नीट-यूजी पेपर लीक: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान दें इस्तीफा, 22 लाख छात्र प्रभावित — अरविंद सावंत
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने नीट-यूजी पेपर लीक और सीबीएसई मूल्यांकन विवाद को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए माँग की है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें। उनके अनुसार, इस गड़बड़ी के कारण करीब 22 लाख छात्रों का भविष्य दाँव पर लग गया है, जो किसी भी सभ्य लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है। मुंबई से बोलते हुए सावंत ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के करियर के साथ खिलवाड़ सरकार की घोर विफलता है।
मुख्य आरोप और माँगें
सांसद सावंत ने कहा कि जब इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की परीक्षा और करियर दाँव पर हो, तो सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि परीक्षा प्रणाली में लगातार गड़बड़ियाँ सामने आ रही हैं, फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। उनके अनुसार, यह स्थिति छात्रों और उनके परिवारों के लिए भारी मानसिक और आर्थिक परेशानी का कारण बन रही है।
सावंत ने सवाल उठाया कि आखिर देश में कौन सी परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित हो रही है। उन्होंने कहा कि बार-बार पेपर लीक और अनियमितताओं की खबरें आना पूरे शिक्षा तंत्र की बड़ी विफलता को उजागर करता है और केवल जाँच के नाम पर समय निकालना पर्याप्त नहीं है।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने भी इस मामले पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले नीट परीक्षा में पेपर लीक के आरोप सामने आए और अब सीबीएसई परीक्षा को लेकर भी इसी तरह के सवाल उठ रहे हैं। अनवर के अनुसार, एक के बाद एक परीक्षाओं में अनियमितता की बात सामने आना पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने माँग की कि सरकार को जवाबदेही दिखानी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों को अपने पद से हटकर जाँच में सहयोग करना चाहिए। अनवर ने यह भी कहा कि शिक्षा मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) में जिम्मेदारी स्वीकार करने की परंपरा नहीं रही है।
आम छात्रों पर असर
विपक्षी नेताओं के अनुसार, 22 लाख से अधिक नीट-यूजी परीक्षार्थी सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। परीक्षा परिणामों की विश्वसनीयता पर उठे सवालों ने मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया को अनिश्चितता में डाल दिया है। छात्र संगठनों का कहना है कि महीनों की मेहनत के बाद भी निष्पक्ष मूल्यांकन की गारंटी न मिलना मानसिक रूप से विध्वंसकारी है।
क्या होगा आगे
विपक्ष संसद में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में है। आलोचकों का कहना है कि जब तक शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय नहीं होती और परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार नहीं होते, तब तक छात्रों का भरोसा बहाल करना मुश्किल होगा। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में है।