'दिमागी नक्सल' कहना सवाल पूछने वालों के साथ असंवेदनशीलता — गीतांजलि अंगमो
सारांश
मुख्य बातें
पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की पत्नी और शिक्षाविद् गीतांजलि अंगमो ने 3 सितंबर को 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सवाल पूछने वाले किसी भी व्यक्ति को इस तरह का लेबल लगाना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि भारत की अपनी दार्शनिक परंपरा के विरुद्ध भी है। गीतांजलि के यह विचार ऐसे समय में सामने आए हैं जब 'दिमागी नक्सल' पद को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो रही है।
गुलाम मानसिकता और पश्चिमी ढाँचे पर सवाल
गीतांजलि अंगमो ने कहा कि भारत में आर्थिक, शैक्षिक और वैज्ञानिक ढाँचे अभी भी मुख्यतः उन्हीं यूरोपीय विचारकों और वैज्ञानिकों के सिद्धांतों पर टिके हैं जो 16वीं और 17वीं सदी के पुनर्जागरण काल में सामने आए। उन्होंने इसे एक प्रकार की 'गुलाम मानसिकता' बताया।
उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से एक गुलाम मानसिकता है। क्योंकि हमारे सभी ढाँचे — आर्थिक, शैक्षिक, भौतिकी, गणित, सब कुछ — जो भी प्रमेय के नाम हैं, जब 16वीं और 17वीं सदी में पुनर्जागरण हुआ, तो भारत आज भी उन्हीं का पालन कर रहा है।"
भारतीय ग्रंथों और पश्चिमी विचारकों का संबंध
गीतांजलि अंगमो ने यह भी कहा कि उस दौर में यूरोप के हर विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा का अध्ययन होता था। उनके अनुसार कई प्रमुख पश्चिमी विचारकों ने भारतीय दार्शनिक ग्रंथों से विचार ग्रहण किए, लेकिन उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने दावा किया, "हम जानते हैं कि ओपेनहाइमर ने गीता पढ़ी, आइंस्टीन ने उपनिषद पढ़े, और प्लेटो व कई पश्चिमी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने भारतीय ग्रंथों को पढ़ा, उनसे विचार लिए। लेकिन कई बार, उन्होंने उन्हें अपने सिद्धांतों के रूप में पेश किया और हमने उस दूसरे-हाथ वाले संस्करण को स्वीकार कर लिया।"
'दिमागी नक्सल' शब्द पर आपत्ति
गीतांजलि अंगमो ने 'दिमागी नक्सल' शब्द के प्रयोग को भारत की दार्शनिक और शैक्षिक परंपरा के विपरीत बताया। उन्होंने कहा, "मेरे लिए, किसी ऐसे व्यक्ति को 'दिमागी नक्सल' कहना जो सवाल पूछता है, बहुत असंवेदनशील तरीका है। हमारी अपनी परंपरा में पूछने या सवाल करने को कभी भी नकारात्मक नहीं माना गया है।"
उन्होंने उपनिषदों और गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि नचिकेता ने यम से सवाल पूछे, और अर्जुन ने कृष्ण से — यहाँ तक कि कभी-कभी असहमति भी जताई। उनके शब्दों में, "तो हम अर्जुन को 'दिमागी नक्सल' नहीं कर सकते।"
सवाल के पीछे के मकसद पर जोर
गीतांजलि अंगमो ने यह भी स्पष्ट किया कि सवाल पूछना स्वयं में गलत नहीं है, बल्कि उसके पीछे का उद्देश्य महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा, "सवाल पूछना हमारे शिक्षा सिस्टम का हिस्सा रहा है। कुछ बच्चे सचमुच उत्सुकता के कारण सवाल पूछते हैं, जबकि कुछ बच्चे किसी और मकसद से ऐसा कर सकते हैं। इसलिए, सवाल पूछना गलत नहीं है — हमें सवाल के पीछे के मकसद पर ध्यान देना चाहिए।"
यह बयान शिक्षा, संस्कृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही राष्ट्रीय बहस में एक नया आयाम जोड़ता है।