मुथांगा फायरिंग केस: 23 साल बाद वायनाड कोर्ट का फैसला — 35 बरी, 21 दोषी करार
सारांश
मुख्य बातें
वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को मुथांगा पुलिस फायरिंग मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया — वारदात के 23 साल से अधिक समय बाद। प्रिंसिपल सेशंस जज ए. अय्यूब खान ने 35 आरोपियों को बरी कर दिया और 21 अन्य को दोषी पाया, जिससे केरल के सबसे लंबे समय से लंबित आपराधिक मुकदमों में से एक का न्यायिक अध्याय बंद हो गया।
फैसले का सार
अदालत ने 35 आरोपियों को इस आधार पर बरी किया कि अभियोजन पक्ष उनके विरुद्ध आरोप प्रमाणित करने में विफल रहा। शेष 21 लोगों को दंगा करने, गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने और वन भूमि पर अतिक्रमण जैसे अपराधों का दोषी ठहराया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केरल आर्म्ड पुलिस की चौथी बटालियन के कॉन्स्टेबल केवी विनोद की हत्या दूसरे आरोपी अशोकन ने की थी — जिनकी मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी है। एकमात्र दोषी व्यक्ति के जीवित न रहने के कारण हत्या के लिए अब कोई सजा नहीं सुनाई जा सकती।
मुथांगा घटना की पृष्ठभूमि
यह मामला 19 फरवरी 2003 को तत्कालीन एके एंटनी सरकार के कार्यकाल में हुए पुलिस ऑपरेशन से जुड़ा है। आदिवासी नेताओं सी.के. जानू और एम. गीतानंदन के नेतृत्व में आदिवासी गोत्र महा सभा (एजीएमएस) के बैनर तले सैकड़ों आदिवासी परिवारों ने मुथांगा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी की भूमि पर कब्जा किया था।
47 दिनों तक चले इस कब्जे का अंत हिंसक झड़पों में हुआ, जिसमें कॉन्स्टेबल विनोद और आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी — दोनों की जान गई। यह ऐसे समय में आया था जब केरल में आदिवासी भूमि अधिकारों को लेकर आंदोलन अपने चरम पर था।
सीबीआई के आरोप और बचाव पक्ष के तर्क
सीबीआई ने आरोप लगाया था कि झड़प के दौरान कॉन्स्टेबल विनोद को एक अस्थायी शेड में बंधक बनाकर मार डाला गया था। एजेंसी ने गीतानंदन समेत 57 लोगों पर आरोप पत्र दाखिल किया था।
बचाव पक्ष का लगातार यह तर्क रहा कि कथित हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। उनके अनुसार, पत्रकार और अन्य गवाह दूर खड़े थे और पुलिस की लगातार फायरिंग तथा ग्रेनेड विस्फोटों से उठे घने धुएं के कारण शेड के भीतर की घटनाओं को देखना संभव नहीं था। अंततः अदालत ने कथित साजिश को प्रमाणित करने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों को अपर्याप्त पाया।
अधूरे सवाल और आगे की राह
इस फैसले से कॉन्स्टेबल विनोद की मृत्यु से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही तो समाप्त हो गई, लेकिन आदिवासी संगठन आज भी जोगी की मौत के लिए जवाबदेही की माँग जारी रखे हुए हैं। आरोप है कि पुलिस फायरिंग में हुई उनकी मृत्यु की कभी कोई सार्थक जाँच नहीं हुई। गौरतलब है कि मुथांगा कांड ने केरल में आदिवासी अधिकारों की बहस को नई धार दी थी — और दो दशक बाद भी वह बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।