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पराली जलाने की घटनाएँ 80,000 से घटकर 5,100 पर आईं: ICAR-ATARI निदेशक डॉ. श्योराण

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पराली जलाने की घटनाएँ 80,000 से घटकर 5,100 पर आईं: ICAR-ATARI निदेशक डॉ. श्योराण

सारांश

2018 में 80,000 से अधिक घटनाओं से शुरू हुआ सफर अब 5,100 पर आ गया है — यह बदलाव किसानों के व्यवहार और साझा प्रयासों की असली जीत है। ICAR-ATARI के डॉ. श्योराण का कहना है कि पराली कचरा नहीं, खजाना है और जीरो बर्निंग का सपना अब दूर नहीं।

मुख्य बातें

ICAR-ATARI निदेशक डॉ.
परविंदर श्योराण ने अबोहर में कहा — पराली कचरा नहीं, किसानों का खजाना है।
2018 में पंजाब में पराली जलाने की 80,000 से अधिक घटनाएँ थीं, जो पिछले साल घटकर 5,100 रह गईं।
राष्ट्रीय स्तर पर कुल घटनाएँ एक लाख से अधिक से घटकर 36,000 पर आईं; पंजाब की हिस्सेदारी 70–80% से घटकर 15% हुई।
सैटेलाइट डेटा में अन्य कारणों से लगी आग भी दर्ज होती है, जिससे वास्तविक आँकड़े और बेहतर हो सकते हैं।
पराली को जमीन में मिलाने या मल्चिंग के लिए सभी तकनीकें किसानों के पास उपलब्ध हैं।
श्योराण ने जीरो बर्निंग के लक्ष्य को निकट भविष्य में हासिल करने का विश्वास जताया।

ICAR-ATARI के निदेशक डॉ. परविंदर श्योराण ने 16 अक्टूबर 2026 को अबोहर में आयोजित एक कृषि मेले में कहा कि पराली किसानों के लिए कचरा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान खजाना है, जिसे खेत में ही संरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि किसानों के बदलते व्यवहार और प्रशासन तथा कृषि विभाग के साझा प्रयासों की बदौलत पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

घटनाओं में ऐतिहासिक गिरावट

डॉ. श्योराण ने आँकड़े साझा करते हुए बताया कि 2018 में जब यह अभियान शुरू हुआ था, तब देशभर में पराली जलाने की एक लाख से अधिक घटनाएँ होती थीं। इनमें अकेले पंजाब की हिस्सेदारी 70–80 फीसदी थी और राज्य में 80,000 से अधिक स्थानों पर खेतों में आग लगाई जाती थी। पिछले साल यह संख्या घटकर राष्ट्रीय स्तर पर 36,000 और पंजाब में मात्र 5,100 रह गई — यानी पंजाब का कुल हिस्सा अब केवल 15 फीसदी बचा है।

मेले में किसानों से सीधा संवाद

डॉ. श्योराण ने मेले के मंच से कहा, 'इस मेले में बड़ी संख्या में किसान भाई-बहन आए थे। हमने मंच के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की है कि अभी धान की कटाई का सीजन चल रहा है और आगे गेहूँ की बुवाई होगी, तो ऐसे में हम पराली का प्रबंधन किस तरह कर सकते हैं और आग लगाने की घटनाओं को रोककर जीरो बर्निंग के लक्ष्य को कैसे हासिल कर सकते हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि मंच पर वैज्ञानिकों और किसानों ने मिलकर राय साझा की।

सैटेलाइट डेटा और सटीकता की चुनौती

डॉ. श्योराण ने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि कई बार सैटेलाइट किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी पराली जलाने की घटना के रूप में दर्ज कर लेता है। उन्होंने कहा, 'सैटेलाइट से पिछले रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि कई बार किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी सैटेलाइट कैप्चर कर लेता है, जिसे पराली जलाने की घटना में गिना जाता है।' इससे वास्तविक आँकड़े और भी अनुकूल हो सकते हैं।

उपलब्ध तकनीकें और किसानों का बदलता व्यवहार

निदेशक ने जोर देकर कहा कि पराली प्रबंधन के लिए सभी आवश्यक तकनीकें किसानों के पास उपलब्ध हैं। किसान पराली को जमीन के ऊपर मल्चिंग के रूप में रख सकते हैं या उसे मिट्टी में मिलाकर खाद बना सकते हैं — दोनों विकल्प उनकी सुविधा और पसंद पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, 'सबसे महत्वपूर्ण व्यवहार में बदलाव है और काफी हद तक किसानों ने यह बदलाव अपना लिया है।'

आगे की राह: जीरो बर्निंग का सपना

डॉ. श्योराण ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में पंजाब पूर्ण रूप से शून्य पराली दहन का लक्ष्य हासिल कर लेगा। उन्होंने इस सफलता का श्रेय प्रशासन, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्रों और सबसे बढ़कर किसानों को दिया। गौरतलब है कि यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण पर हर साल राष्ट्रीय बहस छिड़ती है और पराली धुआँ उसका प्रमुख कारण माना जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

100 का आँकड़ा निस्संदेह उत्साहजनक है, लेकिन असली परीक्षा अंतिम खाई पाटने में है — क्योंकि जो किसान अभी भी पराली जलाते हैं, वे प्रायः सबसे छोटी जोत वाले और सबसे कम संसाधन वाले हैं, जिन तक कस्टम हायरिंग केंद्रों और सब्सिडी वाली मशीनरी की पहुँच सीमित है। सैटेलाइट डेटा की सटीकता पर उठाए गए सवाल वाजिब हैं, पर यह तर्क नीतिगत स्व-मूल्यांकन का विकल्प नहीं बन सकता। दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता पर पराली के प्रभाव को लेकर हर साल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, जबकि ज़मीन पर स्थानीय प्रशासन और कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत को कम आँका जाता है। जीरो बर्निंग केवल तकनीक का सवाल नहीं — यह किसानों को पराली से आर्थिक लाभ दिलाने की नीति बनाने का भी सवाल है।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में कितनी कमी आई है?
2018 में पंजाब में पराली जलाने की 80,000 से अधिक घटनाएँ होती थीं, जो पिछले साल घटकर लगभग 5,100 रह गईं। राष्ट्रीय स्तर पर कुल घटनाएँ एक लाख से अधिक से घटकर 36,000 पर आई हैं और पंजाब की हिस्सेदारी अब केवल 15 फीसदी है।
ICAR-ATARI के डॉ. श्योराण के अनुसार पराली को खजाना क्यों कहा जाता है?
डॉ. परविंदर श्योराण के अनुसार पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और किसानों को रासायनिक खाद पर खर्च कम करना पड़ता है। पराली को मल्चिंग या मिट्टी में मिलाकर इसे कार्बनिक संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
जीरो बर्निंग का लक्ष्य क्या है और इसे कैसे हासिल किया जाएगा?
जीरो बर्निंग का अर्थ है पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को पूरी तरह शून्य पर लाना। इसके लिए किसानों को पराली प्रबंधन की तकनीकें उपलब्ध कराई जा रही हैं और प्रशासन, कृषि विभाग तथा कृषि विज्ञान केंद्र मिलकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
पराली प्रबंधन के लिए किसानों के पास कौन-सी तकनीकें उपलब्ध हैं?
डॉ. श्योराण के अनुसार किसान पराली को जमीन के ऊपर मल्चिंग के रूप में रख सकते हैं या इन-सीटू विधि से मिट्टी में मिला सकते हैं। हैप्पी सीडर, सुपर SMS और रिवर्सिबल एम.बी. प्लाऊ जैसी मशीनरी किसानों की मदद के लिए उपलब्ध हैं।
सैटेलाइट डेटा में पराली जलाने के आँकड़े हमेशा सटीक क्यों नहीं होते?
डॉ. श्योराण ने बताया कि सैटेलाइट कई बार खेतों में किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी पराली जलाने की घटना के रूप में दर्ज कर लेता है। इस तकनीकी सीमा के कारण वास्तविक पराली दहन की संख्या सैटेलाइट आँकड़ों से कम हो सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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