नैनीताल के रामनगर में ड्रोन-DGPS से भूमि सर्वेक्षण शुरू, चार क्षेत्रों में सीमांकन की प्रक्रिया तेज
सारांश
मुख्य बातें
नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र में ड्रोन और डीजीपीएस (डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) तकनीक के माध्यम से भूमि सर्वेक्षण अभियान शुरू हो गया है। पंपापुरी, दुर्गापुरी, कौशल्यापुरी और भरतपुरी — इन चार क्षेत्रों में भूमि गणना और सीमांकन की प्रक्रिया अब आधुनिक तकनीक के सहारे आगे बढ़ाई जा रही है। राजस्व परिषद उत्तराखंड की पहल पर यह विशेष सर्वेक्षण नैनीताल और हरिद्वार जिलों के चयनित गाँवों में कराया जा रहा है।
सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि
ग्रामीण क्षेत्रों में घनी आबादी और जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भूमि बंदोबस्त, चकबंदी और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े मामलों में लंबे समय से कई तरह की समस्याएँ सामने आती रही हैं। राजस्व अभिलेखों को पारदर्शी और सटीक बनाने के उद्देश्य से उत्तराखंड सरकार ने आधुनिक तकनीक आधारित सर्वेक्षण की योजना बनाई। भारतीय सर्वेक्षण विभाग (सर्वे ऑफ इंडिया), देहरादून की विशेषज्ञ टीम अब मैदान में उतरकर भूमि से संबंधित आँकड़े एकत्र कर रही है।
मुख्य घटनाक्रम
रामनगर तहसील में पीएनजीपीजी महाविद्यालय परिसर से चारों क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया गया। गौरतलब है कि इन इलाकों में भूमि गणना और सर्वेक्षण की माँग स्थानीय लोगों द्वारा वर्षों से उठाई जा रही थी। स्थानीय निवासियों का मानना है कि सर्वे पूरा होने के बाद भूमि स्वामित्व और सीमांकन से जुड़े अनेक विवादों का समाधान संभव हो सकेगा।
अधिकारियों का बयान
रामनगर के उपजिलाधिकारी गोपाल सिंह चौहान ने बताया कि भरतपुरी, पंपापुरी और कौशल्यापुरी क्षेत्र में भूमि गणना की माँग लंबे समय से की जा रही थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये क्षेत्र नॉन-जेडी भूमि की श्रेणी में आते हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की जमीन शामिल है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भूमि गणना की प्रक्रिया शुरू की गई थी, किंतु वर्ष 1948 के बाद के कुछ पुराने सर्वे रिकॉर्ड और तकनीकी चुनौतियों के कारण कार्य में कठिनाइयाँ आ रही थीं।
चौहान ने आगे बताया कि मामले को जिलाधिकारी के माध्यम से राजस्व परिषद के समक्ष रखा गया, जिसके बाद सर्वे ऑफ इंडिया को सर्वेक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब विशेषज्ञ टीम क्षेत्र में पहुँचकर विस्तृत सर्वेक्षण कर रही है।
आम जनता पर असर
यह सर्वेक्षण ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड के पहाड़ी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भूमि विवाद एक पुरानी और जटिल समस्या बने हुए हैं। ड्रोन और डीजीपीएस आधारित तकनीक से तैयार डेटा न केवल राजस्व रिकॉर्ड को अद्यतन करेगा, बल्कि भूमि स्वामित्व प्रमाण-पत्र हासिल करने की प्रक्रिया को भी सरल बना सकता है। स्थानीय लोगों की नज़र अब सर्वेक्षण की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी है।
आगे की राह
विशेषज्ञ टीम द्वारा एकत्र आँकड़ों के आधार पर अंतिम सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे राजस्व परिषद उत्तराखंड को सौंपा जाएगा। रिपोर्ट के आधार पर भूमि संबंधी मामलों में राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। यह पहल उत्तराखंड में डिजिटल भूमि प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।