पद्म श्री से सम्मानित संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य बोले — यह पुरस्कार माता-पिता को समर्पित
सारांश
मुख्य बातें
संतूर वादन के शीर्षस्थ कलाकार पंडित तरुण भट्टाचार्य को हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित किया गया, और इस अवसर पर उन्होंने इस प्रतिष्ठित सम्मान को अपने जीवन का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण क्षण बताया। कोलकाता से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि वे अपने दिवंगत माता-पिता को समर्पित करते हैं, जिन्होंने उनकी संगीत-यात्रा की नींव रखी। उन्होंने यह भी अपील की कि बच्चों को संगीत अवश्य सिखाया जाए, क्योंकि यह जीवन में सकारात्मकता का अटूट स्रोत है।
पुरस्कार पर पंडितजी की प्रतिक्रिया
पंडित तरुण भट्टाचार्य ने कहा, 'पद्म श्री पुरस्कार एक बहुत ही प्रतिष्ठित सम्मान है और इसे पाने वाला हर व्यक्ति कृतज्ञ महसूस करता है। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करता हूँ। मुझे बहुत खुशी है कि मुझे इस पुरस्कार के लिए चुना गया।' उन्होंने भावुक होते हुए जोड़ा कि आज उन्हें इस बात का दुख है कि उनके माता-पिता अब जीवित नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'मेरी शिक्षा की शुरुआत मेरे पिता से हुई थी। अगर आज वे जीवित होते, तो उन्हें बहुत खुशी होती। मैं यह उपलब्धि उन्हें समर्पित करता हूँ।'
संतूर क्षेत्र में वरिष्ठता और चयन की प्रक्रिया
पंडित भट्टाचार्य ने पद्म पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया पर भी विचार साझा किए। उनके अनुसार, 'चयन बहुत ही समझदारी से किया जाता है। कुछ चयन ऐसे भी होते हैं जहाँ लोगों को कभी कोई पुरस्कार या पहचान नहीं मिलती, भले ही उन्होंने समाज के लिए बहुत योगदान दिया हो।' उन्होंने स्पष्ट किया कि संतूर के क्षेत्र में अब वरिष्ठ कलाकारों की संख्या बहुत कम रह गई है, क्योंकि पंडित शिवकुमार शर्मा और भजन सोपोरी का निधन हो चुका है। उन्होंने कहा, 'इस कारण इस क्षेत्र में मैं वरिष्ठ स्तर के कलाकारों में से एक था, और इसी कारण मेरा चयन हुआ।'
कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम का यादगार किस्सा
पंडित भट्टाचार्य ने कनाडा के जुबली ऑडिटोरियम का एक भावुक संस्मरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उस दौरे में उनके साथ पद्म भूषण और ग्रैमी पुरस्कार विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट तथा पंडित दया शंकर भी थे। गुरु पंडित रविशंकर के निर्देश पर दो घंटे की प्रस्तुति दो भागों में बाँटकर दी गई। प्रस्तुति के बाद लगभग ढाई हजार दर्शकों ने खड़े होकर सराहना की। उन्होंने बताया, 'हमें पहले लगा था कि लोग घर जाने के लिए खड़े हो रहे हैं, लेकिन आयोजकों ने बताया कि यह स्टैंडिंग ओवेशन था।' यह किस्सा भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
संगीत की शिक्षा और बचपन की शुरुआत
पंडित भट्टाचार्य ने बताया कि उन्होंने मात्र चार वर्ष की आयु में अपने पिता से संतूर सीखना शुरू किया था। उन्होंने एक रोचक प्रसंग साझा किया — बचपन में वे बार-बार पिता से पूछते थे कि पढ़ाई कितने साल तक चलेगी, और पिता का जवाब था, 'सीखते रहो, सीखते-सीखते ही जान जाओगे।' यह उत्तर आज भी उनके जीवन का मार्गदर्शक सूत्र है।
बच्चों के लिए संगीत की अपील
पंडित भट्टाचार्य ने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को संगीत सिखाएँ, चाहे बच्चा सीखना न भी चाहे। उन्होंने कहा, 'संगीत एक पॉजिटिव ड्रग जैसा है। अगर आप इसका लगातार अभ्यास करते रहते हैं, तो कुछ सालों बाद इसकी एक अच्छी लत लग जाती है और कोई भी नकारात्मकता आप पर असर नहीं डाल पाती।' उन्होंने बताया कि उनके कई छात्र स्कूल से सीधे आकर संतूर के साथ बैठ जाते हैं। उन्होंने यह भी सुझाया कि जो बच्चे सीखना नहीं चाहते, वे कम से कम यूट्यूब पर शास्त्रीय संगीत सुनें — नियमित श्रवण से भी संगीत के प्रति स्वाभाविक प्रेम जागृत होता है। यह संदेश ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब डिजिटल मनोरंजन के बीच शास्त्रीय कलाओं को नई पीढ़ी से जोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गई है।