गीतांजलि अंगमो का सोशल मीडिया पोस्ट: 'मैं न भाजपा हूं, न कांग्रेस — इन सभी वादों से परे हूं'
सारांश
मुख्य बातें
सोनम वांगचुक की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता गीतांजलि जे. अंगमो एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा के केंद्र में हैं। नई दिल्ली से सामने आई उनकी ताज़ा पोस्ट में उन्होंने हर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक लेबल को खारिज करते हुए खुद को 'इन सभी वादों से परे' बताया। यह पोस्ट संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द को लेकर उनकी पिछली टिप्पणी के बाद आई है, जिसने भी व्यापक बहस छेड़ी थी।
क्या कहा गीतांजलि ने अपनी पोस्ट में
अपनी पोस्ट में गीतांजलि अंगमो ने लिखा, 'मैं न तो भाजपा हूं, न ही कांग्रेस। न संघी, न कम्युनिस्ट। न वामपंथी, न दक्षिणपंथी। न समाजवादी, न पूंजीवादी। न उदारवादी, न रूढ़िवादी। न दलित, न ब्राह्मण। न जैन, न बौद्ध, न हिंदू, न पंजाबी, न ओडिया, न लद्दाखी। मैं ये सब हूं, और इनसे भी कहीं ज्यादा। इन सभी वादों से परे। मैं हर चीज से सबसे अच्छी बातें अपनाती हूं और बाकी को छोड़ देती हूं।'
उन्होंने यह भी कहा कि जब हम अपने असीम स्वरूप को इंसानों की बनाई श्रेणियों में सीमित करते हैं, तो हम खुद को ही कमतर कर लेते हैं। उनके अनुसार, हमारी सबसे गहरी पहचान न राजनीतिक है, न सामाजिक, न धार्मिक और न वैचारिक — 'वह तो स्वयं चेतना है।'
पिछली टिप्पणी: 'सेक्युलर' शब्द पर विचार
इससे पहले गीतांजलि अंगमो ने संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द के उल्लेख पर अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा था कि संविधान में भारत को 'सेक्युलर' कहना वैसा ही है, जैसे पानी को गीला कहना।
उनका तर्क था कि 1976 से पहले भी भारत का संविधान वास्तव में धर्मनिरपेक्ष था — अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 25 से 28 (धर्म की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 29 व 30 (अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा) इसके प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि कोई राजकीय धर्म न होना ही इसकी असली पहचान थी।
भारतीय दर्शन और 'सेक्युलरिज्म' पर उनका नज़रिया
गीतांजलि के अनुसार, 'सेक्युलर' शब्द पश्चिम से आया है और यूरोप में चर्च तथा राज्य के बीच के ऐतिहासिक टकराव से उपजा है। यह धार्मिक विविधता के प्रति भारत के सदियों पुराने नज़रिए को पूरी तरह नहीं दर्शाता।
उन्होंने 'सर्व धर्म समभाव' और 'वसुधैव कुटुंबकम' जैसी भारतीय अवधारणाओं को बेहतर विकल्प बताया। उनका कहना था कि भारत ने आधुनिक सेक्युलरिज्म से बहुत पहले ही हर पंथ और दार्शनिक परंपरा को समान गरिमा दी है।
उनके अनुसार, प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ना दार्शनिक दृष्टि से एक प्रकार का दोहराव था, जो भारत की विविधता की मौलिक समझ को स्पष्ट करने की बजाय धुंधला करता है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
गीतांजलि अंगमो की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुई। समर्थकों ने इसे 'विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठने की आवाज़' बताया, जबकि आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में सरलीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या वे आगे किसी ठोस सार्वजनिक भूमिका में इन विचारों को आगे बढ़ाती हैं।