नीति आयोग रिपोर्ट: 1 लाख स्कूल बंद, 40% ड्रॉपआउट दर — शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 6 अगस्त को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए नीति आयोग की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियाँ सामने आई हैं। यह आलोचना ऐसे समय में आई है जब देशभर में युवा पेपर लीक और परीक्षा भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं।
मुखपत्र 'सामना' में तीखा संपादकीय
पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि जेनरेशन-Z के युवा जब व्यवस्थागत विफलताओं, शोधपत्र लीक और बेरोज़गारी के खिलाफ सड़कों पर हैं, तब सरकार के अपने थिंक टैंक ने ही शिक्षा क्षेत्र की संरचनात्मक कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है। संपादकीय के अनुसार, "शोधपत्र लीक घोटाले ने केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार को पहले ही शर्मिंदा किया था, और अब नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकार को अपना चेहरा छुपाने पर मजबूर कर दिया है।"
नीति आयोग रिपोर्ट के चौंकाने वाले आँकड़े
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में लगभग 1,00,000 स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। पिछले आठ से नौ वर्षों में लगभग 92,000 स्कूल बंद हुए हैं। हालाँकि आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि कम नामांकन के कारण स्कूलों का विलय किया गया, लेकिन बढ़ती जनसंख्या के बावजूद स्कूलों की कुल संख्या में भारी कमी दर्ज की गई है।
कक्षा 12 से पहले ही स्कूल छोड़ने की दर 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। अर्थात प्राथमिक स्कूल में दाखिला लेने वाले प्रत्येक 10 में से लगभग 4 छात्र उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। 14.71 लाख स्कूलों में नामांकित 24.69 करोड़ छात्रों में प्राथमिक स्तर पर नामांकन 90.9 प्रतिशत है, जो उच्च माध्यमिक स्तर (कक्षा 12) तक घटकर 58.4 प्रतिशत रह जाता है।
एकल-शिक्षक स्कूल और शून्य-नामांकन की विडंबना
रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 1,00,000 से अधिक प्राथमिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जो कक्षा 1 से 4 तक के सभी विषय अकेले पढ़ाता है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली स्थिति यह है कि 7,993 स्कूलों में सक्रिय स्टाफ होने के बावजूद एक भी छात्र नामांकित नहीं है।
ड्रॉपआउट की जड़ में गरीबी और बढ़ता खर्च
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने गरीबी और शिक्षा की बढ़ती लागत को उच्च ड्रॉपआउट दर का मूल कारण बताया। पार्टी के अनुसार उच्च माध्यमिक शिक्षा की लागत प्राथमिक शिक्षा से तीन से पाँच गुना अधिक है। ट्यूशन फीस, परीक्षा शुल्क और यातायात खर्च के बोझ तले दबे परिवार बच्चों को समय से पहले स्कूल से निकालने पर विवश हो रहे हैं, जबकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की निष्क्रियता पर सवाल उठाए गए हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम पर सवाल
मौजूदा नीतिगत सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए शिवसेना (यूबीटी) ने पूछा, "अगर इस देश के छात्रों का भविष्य ही ऐसा है तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम किस काम का — क्या इसे आग में फेंक देना चाहिए?" गौरतलब है कि जंतर-मंतर पर हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने वैश्विक शैक्षिक नेतृत्व के सरकारी दावों को गंभीर रूप से कमज़ोर किया है। आगे यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इन आँकड़ों के मद्देनज़र शिक्षा नीति में कोई ठोस सुधार करती है या नहीं।