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गीतांजलि अंगमो का सोशल मीडिया पोस्ट: 'मैं न भाजपा हूं, न कांग्रेस — इन सभी वादों से परे हूं'

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गीतांजलि अंगमो का सोशल मीडिया पोस्ट: 'मैं न भाजपा हूं, न कांग्रेस — इन सभी वादों से परे हूं'

सारांश

सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की नई पोस्ट ने ध्यान खींचा — 'न भाजपा, न कांग्रेस, न वामपंथी, न दक्षिणपंथी।' संविधान में 'सेक्युलर' शब्द को 'पानी को गीला कहने जैसा' बताने के बाद यह उनकी दूसरी चर्चित टिप्पणी है।

मुख्य बातें

अंगमो ने सोशल मीडिया पोस्ट में हर राजनीतिक और वैचारिक लेबल को अस्वीकार किया — 'न भाजपा, न कांग्रेस, न वामपंथी, न दक्षिणपंथी।' उन्होंने कहा कि इंसानों की बनाई श्रेणियों में खुद को सीमित करना अपनी असीम पहचान को कमतर करना है।
इससे पहले उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द जोड़ने को दार्शनिक दृष्टि से 'दोहराव' बताया था।
उनके अनुसार 'सर्व धर्म समभाव' और 'वसुधैव कुटुंबकम' भारत की विविधता को बेहतर अभिव्यक्त करते हैं।
दोनों पोस्ट सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा और मिश्रित प्रतिक्रिया का विषय बनी हैं।

सोनम वांगचुक की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता गीतांजलि जे. अंगमो एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा के केंद्र में हैं। नई दिल्ली से सामने आई उनकी ताज़ा पोस्ट में उन्होंने हर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक लेबल को खारिज करते हुए खुद को 'इन सभी वादों से परे' बताया। यह पोस्ट संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द को लेकर उनकी पिछली टिप्पणी के बाद आई है, जिसने भी व्यापक बहस छेड़ी थी।

क्या कहा गीतांजलि ने अपनी पोस्ट में

अपनी पोस्ट में गीतांजलि अंगमो ने लिखा, 'मैं न तो भाजपा हूं, न ही कांग्रेस। न संघी, न कम्युनिस्ट। न वामपंथी, न दक्षिणपंथी। न समाजवादी, न पूंजीवादी। न उदारवादी, न रूढ़िवादी। न दलित, न ब्राह्मण। न जैन, न बौद्ध, न हिंदू, न पंजाबी, न ओडिया, न लद्दाखी। मैं ये सब हूं, और इनसे भी कहीं ज्यादा। इन सभी वादों से परे। मैं हर चीज से सबसे अच्छी बातें अपनाती हूं और बाकी को छोड़ देती हूं।'

उन्होंने यह भी कहा कि जब हम अपने असीम स्वरूप को इंसानों की बनाई श्रेणियों में सीमित करते हैं, तो हम खुद को ही कमतर कर लेते हैं। उनके अनुसार, हमारी सबसे गहरी पहचान न राजनीतिक है, न सामाजिक, न धार्मिक और न वैचारिक — 'वह तो स्वयं चेतना है।'

पिछली टिप्पणी: 'सेक्युलर' शब्द पर विचार

इससे पहले गीतांजलि अंगमो ने संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द के उल्लेख पर अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा था कि संविधान में भारत को 'सेक्युलर' कहना वैसा ही है, जैसे पानी को गीला कहना।

उनका तर्क था कि 1976 से पहले भी भारत का संविधान वास्तव में धर्मनिरपेक्ष था — अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 25 से 28 (धर्म की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 29 व 30 (अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा) इसके प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि कोई राजकीय धर्म न होना ही इसकी असली पहचान थी।

भारतीय दर्शन और 'सेक्युलरिज्म' पर उनका नज़रिया

गीतांजलि के अनुसार, 'सेक्युलर' शब्द पश्चिम से आया है और यूरोप में चर्च तथा राज्य के बीच के ऐतिहासिक टकराव से उपजा है। यह धार्मिक विविधता के प्रति भारत के सदियों पुराने नज़रिए को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

उन्होंने 'सर्व धर्म समभाव' और 'वसुधैव कुटुंबकम' जैसी भारतीय अवधारणाओं को बेहतर विकल्प बताया। उनका कहना था कि भारत ने आधुनिक सेक्युलरिज्म से बहुत पहले ही हर पंथ और दार्शनिक परंपरा को समान गरिमा दी है।

उनके अनुसार, प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ना दार्शनिक दृष्टि से एक प्रकार का दोहराव था, जो भारत की विविधता की मौलिक समझ को स्पष्ट करने की बजाय धुंधला करता है।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

गीतांजलि अंगमो की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुई। समर्थकों ने इसे 'विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठने की आवाज़' बताया, जबकि आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में सरलीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या वे आगे किसी ठोस सार्वजनिक भूमिका में इन विचारों को आगे बढ़ाती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन व्यावहारिक राजनीति में ऐसी तटस्थता को अक्सर विशेषाधिकार के रूप में देखा जाता है — एक ऐसी विलासिता जो हाशिये पर खड़े समुदायों के लिए उपलब्ध नहीं होती। 'सेक्युलर' शब्द पर उनकी टिप्पणी भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा की ओर इशारा करती है, परंतु यह उस राजनीतिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ करती है जिसमें 1976 में यह शब्द जोड़ा गया था। मुख्यधारा की कवरेज इन बयानों को वायरल कोट की तरह पेश करती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये विचार किसी ठोस सामाजिक कार्यक्रम में तब्दील होते हैं।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीतांजलि अंगमो की वायरल पोस्ट में क्या कहा गया है?
गीतांजलि अंगमो ने अपनी पोस्ट में कहा कि वे न भाजपा हैं, न कांग्रेस, न वामपंथी, न दक्षिणपंथी — बल्कि 'इन सभी वादों से परे' हैं। उन्होंने हर राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक लेबल को अस्वीकार करते हुए अपनी पहचान को 'स्वयं चेतना' बताया।
गीतांजलि अंगमो कौन हैं?
गीतांजलि जे. अंगमो पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी हैं। वे स्वयं भी सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं और अपने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए अक्सर चर्चा में आती हैं।
गीतांजलि ने संविधान में 'सेक्युलर' शब्द पर क्या कहा था?
उन्होंने कहा था कि संविधान में भारत को 'सेक्युलर' कहना वैसा ही है जैसे पानी को गीला कहना, क्योंकि 1976 से पहले भी संविधान के कई अनुच्छेद धर्मनिरपेक्षता की भावना को व्यक्त करते थे। उनके अनुसार 'सर्व धर्म समभाव' जैसी भारतीय अवधारणाएँ इस विचार को बेहतर ढंग से प्रकट करती हैं।
इन बयानों पर सोशल मीडिया की क्या प्रतिक्रिया रही?
गीतांजलि की पोस्ट पर मिश्रित प्रतिक्रिया सामने आई है। कुछ लोगों ने इसे विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठने की आवाज़ बताया, जबकि आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में जटिल मुद्दों को सरल बना देते हैं।
'सेक्युलर' शब्द भारतीय संविधान में कब जोड़ा गया?
'सेक्युलर' शब्द भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में 42वें संविधान संशोधन के ज़रिए जोड़ा गया था। गीतांजलि अंगमो का तर्क है कि इससे पहले भी संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्ष थी।
राष्ट्र प्रेस
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