महेंद्रगिरि स्टील्थ फ्रिगेट 11 जुलाई को नौसेना में शामिल, 75% स्वदेशी तकनीक से लैस भारत की 'अदृश्य ढाल'
सारांश
मुख्य बातें
स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट महेंद्रगिरि को 11 जुलाई 2025 को विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना के बेड़े में औपचारिक रूप से शामिल किया जाएगा। भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिज़ाइन और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई द्वारा निर्मित यह युद्धपोत रडार की पकड़ से बचते हुए बहु-आयामी युद्ध संचालन में सक्षम है। नौसेना के अनुसार, इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
महेंद्रगिरि की प्रमुख युद्धक क्षमताएँ
यह फ्रिगेट कोई साधारण युद्धपोत नहीं है — यह एक चलता-फिरता बहु-भूमिका युद्धक मंच है। इसमें सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें, सतह से वायु में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियाँ, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, आधुनिक सेंसर, पनडुब्बी रोधी हथियार और एकीकृत कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाए गए हैं। यह दुश्मन के लड़ाकू विमानों को मार गिराने, पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्री सतह पर एक साथ कई खतरों से निपटने में सक्षम है।
महेंद्रगिरि में आधुनिक कंबाइंड डीजल ऑर गैस (CODOG) प्रणोदन प्रणाली लगाई गई है। यह प्रणाली सामान्य गश्त के दौरान ईंधन की बचत करती है और ज़रूरत पड़ने पर गैस टर्बाइन की शक्ति से उच्च गति प्राप्त करने की सुविधा देती है। इससे यह युद्धपोत लंबी समुद्री तैनाती में भी प्रभावी संचालन कर सकता है।
स्टील्थ तकनीक और स्वदेशी निर्माण
महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना की अत्याधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट श्रेणी का नवीनतम संस्करण है। इसमें कम रडार परावर्तन (Low Radar Cross Section), बेहतर जीवटता, उन्नत स्वचालन और आधुनिक युद्ध प्रणालियाँ शामिल हैं। यह समुद्र में चुपचाप आगे बढ़ सकता है और आवश्यकता पड़ने पर घातक प्रहार करने में सक्षम है।
नौसेना के अनुसार, 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है — यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की कहानी भी कहता है। इसके निर्माण में देशभर की बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ-साथ सैकड़ों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) ने उपकरण, सेंसर, संरचनात्मक सामग्री और अन्य घटक उपलब्ध कराए। इस प्रक्रिया ने हज़ारों लोगों के लिए रोज़गार के अवसर सृजित किए और देश के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को नई मज़बूती दी।
नाम और प्रतीकात्मकता
इस युद्धपोत का नाम पूर्वी घाट की प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वतमाला के नाम पर रखा गया है, जो शक्ति, धैर्य और अटूट संकल्प का प्रतीक मानी जाती है। यह भारतीय नौसेना का पहला युद्धपोत है जिसे यह नाम दिया गया है। इसका आदर्श वाक्य 'माइटी–मैजेस्टिक–मैचलेस' रखा गया है।
रणनीतिक महत्व और आगे की तैनाती
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका और सुरक्षित, स्थिर व समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्धता को इससे नई मज़बूती मिलेगी। यह ऐसे समय में आया है जब हिंद महासागर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
नौसेना के अनुसार, महेंद्रगिरि केवल युद्ध के लिए नहीं बनाया गया है। यह मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों, खोज एवं बचाव कार्यों, समुद्री सुरक्षा गश्त और अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिशनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। नौसेना का कहना है कि यह युद्धपोत बेड़े में शामिल होते ही सक्रिय परिचालन जिम्मेदारियाँ संभालने के लिए पूरी तरह तैयार होगा। गौरतलब है कि एक दशक पहले तक भारत को आधुनिक युद्धपोतों के लिए विदेशी तकनीक और डिज़ाइन पर निर्भर रहना पड़ता था — महेंद्रगिरि इस बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।