मुथंगा भूमि आंदोलन: केरल उच्च न्यायालय ने चार दोषियों की सजा पर लगाई अंतरिम रोक, ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को 2003 के मुथंगा भूमि संघर्ष से जुड़े मामले में चार दोषियों की सजा पर अंतरिम रोक लगा दी। इनमें सामाजिक कार्यकर्ता एम. गीतानंदन भी शामिल हैं। साथ ही अदालत ने सभी अपीलकर्ताओं को ₹36,000 जमा करने का निर्देश दिया है।
अदालत की टिप्पणी और अंतरिम राहत
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की अदालत ने यह रोक दोषियों द्वारा दायर अपील याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान लगाई। अदालत ने मौखिक रूप से वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय के निष्कर्षों को दर्ज करने के तरीके पर गंभीर चिंता जताई और संकेत दिया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में स्पष्ट खामियाँ नज़र आती हैं। यह रोक तत्कालिक है और आगे विस्तृत सुनवाई के बाद ही अंतिम निर्णय होगा।
मुख्य अपीलकर्ता और आरोप
अपील करने वालों में गीतानंदन, बीनू, रामेसन और अनिल कुमार सहित कुल 57 लोग शामिल हैं। 31 जुलाई 2026 को वायनाड सत्र न्यायालय ने चार आरोपियों को गैरकानूनी सभा, दंगा, जानबूझकर चोट पहुँचाना, सरकारी कर्मचारियों को गंभीर रूप से घायल करना, धमकी, अपहरण, खतरनाक हथियारों से हमला और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें पाँच वर्ष के कठोर कारावास और ₹36,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने वरिष्ठ सिविल पुलिस अधिकारी अब्दुल सलाम को मारने की कोशिश की थी और वन क्षेत्र अधिकारी पी.के. ससिधरन का अपहरण करने का प्रयास किया था।
मुथंगा हिंसा: पृष्ठभूमि
19 फरवरी 2003 को मुथंगा वन्यजीव अभयारण्य, वायनाड में उस समय हिंसा भड़की जब पुलिस ने गोत्र महासभा के बैनर तले वहाँ डेरा डाले आदिवासी प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई शुरू की। आदिवासी कार्यकर्ता सी.के. जानू के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन भूमि अधिकारों की माँग को लेकर था। स्थिति हिंसात्मक होने के बाद पुलिस को कथित तौर पर 18 राउंड फायरिंग करनी पड़ी, जिसमें दो प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। झड़पों के दौरान पुलिस कांस्टेबल के.वी. विनोद की भी जान चली गई। यह केरल के इतिहास का सबसे गंभीर जनजातीय संघर्ष माना जाता है।
न्यायिक समीक्षा का महत्व
गौरतलब है कि यह मामला दो दशकों से अधिक समय से न्यायिक प्रक्रिया में है। उच्च न्यायालय की इस अंतरिम राहत से यह स्पष्ट होता है कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों की उच्च स्तर पर पुनः जाँच होगी। यह ऐसे समय में आया है जब आदिवासी भूमि अधिकारों का मुद्दा केरल में एक बार फिर चर्चा में है।
आगे की राह
उच्च न्यायालय में विस्तृत सुनवाई के बाद ही चारों अपीलकर्ताओं के भविष्य का निर्धारण होगा। तब तक सजा पर अंतरिम रोक बनी रहेगी। यह मामला केरल में आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकार और न्यायिक जवाबदेही दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।