दिल्ली डिस्कॉम सीएजी ऑडिट पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, 15 जुलाई तक यथास्थिति का निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 4 जुलाई 2025 को दिल्ली की निजी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के प्रस्तावित सीएजी ऑडिट पर अंतरिम रोक लगा दी और 15 जुलाई तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। यह आदेश दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) की उन अपीलों पर सुनवाई के दौरान आया, जिनमें बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) के निर्देशों को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय के अगस्त 2025 के एक पुराने फैसले से जुड़ा है, जिसमें 2011 से 2014 के बीच डीईआरसी द्वारा जारी टैरिफ आदेशों की समीक्षा की गई थी। उस फैसले में अदालत ने बिजली वितरण कंपनियों द्वारा संचित नियामकीय परिसंपत्तियों (रेगुलेटरी एसेट्स) पर चिंता व्यक्त करते हुए बिजली नियामक आयोगों को इनकी जाँच का निर्देश दिया था। हालांकि, उस फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि यह ऑडिट कौन संपन्न करेगा।
इसके बाद मार्च 2026 में दिल्ली के उपराज्यपाल ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से ऑडिट कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस निर्णय को एपीटीईएल में चुनौती दी गई, जहाँ न्यायाधिकरण ने कहा कि कानूनी प्रावधानों के तहत डीईआरसी सीएजी को ऑडिट का काम नहीं सौंप सकता और उसने डीईआरसी को एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया।
डीईआरसी की पुनर्विचार याचिकाएँ भी एपीटीईएल ने खारिज कर दीं, जिसके बाद आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मामले में नोटिस जारी करते हुए कहा कि यह विवाद एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल न तो सीएजी ऑडिट की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा और न ही डीईआरसी किसी स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट की नियुक्ति करेगा।
गौरतलब है कि अदालत ने एपीटीईएल के उस विशेष आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसमें डीईआरसी को स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। अगली सुनवाई 15 जुलाई को निर्धारित की गई है।
दोनों पक्षों के तर्क
डीईआरसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अगस्त 2025 के फैसले में जिस ऑडिट का उल्लेख था, वह नियामकीय परिसंपत्तियों से जुड़े मुद्दे के समाधान का अनिवार्य हिस्सा है। उनके अनुसार उपभोक्ताओं से किसी भी प्रकार की वसूली से पहले इस ऑडिट का पूरा होना आवश्यक है।
वहीं बिजली कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस तर्क का विरोध किया। उनका कहना था कि वर्तमान विवाद केवल इस प्रश्न तक सीमित है कि ऑडिट कौन करेगा — ऑडिट और नियामकीय परिसंपत्तियों की वसूली दो पृथक मुद्दे हैं।
आगे क्या होगा
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले में अगस्त 2025 के फैसले की व्याख्या आवश्यक है। इसके लिए अदालत ने मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे उचित पीठ को सौंपा जा सके। यह कदम संकेत देता है कि इस विवाद का अंतिम निपटारा संभवतः एक बड़ी पीठ द्वारा किया जाएगा, जिसका असर दिल्ली के लाखों बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।