव से लड़ने की अनोखी रणनीति उजागर

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का 10 साल का शोध: लिवरवर्ट्स पौधों की मौसमी तनाव से लड़ने की अनोखी रणनीति उजागर

सारांश

सदियों से कठोर मौसम में जीवित रहने वाले लिवरवर्ट्स पौधे अब वैज्ञानिकों के लिए 'सर्वाइवल एक्सपर्ट' बन गए हैं। BHU के डॉ. योगेश मिश्रा के नेतृत्व में 10 साल के इस अंतरराष्ट्रीय शोध ने उजागर किया कि ये छोटे पौधे अपने आणविक तंत्र को खुद संतुलित कर हर मौसम में जीवित रहते हैं — और यही रणनीति भविष्य की जलवायु-प्रतिरोधी फसलों की नींव बन सकती है।

मुख्य बातें

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के डॉ.
योगेश मिश्रा के नेतृत्व में 10 वर्षों तक किए गए शोध में लिवरवर्ट्स की मौसमी अनुकूलन क्षमता का खुलासा हुआ।
अध्ययन में चार भारतीय संस्थानों के साथ स्वीडन के वैज्ञानिकों ने भी भाग लिया।
डुमोर्टिएरा हिर्सूटा अनुकूल मौसम में तेज़ वृद्धि करती है, जबकि प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम जीन गतिविधि को धीरे-धीरे नियंत्रित कर दीर्घकालिक तनाव में स्थिर रहती है।
प्रतिकूल मौसम में पौधे 'सर्वाइवल मोड' में जाते हैं — वृद्धि धीमी होती है और रक्षा प्रोटीन बढ़ते हैं।
शोध के निष्कर्ष प्लांट मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्टर (स्प्रिंगर नेचर) और जर्नल ऑफ ब्रायोलॉजी में प्रकाशित हुए।
यह अध्ययन सूखा, बाढ़ और तापमान परिवर्तन से लड़ने में सक्षम जलवायु-प्रतिरोधी फसलें विकसित करने में सहायक हो सकता है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आया है कि पादप जगत के सबसे प्राचीन वंशों में से एक — लिवरवर्ट्स — मौसमी पर्यावरणीय तनाव से निपटने के लिए अपने आणविक तंत्र को स्वयं संतुलित करते हैं। नई दिल्ली से 4 मई को सामने आई इस जानकारी के अनुसार, यह शोध लगभग दस वर्षों तक चला और इसके निष्कर्ष भविष्य की जलवायु-प्रतिरोधी फसलें विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।

शोध का परिचय और महत्व

BHU के विज्ञान संस्थान के वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत डॉ. योगेश मिश्रा के नेतृत्व में यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग वाला अध्ययन किया गया, जिसमें भारत के चार प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ-साथ स्वीडन के वैज्ञानिकों ने भी योगदान दिया। शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं प्लांट मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्टर (स्प्रिंगर नेचर) तथा जर्नल ऑफ ब्रायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

दो प्रजातियों की अलग-अलग रणनीतियाँ

वैज्ञानिकों ने मेघालय जैसे समान पर्यावरण में पाई जाने वाली दो प्रजातियों — डुमोर्टिएरा हिर्सूटा और प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम — का गहराई से विश्लेषण किया। अध्ययन में यह दिलचस्प तथ्य उभरा कि दोनों प्रजातियों ने कठिन परिस्थितियों से जूझने के लिए बिल्कुल भिन्न रणनीतियाँ विकसित की हैं।

डुमोर्टिएरा हिर्सूटा अनुकूल मौसम, विशेषकर मानसून के बाद, तेज़ी से विकास करती है और उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग करती है। परंतु जैसे ही परिस्थितियाँ कठोर होती हैं, यह अपनी ऊर्जा संचित कर स्वयं को सुरक्षित रखने लगती है। इसके विपरीत, प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम धीरे-धीरे किंतु निरंतर अपने जीन की गतिविधियों को नियंत्रित करती है, जिससे वह दीर्घकालिक पर्यावरणीय तनाव में भी स्थिर बनी रहती है।

सर्वाइवल मोड: जैव-रासायनिक स्तर पर बदलाव

शोध के अनुसार, जब मौसम प्रतिकूल होता है तो ये पौधे एक प्रकार के 'सर्वाइवल मोड' में चले जाते हैं। वे अपनी वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण को धीमा कर देते हैं और ऊर्जा को रक्षा तंत्र को मज़बूत करने में लगा देते हैं। इस दौरान तनाव से बचाने वाले प्रोटीनों की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि विकास से जुड़े प्रोटीन कम हो जाते हैं।

जैव-रासायनिक स्तर पर भी कई अहम संकेत मिले। जैसे-जैसे मौसम कठोर होता है, पौधों में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ता है, लेकिन सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज जैसे एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम सक्रिय होकर इस नुकसान को कम करते हैं। गौरतलब है कि मानसून के दौरान क्लोरोफिल की मात्रा अधिक पाई गई, जो बेहतर वृद्धि के अनुकूल वातावरण का संकेत देती है।

खेती और खाद्य सुरक्षा पर असर

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्राचीन पौधों के अनुकूलन तंत्र को समझकर ऐसी नई फसलें विकसित की जा सकती हैं, जो सूखा, बाढ़ और तापमान परिवर्तन जैसी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकें। BHU का कहना है कि यह शोध भविष्य के द्वार खोलता है। लिवरवर्ट्स, जो आकार में छोटे और प्रायः उपेक्षित जैव-संसाधन हैं, अब वैज्ञानिकों के लिए 'सर्वाइवल एक्सपर्ट' बनकर उभरे हैं। यह अध्ययन न केवल पादप विज्ञान की समझ को गहरा करता है, बल्कि आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे व्यावसायिक फसलों में स्थानांतरित करना बिल्कुल अलग और जटिल चुनौती है। भारत में जहाँ कृषि अनुसंधान से नीति तक का अंतर अक्सर बड़ा रहा है, वहाँ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BHU के ये निष्कर्ष किसान-स्तर पर कब और कैसे पहुँचते हैं। स्वीडन जैसे देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग उत्साहजनक है, पर खाद्य सुरक्षा के वादे तभी साकार होंगे जब इस ज्ञान को नीतिगत प्राथमिकता और पर्याप्त वित्त पोषण मिले।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लिवरवर्ट्स क्या होते हैं और ये क्यों महत्वपूर्ण हैं?
लिवरवर्ट्स पादप जगत के सबसे प्राचीन वंशों में से एक हैं — आकार में छोटे और प्रायः उपेक्षित, लेकिन अत्यंत टिकाऊ। BHU के शोध के अनुसार, ये पौधे अपने आणविक तंत्र को स्वयं संतुलित कर मौसमी तनाव में भी जीवित रहते हैं, जो इन्हें जलवायु-प्रतिरोधी फसल विकास के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन विषय बनाता है।
BHU का यह शोध कितने समय तक चला और इसमें कौन शामिल था?
यह शोध लगभग 10 वर्षों तक चला और इसका नेतृत्व BHU के वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. योगेश मिश्रा ने किया। इसमें भारत के चार प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ स्वीडन के वैज्ञानिकों ने भी योगदान दिया।
डुमोर्टिएरा हिर्सूटा और प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम में क्या अंतर है?
डुमोर्टिएरा हिर्सूटा अनुकूल मौसम में तेज़ी से विकास करती है और प्रतिकूल परिस्थितियों में ऊर्जा बचाकर खुद को सुरक्षित रखती है। प्लाजियोचास्मा एपेंडिकुलेटम धीरे-धीरे लेकिन निरंतर अपने जीन की गतिविधियों को नियंत्रित करती है, जिससे वह दीर्घकालिक तनाव में भी स्थिर बनी रहती है।
यह शोध खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए कैसे उपयोगी होगा?
वैज्ञानिकों के अनुसार, इन प्राचीन पौधों के अनुकूलन तंत्र को समझकर ऐसी नई फसलें विकसित की जा सकती हैं जो सूखा, बाढ़ और तापमान परिवर्तन जैसी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकें। यह जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस शोध के निष्कर्ष कहाँ प्रकाशित हुए हैं?
शोध के निष्कर्ष दो अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं — प्लांट मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्टर (स्प्रिंगर नेचर) और जर्नल ऑफ ब्रायोलॉजी — में प्रकाशित हुए हैं, जो इस शोध की वैज्ञानिक विश्वसनीयता को रेखांकित करता है।
राष्ट्र प्रेस
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