20 अगस्त 2026
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यूजीसी जातिगत भेदभाव विरोधी नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र और यूजीसी से चार हफ्ते में माँगा जवाब

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यूजीसी जातिगत भेदभाव विरोधी नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र और यूजीसी से चार हफ्ते में माँगा जवाब

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी के जातिगत भेदभाव विरोधी नियम पर अंतरिम रोक बरकरार रखते हुए केंद्र और यूजीसी से चार हफ्ते में जवाब माँगा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि खंड 3(सी) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और कुछ छात्रों को उच्च शिक्षा से बाहर कर सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार और यूजीसी को चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026' अधिसूचित किया था।
याचिका में खंड 3(सी) को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने इस नियम पर अंतरिम रोक लगाई थी, जो अभी भी जारी है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह नियम यूजीसी अधिनियम, 1956 के विरुद्ध है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उस नियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्तों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। यह नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था, किंतु अब इसकी संवैधानिकता पर कानूनी बहस छिड़ गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026' अधिसूचित किया था। इस नियम का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना था। हालाँकि, याचिकाकर्ताओं ने इसी नियम के खंड 3(सी) को अदालत में चुनौती दी है।

याचिकाकर्ताओं के आरोप

याचिका में आरोप लगाया गया है कि खंड 3(सी) मनमाना और भेदभावपूर्ण है तथा इससे कुछ वर्गों के छात्रों को उच्च शिक्षा से बाहर किए जाने का खतरा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि यह नियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विरुद्ध है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को ही कमज़ोर करता है।

गुरुवार की सुनवाई में क्या हुआ

गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई स्थगित हो गई। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्हें केंद्र सरकार और यूजीसी के जवाब की प्रति अब तक प्राप्त नहीं हुई है। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जवाब की प्रति सभी याचिकाकर्ताओं को अनिवार्य रूप से दी जाए। अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद निर्धारित की गई है।

पिछली सुनवाई में अंतरिम रोक

गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी के इस नियम पर अंतरिम रोक लगा दी थी और केंद्र सरकार तथा यूजीसी को नोटिस जारी किया था। यह ऐसे समय में आया है जब उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं, और नियामक ढाँचे को मज़बूत करने की माँग भी उठती रही है।

आगे क्या होगा

सभी पक्षों का जवाब आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर चार हफ्ते बाद विस्तृत सुनवाई करेगा। इस मुकदमे का परिणाम देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेश से जुड़ी नीतियों की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो वर्षों से दबी पड़ी थीं — फिर भी इसके खंड 3(सी) की भाषा इतनी व्यापक बताई जा रही है कि वह उसी समावेश को कमज़ोर कर सकती है जिसे वह सुरक्षित करना चाहती है। विडंबना यह है कि भेदभाव-विरोधी नियम पर ही भेदभाव का आरोप लग रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की अंतरिम रोक यह संकेत देती है कि न्यायपालिका ने इन चिंताओं को गंभीरता से लिया है। असली सवाल यह है कि क्या यूजीसी ने नियम बनाते समय संवैधानिक सीमाओं की पर्याप्त समीक्षा की थी — और यदि नहीं, तो यह उच्च शिक्षा में नीति-निर्माण की जल्दबाज़ी की एक और मिसाल बन जाएगी।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूजीसी का 'समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026' क्या है?
यह नियम यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया था, जिसका उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है। इसी नियम के खंड 3(सी) को याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी नियम पर रोक क्यों लगाई?
पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने इस नियम पर अंतरिम रोक लगाई थी और केंद्र सरकार व यूजीसी को नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि खंड 3(सी) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और कुछ वर्गों के छात्रों को उच्च शिक्षा से बाहर कर सकता है।
खंड 3(सी) पर क्या आपत्तियाँ हैं?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह खंड मनमाना और भेदभावपूर्ण है तथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। साथ ही यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के विरुद्ध भी बताया गया है।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को केंद्र और यूजीसी को चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। जवाब मिलने के बाद अदालत चार हफ्ते बाद इस मामले पर आगे सुनवाई करेगी।
इस मुकदमे का उच्च शिक्षा पर क्या असर हो सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव विरोधी नीतियों की दिशा तय करेगा। यदि नियम रद्द होता है तो यूजीसी को नए सिरे से नियम बनाने होंगे; यदि बरकरार रहता है तो यह संस्थानों के लिए बाध्यकारी ढाँचा बन जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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