3 सितंबर 2026
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'वंदे मातरम' पर हिंदू देवताओं का हवाला देकर आपत्ति 'बचकानी सोच': गीतांजलि अंगमो

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'वंदे मातरम' पर हिंदू देवताओं का हवाला देकर आपत्ति 'बचकानी सोच': गीतांजलि अंगमो

सारांश

'वंदे मातरम' में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है — इस आधार पर आपत्ति को गीतांजलि अंगमो ने सिरे से खारिज किया। उनका तर्क है कि दुर्गा और लक्ष्मी शक्ति और समृद्धि के प्रतीक हैं, धर्म-विशेष के नहीं। यह बहस आम जनता की नहीं, राजनीतिक एजेंडे की उपज है।

मुख्य बातें

गीतांजलि अंगमो ने 3 सितंबर को भुवनेश्वर में 'वंदे मातरम' पर हिंदू देवताओं के संदर्भ को लेकर आपत्ति को 'बचकानी सोच' करार दिया।
उन्होंने कहा कि दुर्गा और लक्ष्मी क्रमशः शक्ति और समृद्धि के प्रतीक हैं — इन्हें केवल धार्मिक दृष्टि से देखना उचित नहीं।
सूफी कविता, इतालवी ओपेरा और गायत्री मंत्र के उदाहरण देकर उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी भाषा या सांस्कृतिक परंपरा को सीखने से आस्था दूषित नहीं होती।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए कहा कि दूसरी परंपराओं को समझना धार्मिक पहचान को कमजोर नहीं करता।
उन्होंने कहा कि 'वंदे मातरम' को लेकर असहमति आम नागरिकों में नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे के कारण बनी चर्चाओं में अधिक है।
श्री अरबिंदो के हवाले से उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने भारत को एक जीवित शक्ति के रूप में देखा था — यह भाव राष्ट्रगीत की आत्मा है।

गीतांजलि अंगमो — पर्यावरणविद् एवं शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी — ने 3 सितंबर को भुवनेश्वर में स्पष्ट शब्दों में कहा कि पूर्ण 'वंदे मातरम' के गायन पर इस आधार पर आपत्ति जताना कि उसमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, एक 'बचकानी सोच' है। उनके अनुसार भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को संकुचित धार्मिक पहचान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

विरोध के तर्कों पर सीधा जवाब

अंगमो ने 'वंदे मातरम' को लेकर उठाई जाने वाली दो प्रमुख आपत्तियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम को लेकर कई रुकावटें या आपत्तियां हैं। पहले तो लोग कहते हैं कि जब इसे लिखा गया था, तब भारत एक नेशन-स्टेट भी नहीं था, तो यह भारत के लिए कैसे हो सकता है? फिर, वे बताते हैं कि बाद के छंदों में हिंदू देवताओं का जिक्र है, तो दूसरे धर्मों के लोग इसे कैसे गा सकते हैं? अब, यह इसे देखने का बहुत बचकाना तरीका है।'

उन्होंने सूफी कविता का उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई हिंदू उर्दू में सूफी गजल गाता है, तो उसका धर्म भ्रष्ट नहीं होता। इसी तर्क पर, किसी अन्य धर्म के व्यक्ति द्वारा संस्कृत में रचित गीत गाने से उसकी आस्था पर कोई आँच नहीं आती।

संस्कृत और सांस्कृतिक विरासत का संदर्भ

अंगमो ने वेद और उपनिषदों को 10,000 वर्ष पुरानी संस्कृत परंपरा का हिस्सा बताते हुए कहा कि जिस प्रकार इतालवी ओपेरा सीखने के लिए लैटिन का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार संस्कृत को किसी एक धर्म या राजनीतिक दल की संपत्ति मानना गलत है।

उन्होंने कहा, 'अगर हम गायत्री मंत्र गाते हैं या योगा करते हैं, जिसमें संस्कृत श्लोक हैं, तो संस्कृत को हिंदू धर्म के साथ जोड़ना और राजनीतिक दल के साथ जोड़ना गलत है। संस्कृत एक बहुत पुरानी भाषा है।'

देवी-देवताओं के संदर्भ को प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें

अंगमो ने 'वंदे मातरम' में दुर्गा और लक्ष्मी के उल्लेख को धार्मिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक बताया। उनके अनुसार, 'दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं। इसलिए, अगर किसी को गीत गाने से कोई आपत्ति है, तो आप उसे बदल नहीं सकते। पहले दो छंद इसलिए चुने गए थे, क्योंकि गीत बहुत लंबा था। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी छंदों को स्वीकार नहीं किया गया था। आप किसी भी कलाकृति को काट नहीं सकते।'

उन्होंने यह भी कहा कि 'वंदे मातरम' एक प्रेरक शक्ति है — यह अन्य समस्याओं का विकल्प नहीं, बल्कि उनसे लड़ने की भावना है।

भारत की सभ्यतागत पहचान और बंकिम चंद्र का दर्शन

अंगमो ने कहा कि भारत यूरोपीय देशों की तरह महज एक राजनीतिक या भौगोलिक इकाई नहीं है। 1600 के दशक के बाद जब दुनियाभर में नए राष्ट्र-राज्य बने, उससे पहले भारत एक सभ्यतागत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान था — कश्मीर से दक्षिण तक।

उन्होंने श्री अरबिंदो के हवाले से कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने जब 'आनंदमठ' लिखा, तो वे एक ऋषि की दृष्टि से इस भूमि को 'शक्ति' — एक जीवित सत्ता — के रूप में देख रहे थे। उन्होंने कहा, 'इसलिए इसमें 80 साल नहीं लगने चाहिए थे। शायद अगर हमें यह समझ पहले होती, तो आज हमें भारत के बंटवारे की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।'

राजनीतिक एजेंडा बनाम आम जनता की भावना

अंगमो ने स्पष्ट किया कि 'वंदे मातरम' को लेकर असहमति आम नागरिकों में उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक विमर्श में दिखती है। उनके अनुसार, 'कई बार, राजनेता अपने एजेंडे के लिए बंटवारे वाली सोच को बढ़ावा देते हैं।'

उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण दिया, जो उपनिषद, गीता और श्री अरबिंदो की रचनाएँ पढ़ते थे। अंगमो ने कहा कि वे स्वयं सूफी कविताएँ पढ़ती हैं, और इससे किसी का धर्म दूषित नहीं होता — बल्कि परस्पर सीखना ही भारत की असली ताकत है।

अंत में उन्होंने कहा, 'हमारा दिल इतना बड़ा होना चाहिए कि हम सबको अपना सकें, लेकिन साथ ही हमें अपनी जीवन-शक्ति, अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को भी जिंदा रखना चाहिए। यही मेल भारत को एक महान देश बना सकता है।'

संपादकीय दृष्टिकोण

सभ्यतागत प्रतीक हैं — बौद्धिक रूप से ठोस है, लेकिन यह उन लोगों को शायद ही संतुष्ट करे जो राष्ट्रगीत की अनिवार्यता को ही मूल प्रश्न मानते हैं। यह भी गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' की यह बहस हर कुछ वर्षों में राजनीतिक तापमान के साथ उठती है — और हर बार इसका केंद्र बिंदु बदल जाता है। असली सवाल यह है कि क्या यह विमर्श सांस्कृतिक समावेश की ओर ले जाता है, या बार-बार ध्रुवीकरण का औजार बन जाता है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीतांजलि अंगमो ने 'वंदे मातरम' पर क्या कहा?
गीतांजलि अंगमो ने कहा कि 'वंदे मातरम' में हिंदू देवी-देवताओं के उल्लेख के आधार पर आपत्ति जताना 'बचकानी सोच' है। उनके अनुसार दुर्गा और लक्ष्मी जैसे प्रतीकों को धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और प्रतीकात्मक दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
'वंदे मातरम' में हिंदू देवताओं के संदर्भ पर विवाद क्यों है?
कुछ लोगों का तर्क है कि 'वंदे मातरम' के बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं — विशेषकर दुर्गा और लक्ष्मी — का उल्लेख है, जिससे अन्य धर्मों के लोग इसे गाने में असहज महसूस करते हैं। अंगमो ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ये प्रतीक सार्वभौमिक मूल्यों — शक्ति और समृद्धि — के द्योतक हैं।
क्या 'वंदे मातरम' को लेकर आम जनता में भी असहमति है?
गीतांजलि अंगमो के अनुसार, आम नागरिकों में यह असहमति उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक विमर्श में दिखती है। उन्होंने कहा कि कई बार राजनेता अपने एजेंडे के लिए बंटवारे वाली सोच को बढ़ावा देते हैं।
गीतांजलि अंगमो ने संस्कृत और सांस्कृतिक विरासत पर क्या तर्क दिया?
उन्होंने कहा कि संस्कृत को किसी एक धर्म या राजनीतिक दल की संपत्ति मानना गलत है — जिस तरह इतालवी ओपेरा सीखने के लिए लैटिन का प्रयोग होता है, उसी तरह गायत्री मंत्र या योग में संस्कृत का उपयोग सांस्कृतिक है, न कि धार्मिक थोपना। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण भी दिया जो उपनिषद और गीता पढ़ते थे।
बंकिम चंद्र चटर्जी और 'वंदे मातरम' का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
गीतांजलि अंगमो ने श्री अरबिंदो के हवाले से कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने 'आनंदमठ' में भारत को एक जीवित शक्ति — 'मां' — के रूप में देखा था। यह दृष्टि केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि ऋषि-तुल्य थी। उन्होंने कहा कि इस गीत को स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से गाए जाने में 80 वर्ष लगे, जो एक स्वागत योग्य कदम है।
राष्ट्र प्रेस
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