'वंदे मातरम' पर हिंदू देवताओं का हवाला देकर आपत्ति 'बचकानी सोच': गीतांजलि अंगमो
सारांश
मुख्य बातें
गीतांजलि अंगमो — पर्यावरणविद् एवं शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी — ने 3 सितंबर को भुवनेश्वर में स्पष्ट शब्दों में कहा कि पूर्ण 'वंदे मातरम' के गायन पर इस आधार पर आपत्ति जताना कि उसमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, एक 'बचकानी सोच' है। उनके अनुसार भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को संकुचित धार्मिक पहचान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
विरोध के तर्कों पर सीधा जवाब
अंगमो ने 'वंदे मातरम' को लेकर उठाई जाने वाली दो प्रमुख आपत्तियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम को लेकर कई रुकावटें या आपत्तियां हैं। पहले तो लोग कहते हैं कि जब इसे लिखा गया था, तब भारत एक नेशन-स्टेट भी नहीं था, तो यह भारत के लिए कैसे हो सकता है? फिर, वे बताते हैं कि बाद के छंदों में हिंदू देवताओं का जिक्र है, तो दूसरे धर्मों के लोग इसे कैसे गा सकते हैं? अब, यह इसे देखने का बहुत बचकाना तरीका है।'
उन्होंने सूफी कविता का उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई हिंदू उर्दू में सूफी गजल गाता है, तो उसका धर्म भ्रष्ट नहीं होता। इसी तर्क पर, किसी अन्य धर्म के व्यक्ति द्वारा संस्कृत में रचित गीत गाने से उसकी आस्था पर कोई आँच नहीं आती।
संस्कृत और सांस्कृतिक विरासत का संदर्भ
अंगमो ने वेद और उपनिषदों को 10,000 वर्ष पुरानी संस्कृत परंपरा का हिस्सा बताते हुए कहा कि जिस प्रकार इतालवी ओपेरा सीखने के लिए लैटिन का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार संस्कृत को किसी एक धर्म या राजनीतिक दल की संपत्ति मानना गलत है।
उन्होंने कहा, 'अगर हम गायत्री मंत्र गाते हैं या योगा करते हैं, जिसमें संस्कृत श्लोक हैं, तो संस्कृत को हिंदू धर्म के साथ जोड़ना और राजनीतिक दल के साथ जोड़ना गलत है। संस्कृत एक बहुत पुरानी भाषा है।'
देवी-देवताओं के संदर्भ को प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें
अंगमो ने 'वंदे मातरम' में दुर्गा और लक्ष्मी के उल्लेख को धार्मिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक बताया। उनके अनुसार, 'दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं। इसलिए, अगर किसी को गीत गाने से कोई आपत्ति है, तो आप उसे बदल नहीं सकते। पहले दो छंद इसलिए चुने गए थे, क्योंकि गीत बहुत लंबा था। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी छंदों को स्वीकार नहीं किया गया था। आप किसी भी कलाकृति को काट नहीं सकते।'
उन्होंने यह भी कहा कि 'वंदे मातरम' एक प्रेरक शक्ति है — यह अन्य समस्याओं का विकल्प नहीं, बल्कि उनसे लड़ने की भावना है।
भारत की सभ्यतागत पहचान और बंकिम चंद्र का दर्शन
अंगमो ने कहा कि भारत यूरोपीय देशों की तरह महज एक राजनीतिक या भौगोलिक इकाई नहीं है। 1600 के दशक के बाद जब दुनियाभर में नए राष्ट्र-राज्य बने, उससे पहले भारत एक सभ्यतागत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान था — कश्मीर से दक्षिण तक।
उन्होंने श्री अरबिंदो के हवाले से कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने जब 'आनंदमठ' लिखा, तो वे एक ऋषि की दृष्टि से इस भूमि को 'शक्ति' — एक जीवित सत्ता — के रूप में देख रहे थे। उन्होंने कहा, 'इसलिए इसमें 80 साल नहीं लगने चाहिए थे। शायद अगर हमें यह समझ पहले होती, तो आज हमें भारत के बंटवारे की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।'
राजनीतिक एजेंडा बनाम आम जनता की भावना
अंगमो ने स्पष्ट किया कि 'वंदे मातरम' को लेकर असहमति आम नागरिकों में उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक विमर्श में दिखती है। उनके अनुसार, 'कई बार, राजनेता अपने एजेंडे के लिए बंटवारे वाली सोच को बढ़ावा देते हैं।'
उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण दिया, जो उपनिषद, गीता और श्री अरबिंदो की रचनाएँ पढ़ते थे। अंगमो ने कहा कि वे स्वयं सूफी कविताएँ पढ़ती हैं, और इससे किसी का धर्म दूषित नहीं होता — बल्कि परस्पर सीखना ही भारत की असली ताकत है।
अंत में उन्होंने कहा, 'हमारा दिल इतना बड़ा होना चाहिए कि हम सबको अपना सकें, लेकिन साथ ही हमें अपनी जीवन-शक्ति, अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को भी जिंदा रखना चाहिए। यही मेल भारत को एक महान देश बना सकता है।'