मेघालय हाई कोर्ट की सरकार को फटकार: न्यायिक अधिकारियों के बिल एक दशक से लंबित, 9% ब्याज का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
मेघालय हाई कोर्ट ने 13 अगस्त 2026 को राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई, क्योंकि न्यायिक अधिकारियों के चिकित्सा और यात्रा व्यय के प्रतिपूर्ति (रीइम्बर्समेंट) बिलों को मंजूरी देने में वर्षों की देरी हुई है — कुछ दावे तो लगभग एक दशक से लंबित हैं। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि 2014 से 2022 के बीच के सभी लंबित दावों पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज का भुगतान किया जाए।
मुख्य घटनाक्रम
चीफ जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस डब्ल्यू. डिएंगडोह की डिवीजन बेंच ने मेघालय हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश जारी किए। बेंच ने पहले ही लॉ और फाइनेंस विभागों के सचिवों को तलब किया था, और दोनों अधिकारी सोमवार को कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुए।
कार्यवाही के दौरान कोर्ट के संज्ञान में आया कि अत्यंत मामूली रकम के बिल भी वर्षों से अटके पड़े हैं। उल्लेखनीय उदाहरणों में अक्टूबर 2014 से ई-प्रपोजल सिस्टम में लंबित ₹57,680 का एक बिल शामिल है, जिस पर आज तक कोई मंजूरी आदेश जारी नहीं हुआ। इसी प्रकार, ₹15,860 का एक दावा 2017 से लॉ डिपार्टमेंट के पास पड़ा है, जबकि ₹22,126 का भुगतान जून 2018 से नहीं हुआ है।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'कुछ रकम तो बहुत ही मामूली और छोटी है, फिर भी उनका भुगतान अब तक नहीं किया गया है।' कोर्ट ने इतनी लंबी देरी के कारणों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की सेवा-शर्तों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हुई है।
सरकार की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल ए. कुमार ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि हाई कोर्ट द्वारा भेजे गए सभी प्रस्तावों पर प्राथमिकता के आधार पर विचार किया जाएगा और उन्हें तेजी से निपटाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों के लंबित बिलों का भुगतान दो सप्ताह के भीतर कर दिया जाएगा।
कोर्ट के निर्देश
कोर्ट ने आदेश दिया कि 2022 के बाद के सभी लंबित बिलों को भी दो सप्ताह के भीतर प्रोसेस कर भुगतान किया जाए। ब्याज की गणना बिल जमा करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक की जाएगी। इसके अतिरिक्त, बेंच ने लॉ डिपार्टमेंट के कमिश्नर और सेक्रेटरी को निर्देश दिया कि वे देरी की जाँच करें और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।
इसी सुनवाई में कोर्ट ने हाई कोर्ट परिसर के निकट जीपीओ की भूमि से संबंधित एक अलग मामले की भी समीक्षा की और एडवोकेट जनरल तथा भारत के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिया कि वे जीपीओ, पीडब्ल्यूडी और अर्बन अफेयर्स डिपार्टमेंट के अधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक कर समाधान निकालें।
आगे क्या होगा
अब सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है — दो सप्ताह की समयसीमा के भीतर भुगतान करना होगा, अन्यथा कोर्ट की अवमानना का सामना करना पड़ सकता है। गौरतलब है कि यह मामला केवल वित्तीय लापरवाही का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और उसके अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा का भी प्रश्न है।