जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव विकास की अग्रपंक्ति में: उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का कठुआ दौरा
सारांश
मुख्य बातें
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 20 अगस्त 2026 को कठुआ जिले के सीमावर्ती गांव 'करोल कृष्णा' का दौरा किया, जो वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के अंतर्गत आता है। इस अवसर पर उन्होंने स्थानीय परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ वितरित किया और युवाओं को नियुक्ति-पत्र सौंपे। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के सीमावर्ती गांव अब उपेक्षा के हाशिए पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की अग्रपंक्ति में हैं।
मुख्य संबोधन और संदेश
करोल कृष्णा, रथुआ, गजनल, बोबिया, कडियाला और गुज्जर चक — इन 6 सीमावर्ती गांवों के निवासियों को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल सिन्हा ने कहा कि दशकों तक 'बॉर्डर' शब्द दूरी और उपेक्षा का पर्याय बना रहा। उन्होंने कहा कि ये गांव भारत के आखिरी गांव नहीं, बल्कि पहले गांव हैं — जहाँ देश की पहचान सांस लेती है और तिरंगा लहराता है। उनके अनुसार, जब भारत के विकास की कहानी लिखी जाएगी, तो उसका पहला अध्याय इन्हीं गांवों से शुरू होना चाहिए।
2019 के बाद का विकास: आंकड़े और तथ्य
उपराज्यपाल ने बताया कि 2019 के बाद से कठुआ जिले के सभी 216 सीमावर्ती गांव सड़क-संपर्क से जुड़ चुके हैं और प्रत्येक घर तक बिजली पहुँच गई है। दूरसंचार और टेलीविजन सेवाएं, जो कभी सीमित थीं, अब हर घर की दहलीज तक उपलब्ध हैं। आंकड़ों के अनुसार, गरीबी का स्तर घटा है, शहरों की ओर पलायन आधा हो गया है, और ग्रामीण आय में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही बेरोजगारी भी पहले के स्तर से लगभग आधी रह गई है।
सीमा पर रहने वाले परिवारों की सुरक्षा के लिए 2,000 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर बनाए गए हैं। सिन्हा ने कहा कि ये आंकड़े केवल सरकारी रिपोर्टों की संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि ये आम जीवन में आए असली बदलाव को दर्शाते हैं।
नारी शक्ति और स्वयं-सहायता समूहों की भूमिका
उपराज्यपाल ने सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को बदलने में महिलाओं की भूमिका की सराहना की। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 1,300 से अधिक स्वयं-सहायता समूह गठित किए गए हैं, जिनसे 12,000 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और लघु उद्यमों में सक्रिय हैं, जिससे घर और गांव दोनों की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार
सिन्हा ने सीमावर्ती गांवों के युवाओं से महानगरों की तरह बड़े सपने देखने की अपील की। उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूलों में अब डिजिटल क्लासरूम, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पूर्ण शैक्षणिक सत्र उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन केवल भौतिक नहीं, बल्कि एक पीढ़ी का रूपांतरण है।
चार संकल्प और आगे की राह
उपराज्यपाल ने सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए चार प्रमुख संकल्प रेखांकित किए — पहला, गांवों को सड़कों के साथ-साथ बाजारों से जोड़कर आत्मनिर्भरता, बागवानी और डेयरी सहकारिता को बढ़ावा देना; दूसरा, कृषि, पर्यटन, रक्षा-सहायक सेवाओं और हस्तशिल्प में युवाओं के लिए अवसर सृजित करना; तीसरा, स्वास्थ्य सेवाओं और टेली-मेडिसिन कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना; और चौथा, नागरिक प्रशासन व सशस्त्र बलों के बीच समन्वय बढ़ाकर मजबूत सुरक्षा-ढांचा तैयार करना। उन्होंने जोर दिया कि विकास और सुरक्षा अलग-अलग लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ही लक्ष्य के दो स्तंभ हैं — केवल सुरक्षित गांव ही खुशहाल और आत्मनिर्भर भारत की नींव बन सकते हैं।