अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: सुप्रीम कोर्ट ने क्रिश्चियन मिशेल की याचिका पर नोटिस जारी किया, 4 हफ्ते में माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 4 मई 2026 को अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की याचिका पर नोटिस जारी किया और सरकार से चार हफ्तों के भीतर जवाब माँगा है। यह याचिका भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के आर्टिकल 17 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए दाखिल की गई थी। मिशेल का तर्क है कि यह प्रावधान भारत के प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 और संविधान के अनुच्छेद 21, 245 एवं 253 के विरुद्ध है।
मुख्य घटनाक्रम
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने की। मिशेल की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह तक कह दिया था कि अंतरराष्ट्रीय संधि संसद द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर मानी जा सकती है, जो कि उनके अनुसार कानूनी दृष्टि से सही नहीं है।
मिशेल की मुख्य आपत्ति आर्टिकल 17 पर है, जो यह अनुमति देता है कि प्रत्यर्पित व्यक्ति पर मूल अपराध से जुड़े अन्य अपराधों में भी मुकदमा चलाया जा सके। उनका कहना है कि यह भारत के प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 के सीधे विरोध में है, जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि किसी व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों में मुकदमा चल सकता है जिनके आधार पर उसे प्रत्यर्पित किया गया हो।
दिल्ली उच्च न्यायालय का पूर्व निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने मिशेल की इन दलीलों को पहले ही खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने माना था कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) दोनों संप्रभु देश हैं और उन्होंने आपसी सहमति से यह तय किया है कि प्रत्यर्पित व्यक्ति पर संबंधित अपराधों में भी मुकदमा चलाया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि चूँकि सभी आरोप एक ही तथ्यात्मक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं, इसलिए मुकदमा चलाना उचित है। उच्च न्यायालय ने मिशेल की जेल से रिहाई की माँग और सीआरपीसी की धारा 436ए के तहत दायर आवेदन भी खारिज कर दिए थे।
अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले की पृष्ठभूमि
मिशेल पर आरोप है कि उन्होंने अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी के लिए भारत में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में बिचौलिए की भूमिका निभाई। आरोपों के अनुसार 2005 में हेलीकॉप्टरों की उड़ान ऊँचाई 6,000 मीटर से घटाकर 4,500 मीटर कर दी गई ताकि कंपनी को अनुचित लाभ मिल सके और इसके बदले रिश्वत दी गई।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के अनुसार यह सौदा 8 फरवरी 2010 को 556.262 मिलियन यूरो में हुआ था और इससे देश को करीब 398.21 मिलियन यूरो यानी लगभग ₹2,666 करोड़ का नुकसान हुआ। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप है कि मिशेल को इस डील से करीब 30 मिलियन यूरो यानी लगभग ₹225 करोड़ प्राप्त हुए।
CBI ने इस मामले में 12 मार्च 2013 को प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कई धाराएँ शामिल हैं। ED ने जून 2016 में चार्जशीट दाखिल की थी।
प्रत्यर्पण और वर्तमान हिरासत की स्थिति
मिशेल को 4 दिसंबर 2018 को दुबई से भारत प्रत्यर्पित किया गया था, जो 2 सितंबर 2018 के आदेश के तहत हुआ। गौरतलब है कि उन्हें CBI मामले में 18 फरवरी 2025 को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है और ED मामले में 4 मार्च 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय से भी जमानत मिली थी, परंतु शर्तें पूरी न होने के कारण वह अभी भी हिरासत में हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस के बाद अब यह देखना होगा कि सरकार चार हफ्तों में क्या जवाब पेश करती है। यह मामला भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि और घरेलू प्रत्यर्पण कानून के बीच के संबंध को लेकर एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है, जिसका असर भविष्य के प्रत्यर्पण मामलों पर भी पड़ सकता है।