पद्म श्री डॉ. एचवी हांडे: '76 साल की प्रैक्टिस, अंतिम सांस तक सेवा जारी रहेगी'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एचवी हांडे को चिकित्सा क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए पद्म श्री से अलंकृत किया। 25 मई 2026 को यह सम्मान ग्रहण करने के बाद डॉ. हांडे ने कहा कि पद्म समिति ने उनके काम को जो मान्यता दी है, उससे उन्हें गहरी संतुष्टि मिली है और काम करने का उनका जज्बा अंतिम सांस तक कायम रहेगा।
डॉ. हांडे का परिचय और पृष्ठभूमि
डॉ. एचवी हांडे का पूरा नाम हांडे वेंकट रमना है। उनकी मूल भाषा कन्नड़ है, किंतु उन्होंने अपनी अधिकांश शिक्षा आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में पूरी की, क्योंकि उनके पिता सरकारी चिकित्सक थे। उन्होंने तमिल भाषा में विशेष दक्षता अर्जित की और शास्त्रीय तमिल महाकाव्य 'कंबरामादम' का अंग्रेजी गद्य में अनुवाद किया — जो उनकी भाषाई और सांस्कृतिक गहराई को दर्शाता है।
76 वर्षों की अखंड चिकित्सा सेवा
डॉ. हांडे ने 1950 में अपना चिकित्सा अभ्यास आरंभ किया था — अर्थात् अब तक 76 वर्षों की निरंतर प्रैक्टिस। उन्होंने बताया कि उन्हें नहीं लगता कि 1950 में प्रैक्टिस शुरू करने वाला कोई अन्य चिकित्सक आज भी जीवित हो और नियमित रूप से मरीजों को देख रहा हो। इस दीर्घ यात्रा में वे छह बार विधानसभा और तीन बार विधान परिषद के सदस्य चुने गए, तथा दो बार स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहे।
आज भी वे अपने परिवार के अस्पताल में प्रतिदिन तीन घंटे बैठकर मरीजों की जाँच करते हैं। जो भी मरीज फीस देने में असमर्थ होता है, उसका इलाज वे निःशुल्क करते हैं — यह परंपरा दशकों से अनवरत चली आ रही है। उनके पुत्र उसी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य मंत्री के रूप में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ
दिवंगत मुख्यमंत्री एमजीआर के मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए डॉ. हांडे ने तमिलनाडु की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को आमूलचूल बदल दिया। जब उन्होंने पदभार संभाला, तब राज्य में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 110 थी। साढ़े छह साल के अपने कार्यकाल में उन्होंने इसे घटाकर प्रति हजार 30 पर ला दिया — एक उल्लेखनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि।
उस दौर में कुष्ठ रोग का व्यापक प्रकोप था और कुष्ठ आश्रम रोगियों से भरे हुए थे। डॉ. हांडे ने छात्रों को साथ लेकर, व्यापक जाँच अभियान और ठोस उपायों के माध्यम से इस समस्या से निपटा। उनके पद छोड़ते-छोड़ते कुष्ठ आश्रम पूरी तरह रिक्त हो चुके थे।
अस्पतालों के निरीक्षण के लिए उन्होंने एक विशेष 'मास्टर प्लान' तैयार किया और प्रत्येक जिले के आईएएस अधिकारियों (कलेक्टर्स) को इसमें सक्रिय रूप से जोड़ा। तीन वर्षों के भीतर तमिलनाडु की चिकित्सा व्यवस्था के सभी प्रमुख पैमाने देश में शीर्ष श्रेणी में पहुँच गए।
राष्ट्रीय पुरस्कार और मान्यता
इन उपलब्धियों के लिए तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बने पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें ₹5 करोड़ का पुरस्कार प्रदान किया। 1985 में उन्हें चिकित्सा जगत के प्रतिष्ठित डॉ. बीसी रॉय पुरस्कार से भी नवाजा गया। अब पद्म श्री के साथ उनकी सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च नागरिक मान्यता मिली है।
बिहार के कलाकार बिश्वा बंधु को मरणोपरांत सम्मान
इसी समारोह में बिहार के कला क्षेत्र से बिश्वा बंधु को मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी इंदु देवी ने पुरस्कार ग्रहण करते हुए कहा कि सरकार ने उनके योगदान को पहचाना, जिस पर पूरे परिवार को गर्व है। उन्होंने बताया कि परिवार भावुक था और आँखें खुशी के आँसुओं से भर आईं।
पद्म श्री सम्मान भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है, जो विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। डॉ. हांडे जैसे चिकित्सकों की यात्रा यह रेखांकित करती है कि सेवा-भाव और संस्थागत सुधार साथ-साथ चल सकते हैं।