31 जुलाई 2026
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मुथांगा फायरिंग केस: 23 साल बाद वायनाड कोर्ट का फैसला — 35 बरी, 21 दोषी करार

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मुथांगा फायरिंग केस: 23 साल बाद वायनाड कोर्ट का फैसला — 35 बरी, 21 दोषी करार

सारांश

23 साल की कानूनी प्रतीक्षा के बाद वायनाड कोर्ट ने मुथांगा फायरिंग केस में फैसला सुनाया — 35 बरी, 21 दोषी। लेकिन हत्या के एकमात्र जिम्मेदार आरोपी की मुकदमे के दौरान ही मौत हो चुकी थी। न्याय का अध्याय बंद हुआ, पर जोगी की मौत के सवाल अभी भी खुले हैं।

मुख्य बातें

वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को मुथांगा पुलिस फायरिंग मामले में फैसला सुनाया — घटना के 23 साल बाद।
35 आरोपियों को अभियोजन पक्ष के साक्ष्य अपर्याप्त पाए जाने पर बरी किया गया; 21 अन्य दंगा, गैर-कानूनी जमावड़े और वन भूमि अतिक्रमण के दोषी पाए गए।
कॉन्स्टेबल केवी विनोद की हत्या के एकमात्र जिम्मेदार आरोपी अशोकन की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी है, इसलिए हत्या के लिए कोई सजा नहीं दी जा सकती।
सीबीआई हत्या की साजिश और हत्या की कोशिश के आरोप साबित करने में नाकाम रही।
आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी की पुलिस फायरिंग में हुई मौत की जाँच की माँग अभी भी जारी है।
यह मामला 19 फरवरी 2003 को मुथांगा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में एजीएमएस के 47 दिनों के कब्जे के बाद हुए पुलिस ऑपरेशन से जुड़ा था।

वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को मुथांगा पुलिस फायरिंग मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया — वारदात के 23 साल से अधिक समय बाद। प्रिंसिपल सेशंस जज ए. अय्यूब खान ने 35 आरोपियों को बरी कर दिया और 21 अन्य को दोषी पाया, जिससे केरल के सबसे लंबे समय से लंबित आपराधिक मुकदमों में से एक का न्यायिक अध्याय बंद हो गया।

फैसले का सार

अदालत ने 35 आरोपियों को इस आधार पर बरी किया कि अभियोजन पक्ष उनके विरुद्ध आरोप प्रमाणित करने में विफल रहा। शेष 21 लोगों को दंगा करने, गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने और वन भूमि पर अतिक्रमण जैसे अपराधों का दोषी ठहराया गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केरल आर्म्ड पुलिस की चौथी बटालियन के कॉन्स्टेबल केवी विनोद की हत्या दूसरे आरोपी अशोकन ने की थी — जिनकी मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी है। एकमात्र दोषी व्यक्ति के जीवित न रहने के कारण हत्या के लिए अब कोई सजा नहीं सुनाई जा सकती।

मुथांगा घटना की पृष्ठभूमि

यह मामला 19 फरवरी 2003 को तत्कालीन एके एंटनी सरकार के कार्यकाल में हुए पुलिस ऑपरेशन से जुड़ा है। आदिवासी नेताओं सी.के. जानू और एम. गीतानंदन के नेतृत्व में आदिवासी गोत्र महा सभा (एजीएमएस) के बैनर तले सैकड़ों आदिवासी परिवारों ने मुथांगा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी की भूमि पर कब्जा किया था।

47 दिनों तक चले इस कब्जे का अंत हिंसक झड़पों में हुआ, जिसमें कॉन्स्टेबल विनोद और आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी — दोनों की जान गई। यह ऐसे समय में आया था जब केरल में आदिवासी भूमि अधिकारों को लेकर आंदोलन अपने चरम पर था।

सीबीआई के आरोप और बचाव पक्ष के तर्क

सीबीआई ने आरोप लगाया था कि झड़प के दौरान कॉन्स्टेबल विनोद को एक अस्थायी शेड में बंधक बनाकर मार डाला गया था। एजेंसी ने गीतानंदन समेत 57 लोगों पर आरोप पत्र दाखिल किया था।

बचाव पक्ष का लगातार यह तर्क रहा कि कथित हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। उनके अनुसार, पत्रकार और अन्य गवाह दूर खड़े थे और पुलिस की लगातार फायरिंग तथा ग्रेनेड विस्फोटों से उठे घने धुएं के कारण शेड के भीतर की घटनाओं को देखना संभव नहीं था। अंततः अदालत ने कथित साजिश को प्रमाणित करने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों को अपर्याप्त पाया।

अधूरे सवाल और आगे की राह

इस फैसले से कॉन्स्टेबल विनोद की मृत्यु से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही तो समाप्त हो गई, लेकिन आदिवासी संगठन आज भी जोगी की मौत के लिए जवाबदेही की माँग जारी रखे हुए हैं। आरोप है कि पुलिस फायरिंग में हुई उनकी मृत्यु की कभी कोई सार्थक जाँच नहीं हुई। गौरतलब है कि मुथांगा कांड ने केरल में आदिवासी अधिकारों की बहस को नई धार दी थी — और दो दशक बाद भी वह बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह न्याय की पूर्णता नहीं है — क्योंकि जिस व्यक्ति को अदालत ने हत्या का दोषी माना, वह मुकदमे के दौरान ही दुनिया छोड़ चुका था। इससे बड़ा सवाल यह उठता है कि 23 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद भी पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय मिला या नहीं। दूसरी ओर, आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी की पुलिस फायरिंग में हुई मौत की जाँच का सवाल आज भी अनुत्तरित है — यह उस असंतुलन को रेखांकित करता है जिसमें राज्य की हिंसा अक्सर जवाबदेही से परे रहती है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुथांगा पुलिस फायरिंग मामला क्या है?
यह मामला 19 फरवरी 2003 को केरल के मुथांगा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में हुए पुलिस ऑपरेशन से जुड़ा है, जिसमें आदिवासी गोत्र महा सभा (एजीएमएस) के बैनर तले जमीन पर कब्जा किए आदिवासी परिवारों को हटाया गया था। इस झड़प में पुलिस कॉन्स्टेबल केवी विनोद और आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी की मौत हो गई थी।
वायनाड कोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला दिया?
प्रिंसिपल सेशंस जज ए. अय्यूब खान ने 35 आरोपियों को बरी कर दिया और 21 को दोषी पाया। हत्या के एकमात्र जिम्मेदार आरोपी अशोकन की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो जाने के कारण हत्या के लिए कोई सजा नहीं सुनाई जा सकी।
सीबीआई इस मामले में क्यों विफल रही?
अदालत ने पाया कि सीबीआई हत्या की साजिश और हत्या की कोशिश के आरोप प्रमाणित करने में असफल रही। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कथित हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और पुलिस फायरिंग व ग्रेनेड धमाकों के धुएं में शेड के अंदर की घटनाएँ देखना संभव नहीं था।
21 दोषी पाए गए लोगों पर क्या आरोप थे?
दोषी ठहराए गए 21 आरोपियों को दंगा करने, गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने और वन भूमि पर अतिक्रमण जैसे अपराधों का दोषी पाया गया। हत्या से जुड़े आरोप किसी पर भी सिद्ध नहीं हुए।
आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी की मौत का मामला कहाँ खड़ा है?
आदिवासी संगठन अभी भी जोगी की मौत — जो कथित तौर पर पुलिस फायरिंग में हुई — के लिए जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। आरोप है कि इस मौत की कभी कोई सार्थक जाँच नहीं की गई, और यह सवाल इस फैसले के बाद भी अनुत्तरित बना हुआ है।
राष्ट्र प्रेस
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