20 अगस्त 2026
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जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव विकास की अग्रपंक्ति में: उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का कठुआ दौरा

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जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव विकास की अग्रपंक्ति में: उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का कठुआ दौरा

सारांश

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कठुआ के सीमावर्ती गांव करोल कृष्णा में वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम की समीक्षा की। 216 गांवों में सड़क-बिजली पहुंची, ग्रामीण आय 30% बढ़ी और पलायन आधा हुआ — लेकिन असली परीक्षा इन आंकड़ों की ज़मीनी स्थायित्व की है।

मुख्य बातें

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 20 अगस्त 2026 को कठुआ के सीमावर्ती गांव करोल कृष्णा का दौरा किया।
2019 के बाद से कठुआ के सभी 216 सीमावर्ती गांव सड़क-संपर्क और बिजली से जुड़ चुके हैं।
ग्रामीण आय में 30% वृद्धि, शहरों की ओर पलायन आधा , बेरोजगारी भी लगभग आधी हुई।
सीमा पर 2,000 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर बनाए गए।
1,300 से अधिक स्वयं-सहायता समूहों से 12,000 से अधिक परिवारों को लाभ मिल रहा है।
सिन्हा ने चार संकल्प रेखांकित किए — बाज़ार-संपर्क, युवा रोजगार, स्वास्थ्य सेवा और सुरक्षा-ढांचा।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 20 अगस्त 2026 को कठुआ जिले के सीमावर्ती गांव 'करोल कृष्णा' का दौरा किया, जो वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के अंतर्गत आता है। इस अवसर पर उन्होंने स्थानीय परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ वितरित किया और युवाओं को नियुक्ति-पत्र सौंपे। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के सीमावर्ती गांव अब उपेक्षा के हाशिए पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की अग्रपंक्ति में हैं।

मुख्य संबोधन और संदेश

करोल कृष्णा, रथुआ, गजनल, बोबिया, कडियाला और गुज्जर चक — इन 6 सीमावर्ती गांवों के निवासियों को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल सिन्हा ने कहा कि दशकों तक 'बॉर्डर' शब्द दूरी और उपेक्षा का पर्याय बना रहा। उन्होंने कहा कि ये गांव भारत के आखिरी गांव नहीं, बल्कि पहले गांव हैं — जहाँ देश की पहचान सांस लेती है और तिरंगा लहराता है। उनके अनुसार, जब भारत के विकास की कहानी लिखी जाएगी, तो उसका पहला अध्याय इन्हीं गांवों से शुरू होना चाहिए।

2019 के बाद का विकास: आंकड़े और तथ्य

उपराज्यपाल ने बताया कि 2019 के बाद से कठुआ जिले के सभी 216 सीमावर्ती गांव सड़क-संपर्क से जुड़ चुके हैं और प्रत्येक घर तक बिजली पहुँच गई है। दूरसंचार और टेलीविजन सेवाएं, जो कभी सीमित थीं, अब हर घर की दहलीज तक उपलब्ध हैं। आंकड़ों के अनुसार, गरीबी का स्तर घटा है, शहरों की ओर पलायन आधा हो गया है, और ग्रामीण आय में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही बेरोजगारी भी पहले के स्तर से लगभग आधी रह गई है।

सीमा पर रहने वाले परिवारों की सुरक्षा के लिए 2,000 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर बनाए गए हैं। सिन्हा ने कहा कि ये आंकड़े केवल सरकारी रिपोर्टों की संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि ये आम जीवन में आए असली बदलाव को दर्शाते हैं।

नारी शक्ति और स्वयं-सहायता समूहों की भूमिका

उपराज्यपाल ने सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को बदलने में महिलाओं की भूमिका की सराहना की। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 1,300 से अधिक स्वयं-सहायता समूह गठित किए गए हैं, जिनसे 12,000 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और लघु उद्यमों में सक्रिय हैं, जिससे घर और गांव दोनों की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।

युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार

सिन्हा ने सीमावर्ती गांवों के युवाओं से महानगरों की तरह बड़े सपने देखने की अपील की। उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूलों में अब डिजिटल क्लासरूम, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पूर्ण शैक्षणिक सत्र उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन केवल भौतिक नहीं, बल्कि एक पीढ़ी का रूपांतरण है।

चार संकल्प और आगे की राह

उपराज्यपाल ने सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए चार प्रमुख संकल्प रेखांकित किए — पहला, गांवों को सड़कों के साथ-साथ बाजारों से जोड़कर आत्मनिर्भरता, बागवानी और डेयरी सहकारिता को बढ़ावा देना; दूसरा, कृषि, पर्यटन, रक्षा-सहायक सेवाओं और हस्तशिल्प में युवाओं के लिए अवसर सृजित करना; तीसरा, स्वास्थ्य सेवाओं और टेली-मेडिसिन कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना; और चौथा, नागरिक प्रशासनसशस्त्र बलों के बीच समन्वय बढ़ाकर मजबूत सुरक्षा-ढांचा तैयार करना। उन्होंने जोर दिया कि विकास और सुरक्षा अलग-अलग लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ही लक्ष्य के दो स्तंभ हैं — केवल सुरक्षित गांव ही खुशहाल और आत्मनिर्भर भारत की नींव बन सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ये सरकारी स्रोतों से आए हैं और स्वतंत्र सत्यापन की प्रतीक्षा में हैं। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम की असली कसौटी यह है कि क्या ये गांव केवल बुनियादी ढांचे से जुड़े हैं, या आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा और विकास को एक साथ साधना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, पर यह भी देखना होगा कि 2,000 बंकरों की ज़रूरत क्यों बनी हुई है — विकास का दावा और सुरक्षा की अनिवार्यता एक साथ चलना एक विरोधाभास भी उजागर करता है।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम क्या है और इसमें कौन से गांव शामिल हैं?
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम केंद्र सरकार की एक योजना है जिसका उद्देश्य सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचा, रोजगार और सेवाएं सुनिश्चित करना है। कठुआ जिले में करोल कृष्णा, रथुआ, गजनल, बोबिया, कडियाला और गुज्जर चक जैसे गांव इस कार्यक्रम के अंतर्गत आते हैं।
कठुआ के सीमावर्ती गांवों में 2019 के बाद क्या बदलाव आए हैं?
2019 के बाद से कठुआ के सभी 216 सीमावर्ती गांव सड़क-संपर्क और बिजली से जुड़ चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण आय 30% बढ़ी है, शहरों की ओर पलायन आधा हो गया है और बेरोजगारी भी पहले के स्तर से लगभग आधी रह गई है।
सीमावर्ती गांवों में महिलाओं के लिए क्या किया गया है?
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 1,300 से अधिक स्वयं-सहायता समूह बनाए गए हैं, जिनसे 12,000 से अधिक परिवारों को लाभ मिल रहा है। महिलाएं सिलाई, कढ़ाई और हस्तशिल्प जैसे लघु उद्यमों से जुड़कर पारिवारिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं।
सीमावर्ती गांवों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?
सीमा पर रहने वाले परिवारों की सुरक्षा के लिए 2,000 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर बनाए गए हैं। उपराज्यपाल सिन्हा ने नागरिक प्रशासन और सशस्त्र बलों के बीच समन्वय बढ़ाने को भी प्राथमिकता बताया।
उपराज्यपाल सिन्हा ने सीमावर्ती गांवों के लिए कौन से चार संकल्प बताए?
उन्होंने चार संकल्प रेखांकित किए — बाज़ारों से जोड़कर आत्मनिर्भरता और डेयरी-बागवानी सहकारिता को बढ़ावा देना; युवाओं के लिए कृषि, पर्यटन और हस्तशिल्प में अवसर सृजित करना; टेली-मेडिसिन सहित स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना; और मजबूत सुरक्षा-ढांचे के लिए नागरिक व सैन्य समन्वय बढ़ाना।
राष्ट्र प्रेस
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