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पद्म श्री से सम्मानित संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य बोले — यह पुरस्कार माता-पिता को समर्पित

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पद्म श्री से सम्मानित संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य बोले — यह पुरस्कार माता-पिता को समर्पित

सारांश

संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य का पद्म श्री सम्मान सिर्फ एक पुरस्कार नहीं — यह उस विरासत की स्वीकृति है जो पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी के जाने के बाद उनके कंधों पर आ गई है। उनकी अपील — कि संगीत बच्चों के लिए 'पॉजिटिव ड्रग' है — शास्त्रीय परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की सबसे ज़रूरी पुकार है।

मुख्य बातें

पंडित तरुण भट्टाचार्य को हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित किया गया; उन्होंने यह उपलब्धि अपने दिवंगत माता-पिता को समर्पित की।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया और पद्म पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया को 'बेहद सोच-समझकर' बताया।
पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी के निधन के बाद वे संतूर के सबसे वरिष्ठ सक्रिय कलाकारों में से एक हैं।
उन्होंने मात्र 4 वर्ष की आयु में अपने पिता से संतूर सीखना शुरू किया था।
कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम में ढाई हजार दर्शकों द्वारा स्टैंडिंग ओवेशन उनके यादगार अनुभवों में से एक है।
उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों को संगीत सिखाएँ — इसे उन्होंने 'पॉजिटिव ड्रग' की संज्ञा दी।

संतूर वादन के शीर्षस्थ कलाकार पंडित तरुण भट्टाचार्य को हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित किया गया, और इस अवसर पर उन्होंने इस प्रतिष्ठित सम्मान को अपने जीवन का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण क्षण बताया। कोलकाता से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि वे अपने दिवंगत माता-पिता को समर्पित करते हैं, जिन्होंने उनकी संगीत-यात्रा की नींव रखी। उन्होंने यह भी अपील की कि बच्चों को संगीत अवश्य सिखाया जाए, क्योंकि यह जीवन में सकारात्मकता का अटूट स्रोत है।

पुरस्कार पर पंडितजी की प्रतिक्रिया

पंडित तरुण भट्टाचार्य ने कहा, 'पद्म श्री पुरस्कार एक बहुत ही प्रतिष्ठित सम्मान है और इसे पाने वाला हर व्यक्ति कृतज्ञ महसूस करता है। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करता हूँ। मुझे बहुत खुशी है कि मुझे इस पुरस्कार के लिए चुना गया।' उन्होंने भावुक होते हुए जोड़ा कि आज उन्हें इस बात का दुख है कि उनके माता-पिता अब जीवित नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'मेरी शिक्षा की शुरुआत मेरे पिता से हुई थी। अगर आज वे जीवित होते, तो उन्हें बहुत खुशी होती। मैं यह उपलब्धि उन्हें समर्पित करता हूँ।'

संतूर क्षेत्र में वरिष्ठता और चयन की प्रक्रिया

पंडित भट्टाचार्य ने पद्म पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया पर भी विचार साझा किए। उनके अनुसार, 'चयन बहुत ही समझदारी से किया जाता है। कुछ चयन ऐसे भी होते हैं जहाँ लोगों को कभी कोई पुरस्कार या पहचान नहीं मिलती, भले ही उन्होंने समाज के लिए बहुत योगदान दिया हो।' उन्होंने स्पष्ट किया कि संतूर के क्षेत्र में अब वरिष्ठ कलाकारों की संख्या बहुत कम रह गई है, क्योंकि पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी का निधन हो चुका है। उन्होंने कहा, 'इस कारण इस क्षेत्र में मैं वरिष्ठ स्तर के कलाकारों में से एक था, और इसी कारण मेरा चयन हुआ।'

कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम का यादगार किस्सा

पंडित भट्टाचार्य ने कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम का एक भावुक संस्मरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उस दौरे में उनके साथ पद्म भूषण और ग्रैमी पुरस्कार विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट तथा पंडित दया शंकर भी थे। गुरु पंडित रविशंकर के निर्देश पर दो घंटे की प्रस्तुति दो भागों में बाँटकर दी गई। प्रस्तुति के बाद लगभग ढाई हजार दर्शकों ने खड़े होकर सराहना की। उन्होंने बताया, 'हमें पहले लगा था कि लोग घर जाने के लिए खड़े हो रहे हैं, लेकिन आयोजकों ने बताया कि यह स्टैंडिंग ओवेशन था।' यह किस्सा भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।

संगीत की शिक्षा और बचपन की शुरुआत

पंडित भट्टाचार्य ने बताया कि उन्होंने मात्र चार वर्ष की आयु में अपने पिता से संतूर सीखना शुरू किया था। उन्होंने एक रोचक प्रसंग साझा किया — बचपन में वे बार-बार पिता से पूछते थे कि पढ़ाई कितने साल तक चलेगी, और पिता का जवाब था, 'सीखते रहो, सीखते-सीखते ही जान जाओगे।' यह उत्तर आज भी उनके जीवन का मार्गदर्शक सूत्र है।

बच्चों के लिए संगीत की अपील

पंडित भट्टाचार्य ने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को संगीत सिखाएँ, चाहे बच्चा सीखना न भी चाहे। उन्होंने कहा, 'संगीत एक पॉजिटिव ड्रग जैसा है। अगर आप इसका लगातार अभ्यास करते रहते हैं, तो कुछ सालों बाद इसकी एक अच्छी लत लग जाती है और कोई भी नकारात्मकता आप पर असर नहीं डाल पाती।' उन्होंने बताया कि उनके कई छात्र स्कूल से सीधे आकर संतूर के साथ बैठ जाते हैं। उन्होंने यह भी सुझाया कि जो बच्चे सीखना नहीं चाहते, वे कम से कम यूट्यूब पर शास्त्रीय संगीत सुनें — नियमित श्रवण से भी संगीत के प्रति स्वाभाविक प्रेम जागृत होता है। यह संदेश ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब डिजिटल मनोरंजन के बीच शास्त्रीय कलाओं को नई पीढ़ी से जोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और संतूर की विरासत को थामने वाले हाथ गिने-चुने हैं। यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि एक लुप्त होती परंपरा को राष्ट्रीय स्वीकृति है। उनकी यह अपील कि बच्चों को संगीत सिखाना 'नकारात्मकता की काट' है, डिजिटल युग में शास्त्रीय कला-शिक्षा की नीतिगत उपेक्षा पर भी एक अप्रत्यक्ष टिप्पणी है। सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में संगीत-शिक्षा को वह स्थान मिल पाएगा जिसकी वकालत वे कर रहे हैं।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित तरुण भट्टाचार्य को पद्म श्री क्यों दिया गया?
पंडित तरुण भट्टाचार्य को संतूर वादन में उनके दशकों के उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया। पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी के निधन के बाद वे इस वाद्य के सबसे वरिष्ठ सक्रिय कलाकारों में से एक हैं।
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने संतूर सीखना कब और कैसे शुरू किया?
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने मात्र 4 वर्ष की आयु में अपने पिता से संतूर की शिक्षा लेनी शुरू की थी। उन्होंने बताया कि बचपन में वे पिता से पूछते थे कि पढ़ाई कितने साल चलेगी, और पिता का जवाब था — 'सीखते रहो, खुद जान जाओगे।'
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने बच्चों और संगीत के बारे में क्या कहा?
उन्होंने संगीत को 'पॉजिटिव ड्रग' बताया और कहा कि नियमित अभ्यास से कुछ वर्षों में इसकी 'अच्छी लत' लग जाती है, जो किसी भी नकारात्मकता को दूर रखती है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों को संगीत सिखाएँ, और जो नहीं सीखना चाहते वे कम से कम यूट्यूब पर सुनें।
कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम वाला किस्सा क्या है?
पंडित भट्टाचार्य ने बताया कि कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम में पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित दया शंकर के साथ प्रस्तुति के बाद लगभग ढाई हजार दर्शकों ने खड़े होकर सराहना की। शुरू में कलाकारों को लगा कि दर्शक जाने के लिए उठ रहे हैं, लेकिन आयोजकों ने बताया कि यह स्टैंडिंग ओवेशन था।
पद्म पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया के बारे में पंडित भट्टाचार्य ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि पद्म पुरस्कारों का चयन बेहद सोच-समझकर किया जाता है और कई बार उन लोगों को भी सम्मानित किया जाता है जिन्हें पहले कोई पहचान नहीं मिली, भले ही उन्होंने समाज के लिए बड़ा योगदान दिया हो। उन्होंने माना कि उनका चयन संतूर वादन में वरिष्ठता के कारण हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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