पराली जलाने की घटनाएँ 80,000 से घटकर 5,100 पर आईं: ICAR-ATARI निदेशक डॉ. श्योराण
सारांश
मुख्य बातें
ICAR-ATARI के निदेशक डॉ. परविंदर श्योराण ने 16 अक्टूबर 2026 को अबोहर में आयोजित एक कृषि मेले में कहा कि पराली किसानों के लिए कचरा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान खजाना है, जिसे खेत में ही संरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि किसानों के बदलते व्यवहार और प्रशासन तथा कृषि विभाग के साझा प्रयासों की बदौलत पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
घटनाओं में ऐतिहासिक गिरावट
डॉ. श्योराण ने आँकड़े साझा करते हुए बताया कि 2018 में जब यह अभियान शुरू हुआ था, तब देशभर में पराली जलाने की एक लाख से अधिक घटनाएँ होती थीं। इनमें अकेले पंजाब की हिस्सेदारी 70–80 फीसदी थी और राज्य में 80,000 से अधिक स्थानों पर खेतों में आग लगाई जाती थी। पिछले साल यह संख्या घटकर राष्ट्रीय स्तर पर 36,000 और पंजाब में मात्र 5,100 रह गई — यानी पंजाब का कुल हिस्सा अब केवल 15 फीसदी बचा है।
मेले में किसानों से सीधा संवाद
डॉ. श्योराण ने मेले के मंच से कहा, 'इस मेले में बड़ी संख्या में किसान भाई-बहन आए थे। हमने मंच के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की है कि अभी धान की कटाई का सीजन चल रहा है और आगे गेहूँ की बुवाई होगी, तो ऐसे में हम पराली का प्रबंधन किस तरह कर सकते हैं और आग लगाने की घटनाओं को रोककर जीरो बर्निंग के लक्ष्य को कैसे हासिल कर सकते हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि मंच पर वैज्ञानिकों और किसानों ने मिलकर राय साझा की।
सैटेलाइट डेटा और सटीकता की चुनौती
डॉ. श्योराण ने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि कई बार सैटेलाइट किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी पराली जलाने की घटना के रूप में दर्ज कर लेता है। उन्होंने कहा, 'सैटेलाइट से पिछले रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि कई बार किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी सैटेलाइट कैप्चर कर लेता है, जिसे पराली जलाने की घटना में गिना जाता है।' इससे वास्तविक आँकड़े और भी अनुकूल हो सकते हैं।
उपलब्ध तकनीकें और किसानों का बदलता व्यवहार
निदेशक ने जोर देकर कहा कि पराली प्रबंधन के लिए सभी आवश्यक तकनीकें किसानों के पास उपलब्ध हैं। किसान पराली को जमीन के ऊपर मल्चिंग के रूप में रख सकते हैं या उसे मिट्टी में मिलाकर खाद बना सकते हैं — दोनों विकल्प उनकी सुविधा और पसंद पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, 'सबसे महत्वपूर्ण व्यवहार में बदलाव है और काफी हद तक किसानों ने यह बदलाव अपना लिया है।'
आगे की राह: जीरो बर्निंग का सपना
डॉ. श्योराण ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में पंजाब पूर्ण रूप से शून्य पराली दहन का लक्ष्य हासिल कर लेगा। उन्होंने इस सफलता का श्रेय प्रशासन, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्रों और सबसे बढ़कर किसानों को दिया। गौरतलब है कि यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण पर हर साल राष्ट्रीय बहस छिड़ती है और पराली धुआँ उसका प्रमुख कारण माना जाता है।