3 सितंबर 2026
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'दिमागी नक्सल' कहना सवाल पूछने वालों के साथ असंवेदनशीलता — गीतांजलि अंगमो

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'दिमागी नक्सल' कहना सवाल पूछने वालों के साथ असंवेदनशीलता — गीतांजलि अंगमो

सारांश

सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' शब्द को असंवेदनशील बताते हुए कहा कि उपनिषदों से गीता तक — भारत की अपनी परंपरा में सवाल पूछना सदा सकारात्मक रहा है। उनका यह बयान राष्ट्रीय बहस में एक नई आवाज़ जोड़ता है।

मुख्य बातें

गीतांजलि अंगमो ने 3 सितंबर को 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल को असंवेदनशील बताया।
उन्होंने कहा कि भारत अभी भी 16वीं-17वीं सदी के यूरोपीय ढाँचों का अनुसरण कर रहा है — यह एक 'गुलाम मानसिकता' है।
ओपेनहाइमर, आइंस्टीन और प्लेटो जैसे पश्चिमी विचारकों ने भारतीय ग्रंथों से विचार लिए, पर उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया।
उपनिषदों में नचिकेता-यम और गीता में अर्जुन-कृष्ण संवाद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा — प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सवाल गलत नहीं, सवाल के पीछे का मकसद देखा जाना चाहिए।

पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की पत्नी और शिक्षाविद् गीतांजलि अंगमो ने 3 सितंबर को 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सवाल पूछने वाले किसी भी व्यक्ति को इस तरह का लेबल लगाना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि भारत की अपनी दार्शनिक परंपरा के विरुद्ध भी है। गीतांजलि के यह विचार ऐसे समय में सामने आए हैं जब 'दिमागी नक्सल' पद को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो रही है।

गुलाम मानसिकता और पश्चिमी ढाँचे पर सवाल

गीतांजलि अंगमो ने कहा कि भारत में आर्थिक, शैक्षिक और वैज्ञानिक ढाँचे अभी भी मुख्यतः उन्हीं यूरोपीय विचारकों और वैज्ञानिकों के सिद्धांतों पर टिके हैं जो 16वीं और 17वीं सदी के पुनर्जागरण काल में सामने आए। उन्होंने इसे एक प्रकार की 'गुलाम मानसिकता' बताया।

उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से एक गुलाम मानसिकता है। क्योंकि हमारे सभी ढाँचे — आर्थिक, शैक्षिक, भौतिकी, गणित, सब कुछ — जो भी प्रमेय के नाम हैं, जब 16वीं और 17वीं सदी में पुनर्जागरण हुआ, तो भारत आज भी उन्हीं का पालन कर रहा है।"

भारतीय ग्रंथों और पश्चिमी विचारकों का संबंध

गीतांजलि अंगमो ने यह भी कहा कि उस दौर में यूरोप के हर विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा का अध्ययन होता था। उनके अनुसार कई प्रमुख पश्चिमी विचारकों ने भारतीय दार्शनिक ग्रंथों से विचार ग्रहण किए, लेकिन उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने दावा किया, "हम जानते हैं कि ओपेनहाइमर ने गीता पढ़ी, आइंस्टीन ने उपनिषद पढ़े, और प्लेटो व कई पश्चिमी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने भारतीय ग्रंथों को पढ़ा, उनसे विचार लिए। लेकिन कई बार, उन्होंने उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में पेश किया और हमने उस दूसरे-हाथ वाले संस्करण को स्वीकार कर लिया।"

'दिमागी नक्सल' शब्द पर आपत्ति

गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' शब्द के प्रयोग को भारत की दार्शनिक और शैक्षिक परंपरा के विपरीत बताया। उन्होंने कहा, "मेरे लिए, किसी ऐसे व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना जो सवाल पूछता है, बहुत असंवेदनशील तरीका है। हमारी अपनी परंपरा में पूछने या सवाल करने को कभी भी नकारात्मक नहीं माना गया है।"

उन्होंने उपनिषदों और गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि नचिकेता ने यम से सवाल पूछे, और अर्जुन ने कृष्ण से — यहाँ तक कि कभी-कभी असहमति भी जताई। उनके शब्दों में, "तो हम अर्जुन को 'दिमागी नक्सल' नहीं कर सकते।"

सवाल के पीछे के मकसद पर जोर

गीतांजलि अंगमो ने यह भी स्पष्ट किया कि सवाल पूछना स्वयं में गलत नहीं है, बल्कि उसके पीछे का उद्देश्य महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा, "सवाल पूछना हमारे शिक्षा सिस्टम का हिस्सा रहा है। कुछ बच्चे सचमुच उत्सुकता के कारण सवाल पूछते हैं, जबकि कुछ बच्चे किसी और मकसद से ऐसा कर सकते हैं। इसलिए, सवाल पूछना गलत नहीं है — हमें सवाल के पीछे के मकसद पर ध्यान देना चाहिए।"

यह बयान शिक्षा, संस्कृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही राष्ट्रीय बहस में एक नया आयाम जोड़ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो वे प्रश्नकर्ता को अपराधी बना देते हैं — जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंताजनक संकेत है। विडंबना यह है कि जिस भारतीय ज्ञान परंपरा की दुहाई दी जाती है, उसी परंपरा का मूल आधार — उपनिषदिक संवाद और गीता का प्रश्नोत्तर — असहमति और जिज्ञासा पर टिका है। मुख्यधारा की बहस इस अंतर्विरोध को अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' शब्द पर क्या कहा?
गीतांजलि अंगमो ने कहा कि सवाल पूछने वाले किसी व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना बहुत असंवेदनशील तरीका है। उनके अनुसार भारतीय परंपरा में प्रश्न पूछना कभी नकारात्मक नहीं माना गया।
गीतांजलि अंगमो कौन हैं?
गीतांजलि अंगमो पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी हैं। वे स्वयं शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रूप से अपने विचार रखती हैं।
गीतांजलि अंगमो ने भारतीय परंपरा में प्रश्न पूछने के कौन-से उदाहरण दिए?
उन्होंने उपनिषदों में नचिकेता द्वारा यम से प्रश्न पूछने और गीता में अर्जुन द्वारा कृष्ण से सवाल करने — यहाँ तक कि असहमति जताने — का उदाहरण दिया। उनके अनुसार यही भारतीय ज्ञान परंपरा का सार है।
गीतांजलि अंगमो ने पश्चिमी ढाँचों पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि भारत आज भी 16वीं-17वीं सदी के यूरोपीय पुनर्जागरण से निकले ढाँचों का अनुसरण कर रहा है, जो एक 'गुलाम मानसिकता' को दर्शाता है। उनके अनुसार ओपेनहाइमर, आइंस्टीन और प्लेटो जैसे विचारकों ने भारतीय ग्रंथों से विचार लिए, लेकिन उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया।
क्या गीतांजलि अंगमो के अनुसार सवाल पूछना हमेशा सही है?
उन्होंने कहा कि सवाल पूछना स्वयं में गलत नहीं है, लेकिन सवाल के पीछे का मकसद देखा जाना चाहिए। उत्सुकता से पूछे गए सवाल और किसी अन्य उद्देश्य से पूछे गए सवाल में अंतर होता है।
राष्ट्र प्रेस
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