6 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

नीति आयोग रिपोर्ट: 1 लाख स्कूल बंद, 40% ड्रॉपआउट दर — शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र को घेरा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
नीति आयोग रिपोर्ट: 1 लाख स्कूल बंद, 40% ड्रॉपआउट दर — शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र को घेरा

सारांश

नीति आयोग की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि भारत में 1 लाख स्कूल बंद हो चुके हैं और 40% छात्र कक्षा 12 से पहले पढ़ाई छोड़ देते हैं। पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के बीच शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' संपादकीय में केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय की निष्क्रियता पर तीखे सवाल उठाए हैं।

मुख्य बातें

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में लगभग 1,00,000 स्कूल बंद हो चुके हैं, जिनमें पिछले 8-9 वर्षों में 92,000 स्कूल शामिल हैं।
कक्षा 12 से पहले स्कूल छोड़ने की दर 40 प्रतिशत — प्राथमिक नामांकन 90.9% से घटकर उच्च माध्यमिक स्तर पर 58.4% रह जाता है।
1,00,000 से अधिक प्राथमिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे; 7,993 स्कूलों में स्टाफ है लेकिन एक भी छात्र नामांकित नहीं।
शिवसेना (यूबीटी) ने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में केंद्र की BJP सरकार और शिक्षा मंत्रालय पर निष्क्रियता का आरोप लगाया।
उच्च माध्यमिक शिक्षा की लागत प्राथमिक शिक्षा से 3 से 5 गुना अधिक होने को ड्रॉपआउट का प्रमुख कारण बताया गया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 6 अगस्त को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए नीति आयोग की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियाँ सामने आई हैं। यह आलोचना ऐसे समय में आई है जब देशभर में युवा पेपर लीक और परीक्षा भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं।

मुखपत्र 'सामना' में तीखा संपादकीय

पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि जेनरेशन-Z के युवा जब व्यवस्थागत विफलताओं, शोधपत्र लीक और बेरोज़गारी के खिलाफ सड़कों पर हैं, तब सरकार के अपने थिंक टैंक ने ही शिक्षा क्षेत्र की संरचनात्मक कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है। संपादकीय के अनुसार, "शोधपत्र लीक घोटाले ने केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार को पहले ही शर्मिंदा किया था, और अब नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकार को अपना चेहरा छुपाने पर मजबूर कर दिया है।"

नीति आयोग रिपोर्ट के चौंकाने वाले आँकड़े

रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में लगभग 1,00,000 स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। पिछले आठ से नौ वर्षों में लगभग 92,000 स्कूल बंद हुए हैं। हालाँकि आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि कम नामांकन के कारण स्कूलों का विलय किया गया, लेकिन बढ़ती जनसंख्या के बावजूद स्कूलों की कुल संख्या में भारी कमी दर्ज की गई है।

कक्षा 12 से पहले ही स्कूल छोड़ने की दर 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। अर्थात प्राथमिक स्कूल में दाखिला लेने वाले प्रत्येक 10 में से लगभग 4 छात्र उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। 14.71 लाख स्कूलों में नामांकित 24.69 करोड़ छात्रों में प्राथमिक स्तर पर नामांकन 90.9 प्रतिशत है, जो उच्च माध्यमिक स्तर (कक्षा 12) तक घटकर 58.4 प्रतिशत रह जाता है।

एकल-शिक्षक स्कूल और शून्य-नामांकन की विडंबना

रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 1,00,000 से अधिक प्राथमिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जो कक्षा 1 से 4 तक के सभी विषय अकेले पढ़ाता है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली स्थिति यह है कि 7,993 स्कूलों में सक्रिय स्टाफ होने के बावजूद एक भी छात्र नामांकित नहीं है।

ड्रॉपआउट की जड़ में गरीबी और बढ़ता खर्च

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने गरीबी और शिक्षा की बढ़ती लागत को उच्च ड्रॉपआउट दर का मूल कारण बताया। पार्टी के अनुसार उच्च माध्यमिक शिक्षा की लागत प्राथमिक शिक्षा से तीन से पाँच गुना अधिक है। ट्यूशन फीस, परीक्षा शुल्क और यातायात खर्च के बोझ तले दबे परिवार बच्चों को समय से पहले स्कूल से निकालने पर विवश हो रहे हैं, जबकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की निष्क्रियता पर सवाल उठाए गए हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम पर सवाल

मौजूदा नीतिगत सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए शिवसेना (यूबीटी) ने पूछा, "अगर इस देश के छात्रों का भविष्य ही ऐसा है तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम किस काम का — क्या इसे आग में फेंक देना चाहिए?" गौरतलब है कि जंतर-मंतर पर हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने वैश्विक शैक्षिक नेतृत्व के सरकारी दावों को गंभीर रूप से कमज़ोर किया है। आगे यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इन आँकड़ों के मद्देनज़र शिक्षा नीति में कोई ठोस सुधार करती है या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन अब जब सरकार का अपना थिंक टैंक इन्हें प्रमाणित कर रहा है, तो नीतिगत जवाबदेही से बचना कठिन हो जाता है। 40% ड्रॉपआउट दर और 1 लाख बंद स्कूल — यह केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम की व्यावहारिक विफलता का प्रमाण हैं। शिवसेना (यूबीटी) की आलोचना राजनीतिक रूप से प्रेरित भले हो, लेकिन जो प्रश्न उठाए गए हैं — विशेषकर सत्यापन-योग्य सुधार तंत्र की अनुपस्थिति पर — वे किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए अनदेखा करना मुश्किल होना चाहिए।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नीति आयोग की शिक्षा रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ है?
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 1,00,000 स्कूल बंद हो चुके हैं और कक्षा 12 से पहले स्कूल छोड़ने की दर 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। इसके अलावा 1,00,000 से अधिक प्राथमिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र सरकार की आलोचना क्यों की?
शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पेपर लीक घोटाले और बढ़ती बेरोज़गारी के बीच सरकार के थिंक टैंक ने ही शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ उजागर कर दी हैं। पार्टी ने शिक्षा मंत्रालय की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए।
भारत में स्कूल ड्रॉपआउट दर इतनी अधिक क्यों है?
शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार उच्च माध्यमिक शिक्षा की लागत प्राथमिक शिक्षा से तीन से पाँच गुना अधिक है। ट्यूशन फीस, परीक्षा शुल्क और यातायात खर्च के कारण गरीब परिवार बच्चों को समय से पहले स्कूल से निकालने पर विवश हो जाते हैं।
7,993 स्कूलों में छात्र नामांकित न होने का क्या मतलब है?
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 7,993 स्कूलों में सक्रिय स्टाफ तैनात है, लेकिन वर्तमान में एक भी छात्र नामांकित नहीं है। यह संसाधनों के अकुशल आवंटन और नामांकन प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम पर शिवसेना (यूबीटी) का क्या कहना है?
पार्टी ने सवाल उठाया कि जब देश के छात्रों का भविष्य इतना अनिश्चित है, तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम किस काम का। पार्टी ने इस अधिनियम के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर संदेह जताया है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 सप्ताह पहले
  2. 1 सप्ताह पहले
  3. 1 सप्ताह पहले
  4. 2 सप्ताह पहले
  5. 2 सप्ताह पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 2 महीने पहले
  8. 2 महीने पहले