मोहन भागवत के 'सत्ता परिवर्तन' बयान पर विपक्ष का पलटवार, राउत बोले — भागवत भी चाहते हैं बदलाव
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'सत्ता बदलने से परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं।' शिवसेना (यूबीटी), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं ने 20 अक्टूबर 2026 को रोज़गार, महंगाई, निजीकरण और किसानों की दशा जैसे मुद्दे उठाते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। भागवत ने मंगलवार को यह भी कहा था कि भारत को 'तोड़ने' की कोशिशें कभी सफल नहीं होंगी।
भागवत का बयान और उसका संदर्भ
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि यह सोचना गलत है कि सत्ता बदलने से हालात बदल जाते हैं — ऐसा न पहले कभी हुआ है, न आगे होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को तोड़ने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। विपक्षी दलों ने इस बयान की अपने-अपने ढंग से व्याख्या करते हुए पलटवार किया।
शिवसेना (यूबीटी) की प्रतिक्रिया
शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि सत्ता परिवर्तन का विषय किसी के निजी स्वार्थ से नहीं जुड़ा, बल्कि इसका उद्देश्य बेहतर भविष्य और बेहतर देश का निर्माण है। उन्होंने कहा कि समाज के हर वर्ग को रोज़गार, महंगाई से राहत और महिलाओं को सम्मान मिलना चाहिए, और किसानों को उनका उचित हक़ मिलना चाहिए।
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने दावा किया कि 'भागवत भी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं।' उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में देश को नुकसान हुआ है, और कहा कि उनका आंदोलन देश व समाज के हित में है।
पार्टी के एक अन्य सांसद अरविंद सावंत ने दशहरे की शुभकामनाएँ देते हुए भागवत से आत्ममंथन की अपील की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण नहीं हो रहा और क्या बेरोज़गारी लगातार नहीं बढ़ रही? सावंत ने कहा कि 'सलाह देने वालों को मंच पर बैठे लोगों के कामकाज पर भी विचार करना चाहिए।'
राजद और AAP का रुख
राजद सांसद मनोज कुमार झा ने महात्मा गांधी के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि भागवत को चिंता करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि भारत गांधी का देश है। उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन को अपने लिए आदर्श बताया और कहा कि महात्मा गांधी के विचार भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
पंजाब सरकार में मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि युवा बदलाव चाहते हैं और दुनिया के कई हिस्सों में परिवर्तन के प्रयास जारी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भागवत प्रधानमंत्री मोदी को खुश करने के लिए इस तरह के बयान दे रहे हैं और कहा कि युवाओं की आकांक्षाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
आम जनता पर असर और व्यापक संदर्भ
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में चुनावी सरगर्मी तेज़ है और सत्ता परिवर्तन का सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में है। गौरतलब है कि आरएसएस प्रमुख के बयानों को विभिन्न राजनीतिक दल प्रायः अपने-अपने एजेंडे के अनुसार परिभाषित करते हैं। विपक्षी दलों ने इस बार भागवत के बयान को एक अवसर के रूप में लिया और केंद्र सरकार की नीतियों पर व्यापक हमला बोला।
क्या होगा आगे
विपक्षी दलों की यह प्रतिक्रिया आने वाले विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रोज़गार, महंगाई और निजीकरण के मुद्दे पर विपक्ष का केंद्र सरकार को घेरने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है।