मेघालय की मातृसत्तात्मक व्यवस्था टिकाऊ खेती का वैश्विक मॉडल: सीएम कॉनराड संगमा
सारांश
मुख्य बातें
मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने 26 जून 2026 को शिलांग के स्टेट कन्वेंशन हॉल में कहा कि राज्य की अनूठी मातृसत्तात्मक परंपरा — जिसमें महिलाएँ भूमि और कृषि की मुख्य संरक्षक होती हैं — टिकाऊ खेती और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में समूचे विश्व के लिए एक प्रेरक मॉडल प्रस्तुत करती है। महिला किसानों और टिकाऊ जैविक खेती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही।
मातृसत्तात्मक व्यवस्था और कृषि का संबंध
मुख्यमंत्री संगमा ने रेखांकित किया कि मेघालय में भूमि पर महिलाओं के मालिकाना हक ने कृषि में जिम्मेदारी, प्रतिबद्धता और दीर्घकालिक सोच को स्वाभाविक रूप से बढ़ावा दिया है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सिद्ध कृषि-प्रशासन मॉडल है जो पीढ़ियों से पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक रही है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पिछले आठ वर्षों में किसानों — विशेषकर महिला किसानों — को अपने विकास एजेंडे के केंद्र में रखा है और किसान-केंद्रित नीतियों के माध्यम से एक सशक्त एवं टिकाऊ कृषि पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित करने का प्रयास किया है।
स्थानीय मॉडल, बाहरी नकल नहीं
संगमा ने स्पष्ट किया कि मेघालय ने दूसरे राज्यों या देशों के कृषि मॉडलों की अंधाधुंध नकल करने के बजाय अपनी भौगोलिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक विशेषताओं के अनुरूप विकास रणनीतियाँ अपनाई हैं। यह दृष्टिकोण, उनके अनुसार, राज्य की असली ताकत है।
उन्होंने सामुदायिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। स्वयं-सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों में उल्लेखनीय वृद्धि ने सामूहिक प्रयासों, बाज़ार तक पहुँच और ग्रामीण आजीविका को बेहतर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई है।
परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय
मुख्यमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि पूर्वोत्तर के पारंपरिक कृषि ज्ञान और खेती के तरीकों को आधुनिक वैज्ञानिक नवाचारों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उनके शब्दों में, इस क्षेत्र के पास एक समृद्ध प्राकृतिक विरासत है जो सदियों से समुदायों को जीवंत रखती आई है। पारिस्थितिक संतुलन से समझौता किए बिना उत्पादकता बढ़ाने के लिए यह समन्वय अनिवार्य है।
पूर्वोत्तर को एकीकृत क्षेत्र के रूप में देखने की अपील
संगमा ने पूर्वोत्तर भारत को एक एकीकृत भू-सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखने की वकालत की, जहाँ साझा पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। उनका मानना है कि इस समग्र दृष्टिकोण से सफल पहलों को बड़े पैमाने पर लागू करना, अधिक निवेश आकर्षित करना और जैविक खेती में वैश्विक प्रभाव बढ़ाना संभव होगा।
उन्होंने संस्थानों, विकास एजेंसियों और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की आवश्यकता पर भी बल दिया — ताकि संसाधन जुटाए जा सकें, नवाचार को प्रोत्साहन मिले और जैविक खेती की पहलों का दायरा बढ़े, साथ ही किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो।
सम्मेलन का स्वरूप
कृषि और किसान कल्याण विभाग द्वारा IFOAM और ऑर्गेनिक्स एशिया के सहयोग से आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि, नीति-निर्माता, विशेषज्ञ और हितधारक एकत्रित हुए। सम्मेलन में महिलाओं के नेतृत्व वाली खेती को सशक्त बनाने, प्राकृतिक विरासत के संरक्षण और टिकाऊ जैविक खेती के तरीकों को आगे बढ़ाने पर गहन विचार-विमर्श हुआ। यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ जब वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा और जलवायु-अनुकूल कृषि की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।