17 अगस्त 2026
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'दिमागी नक्सल' पर त्रिवेदी का चिदंबरम से सवाल: मनमोहन सिंह ने 2006 में नक्सलवाद को क्यों बताया था सबसे बड़ा खतरा?

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'दिमागी नक्सल' पर त्रिवेदी का चिदंबरम से सवाल: मनमोहन सिंह ने 2006 में नक्सलवाद को क्यों बताया था सबसे बड़ा खतरा?

सारांश

प्रधानमंत्री मोदी के 'दिमागी नक्सल' बयान के 24 घंटे के भीतर BJP ने कांग्रेस को घेरा। त्रिवेदी ने चिदंबरम से पूछा — जब मनमोहन सिंह ने 2006 में नक्सलवाद को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बताया था, तो आज पार्टी का रुख क्यों बदल गया? यह बहस सुरक्षा नीति से आगे बढ़कर वैचारिक जमीन पर आ गई है।

मुख्य बातें

सुधांशु त्रिवेदी ने 17 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस और पी.
चिदंबरम पर निशाना साधा।
त्रिवेदी ने 13 अप्रैल 2006 का डॉ.
मनमोहन सिंह का वह बयान उद्धृत किया जिसमें नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा बताया गया था।
यूपीए काल में 180 से अधिक जिले नक्सल प्रभावित थे; 2010 दंतेवाड़ा हमले में 75 से अधिक CRPF जवान शहीद हुए।
चिदंबरम के कार्यकाल में 5,000 से अधिक नागरिक मारे गए और 1,913 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए — BJP का दावा।
मोदी सरकार के दौर में प्रभावित क्षेत्रों में 1,800+ बैंक शाखाएँ , 1,200+ एटीएम , 6,000+ मोबाइल टॉवर और 22 लाख आयुष्मान कार्ड — सरकार का दावा।
त्रिवेदी ने कांग्रेस से वैचारिक दोहरेपन पर स्पष्ट जवाब माँगा।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने सोमवार, 17 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम पर तीखा हमला बोला। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में उठाए गए 'दिमागी नक्सल' के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए कहा कि इस बयान के विरोध में 24 घंटे के भीतर सामने आए लोगों ने खुद ही यह जाहिर कर दिया कि 'नक्सली सोच' किसके भीतर पलती है।

मनमोहन सिंह के 2006 के बयान का हवाला

त्रिवेदी ने कांग्रेस और चिदंबरम को पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 13 अप्रैल 2006 का वह बयान याद दिलाया, जिसमें उन्होंने नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया था। BJP सांसद ने सीधा सवाल उठाया कि कांग्रेस के लिए मनमोहन सिंह की बात सही थी या आज चिदंबरम का रुख — दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते।

त्रिवेदी के अनुसार, चिदंबरम ने खुद को 'दिमागी नक्सल' कहे जाने पर गर्व व्यक्त किया है — एक ऐसी स्थिति जो कांग्रेस के भीतर वैचारिक दोहरेपन को उजागर करती है।

यूपीए काल में नक्सलवाद का विस्तार

BJP प्रवक्ता ने आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान नक्सलवाद का प्रभाव देश के 180 से अधिक जिलों तक फैला हुआ था। उस दौर में 'पशुपति से तिरुपति' तक रेड कॉरिडोर की चर्चा आम थी। उन्होंने 2010 के दंतेवाड़ा हमले का विशेष उल्लेख किया, जिसमें सीआरपीएफ के 75 से अधिक जवान शहीद हुए थे।

त्रिवेदी ने यह भी कहा कि चिदंबरम के शासनकाल में 5,000 से अधिक निर्दोष नागरिकों की मौत हुई, सुरक्षा बलों के 1,913 जवान नक्सली अभियानों में शहीद हुए और नक्सलियों के पास उपलब्ध 92 प्रतिशत से अधिक हथियार पुलिस से लूटे हुए थे।

मोदी सरकार की उपलब्धियों का दावा

त्रिवेदी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने उन समस्याओं को निर्णायक रूप से नियंत्रित किया जिन्हें कांग्रेस सरकारें दशकों में नहीं सुलझा सकीं। उन्होंने बताया कि पूर्व प्रभावित क्षेत्रों में अब 1,800 से अधिक बैंक शाखाएँ, 1,200 से अधिक एटीएम और 6,000 से अधिक मोबाइल टॉवर स्थापित हो चुके हैं। इसके अलावा, 22 लाख लोगों को आयुष्मान भारत कार्ड उपलब्ध कराए जा चुके हैं।

उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2026 तक सरकार ने नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता हासिल करने का दावा किया है — वही खतरा जिसे मनमोहन सिंह ने 2006 में सबसे गंभीर बताया था।

वैचारिक लड़ाई पर जोर

त्रिवेदी ने स्पष्ट किया कि नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए — इसके वैचारिक प्रभाव से निपटना भी उतना ही जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने प्रधानमंत्री के 'दिमागी नक्सल' वाले बयान को प्रासंगिक और महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कांग्रेस से इस पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब माँगा और कहा कि जिन्हें इन क्षेत्रों का विकास खराब लगता है, वही 'दिमागी नक्सली' हैं। आने वाले दिनों में यह राजनीतिक बहस और तीखी होने के संकेत हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

एटीएम, मोबाइल टॉवर — सकारात्मक हैं, किंतु स्वतंत्र सत्यापन के बिना ये केवल दावे हैं। यह बहस जितनी सुरक्षा नीति की है, उतनी ही वैचारिक वर्चस्व की भी — और मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस फर्क को नज़रअंदाज़ कर देती है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'दिमागी नक्सल' क्या है और प्रधानमंत्री मोदी ने इसे क्यों उठाया?
'दिमागी नक्सल' वह पद है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जो कथित तौर पर नक्सली विचारधारा से वैचारिक रूप से प्रभावित हैं, भले ही वे सशस्त्र आंदोलन से न जुड़े हों। BJP के अनुसार यह अवधारणा नक्सलवाद के वैचारिक आयाम को संबोधित करती है।
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने चिदंबरम पर क्या आरोप लगाए?
त्रिवेदी ने दावा किया कि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खुद को 'दिमागी नक्सल' कहे जाने पर गर्व व्यक्त किया है। उन्होंने यह भी कहा कि चिदंबरम के गृह मंत्री रहते नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 5,000 से अधिक नागरिक मारे गए और 1,913 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए।
मनमोहन सिंह ने 2006 में नक्सलवाद के बारे में क्या कहा था?
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 13 अप्रैल 2006 को नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। BJP इस बयान का हवाला देकर यह सवाल उठा रही है कि कांग्रेस का आज का रुख उनके अपने पूर्व प्रधानमंत्री की सोच से क्यों अलग है।
यूपीए काल में नक्सलवाद की स्थिति कितनी गंभीर थी?
BJP के दावों के अनुसार, यूपीए सरकार के दौरान 180 से अधिक जिले नक्सल प्रभावित थे और 'पशुपति से तिरुपति' तक रेड कॉरिडोर का विस्तार था। 2010 में दंतेवाड़ा हमले में CRPF के 75 से अधिक जवान शहीद हुए थे; नक्सलियों के 92 प्रतिशत से अधिक हथियार पुलिस से लूटे हुए बताए गए।
मोदी सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में क्या बदलाव किए हैं?
सरकार के दावे के अनुसार, पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 1,800 से अधिक बैंक शाखाएँ, 1,200 से अधिक एटीएम और 6,000 से अधिक मोबाइल टॉवर स्थापित किए जा चुके हैं। इसके अलावा 22 लाख लोगों को आयुष्मान भारत कार्ड दिए गए हैं और 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता का दावा किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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