यूजीसी मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: केंद्र को काउंटर एफिडेविट के लिए 4 हफ्ते का समय
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय प्रदान किया। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह समय-सीमा माँगी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही मामले से जुड़े अन्य सभी पक्षों को भी अपने-अपने जवाब और काउंटर एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति दी गई है।
मुख्य घटनाक्रम
सुनवाई के बाद वकील सत्यम पांडे ने बताया कि अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर अपना काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत करे। मामले से संबद्ध अन्य पक्षों को भी इसी अवधि में अपने जवाब दाखिल करने की छूट दी गई है। इसके बाद मामला पुनः अदालत के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।
याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल
सुनवाई के दौरान वकील सत्यम पांडे ने 2019 में दायर आबिदा सलीम तड़वी की याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि यह याचिका एक जनहित याचिका (पीआईएल) के रूप में दाखिल की गई है, और पीआईएल में याचिकाकर्ता का कोई व्यक्तिगत हित नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि इसी याचिका के आधार पर यूजीसी का ड्राफ्ट तैयार करने का आदेश पारित हुआ था।
पांडे ने अदालत को बताया कि आबिदा सलीम तड़वी, पायल सलीम तड़वी की माँ हैं। पायल सलीम तड़वी की कथित तौर पर जाति उत्पीड़न से परेशान होकर आत्महत्या किए जाने की बात इस मामले से जुड़ी है। ऐसे में उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता का इस मामले में प्रत्यक्ष व्यक्तिगत हित है, जो पीआईएल की मूल भावना के विपरीत है।
निचली अदालत के ट्रायल पर असर की आशंका
वकील सत्यम पांडे ने यह भी तर्क दिया कि इस पीआईएल से एक ऐसा सामाजिक परसेप्शन बन सकता है जिसमें निचली अदालत में ट्रायल का सामना कर रहे लोगों को पहले से ही दोषी मान लिया जाए। उन्होंने कहा कि भारतीय कानून का मूल सिद्धांत — 'जब तक दोष सिद्ध न हो, निर्दोष माना जाए' — ऐसे माहौल में कमज़ोर पड़ सकता है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से माँग की कि व्यक्तिगत हित रखने वाले पक्षों द्वारा दायर पीआईएल को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और संबंधित याचिका खारिज की जाए।
पृष्ठभूमि
यह मामला यूजीसी के उस ड्राफ्ट से जुड़ा है जिसे सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व आदेश के तहत तैयार किया गया था। 2019 में दायर आबिदा सलीम तड़वी की याचिका को इस प्रक्रिया का आधार माना जाता है। यह ऐसे समय में आया है जब उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव और उत्पीड़न के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
आगे क्या होगा
अब यह मामला चार सप्ताह बाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पुनः सूचीबद्ध होगा। इस अवधि में केंद्र सरकार अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करेगी और अन्य संबंधित पक्ष भी अपने जवाब प्रस्तुत कर सकेंगे। मामले की अगली सुनवाई में पीआईएल की स्वीकार्यता पर अदालत का रुख स्पष्ट होने की संभावना है।