7 नवंबर 2026
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पराली जलाना वाहनों-पटाखों से 100 गुना अधिक प्रदूषक: पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह

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पराली जलाना वाहनों-पटाखों से 100 गुना अधिक प्रदूषक: पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह

सारांश

पूर्व BJP सांसद बृजभूषण शरण सिंह का दावा है कि पराली जलाना वाहनों और पटाखों से 100 गुना अधिक प्रदूषण फैलाता है, फिर भी प्रशासन बेपरवाह है। धान की कटाई में देरी के साथ यह संकट और गहरा सकता है।

मुख्य बातें

पूर्व BJP सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने 7 नवंबर 2026 को गोंडा में कहा कि पराली जलाने का प्रदूषण पटाखों व वाहनों से 100 गुना अधिक है।
उनके अनुसार एक बीघे खेत की पराली का धुआं किसी एक वाहन द्वारा पूरे साल में उत्सर्जित धुएं से अधिक होता है।
पराली जलाने से मिट्टी की उपजाऊ ऊपरी परत नष्ट होती है, जिससे दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।
प्रशासन ड्रोन व उपग्रह तकनीक से पराली जलाने के 15-20 दिन बाद भी खेतों की पहचान कर सकता है, लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही।
धान की कटाई में देरी के चलते आने वाले दिनों में पराली जलाने की घटनाएं और बढ़ने की आशंका।

पूर्व भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने 7 नवंबर 2026 को गोंडा में वायु प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए दावा किया कि पराली जलाने से उत्पन्न प्रदूषण दिवाली के पटाखों, ईंट-भट्ठों और औद्योगिक गतिविधियों के संयुक्त प्रदूषण से 100 गुना अधिक है। उन्होंने प्रशासन और सरकार पर पराली नियंत्रण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में विफलता का आरोप लगाया।

प्रदूषण की गंभीरता और बृजभूषण के दावे

बृजभूषण शरण सिंह के अनुसार, राज्य और देश में प्रदूषण की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। उन्होंने कहा, 'एक बीघे खेत में पराली जलाने से जितना धुआं निकलता है, उतना धुआं एक वाहन पूरे साल में भी नहीं छोड़ता।' यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर भारत में फसल कटाई का मौसम चल रहा है और पराली जलाने की घटनाएं चरम पर हैं।

पूर्व सांसद ने बताया कि शाम के समय ग्रामीण इलाकों से गुजरने पर 'चारों तरफ आग लगी होने' जैसा दृश्य दिखता है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब पराली को उत्तर भारत की वायु गुणवत्ता के लिए प्रमुख खतरा बताया गया है — विशेषज्ञ और पर्यावरण संस्थाएं वर्षों से यह मुद्दा उठाते आए हैं।

प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल

बृजभूषण सिंह ने कहा कि पराली जलाने पर रोक के लिए नियम और कानून तो मौजूद हैं, परंतु उनका प्रभावी पालन नहीं कराया जा रहा। उन्होंने कहा कि प्रशासन चाहे तो पराली जलाने के 15 से 20 दिन बाद भी उपग्रह या ड्रोन तकनीक से किस खेत में पराली जलाई गई, यह पता लगाया जा सकता है। उनके अनुसार, 'छोटे से बड़े स्तर तक के अधिकारियों में इस गंभीर समस्या को लेकर चिंता दिखाई नहीं देती।'

उन्होंने फैक्ट्रियों, वाहनों और ईंट-भट्ठों के विरुद्ध भी कड़े कदम उठाने की माँग की। साथ ही आरोप लगाया कि पुरानी गाड़ियाँ हटाने की नीति से उद्योगपतियों और नई गाड़ियों की बिक्री को लाभ पहुँचाने की आशंका है।

मिट्टी की उर्वरता पर असर और समाधान

पूर्व सांसद ने पराली की आग से भूमि की उपजाऊ ऊपरी परत को होने वाले नुकसान पर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि पराली जलाने से जमीन की उर्वरता क्षतिग्रस्त होती है, जो दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता के लिए घातक है।

इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाने और उन्हें ऐसे कृषि यंत्र उपलब्ध कराने पर जोर दिया जिनसे पराली को खेत में ही मिलाया जा सके — जो पराली को खाद में बदलने का पर्यावरण-हितैषी विकल्प है।

आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ने की आशंका

बृजभूषण सिंह ने चेतावनी दी कि धान की कटाई में देरी के कारण आने वाले दिनों में पराली जलाने की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। जैसे-जैसे फसल कटती जाएगी, किसान बड़े पैमाने पर पराली जलाना शुरू कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन को अभी से प्रभावी कदम उठाने चाहिए ताकि स्थिति और विकराल न हो। विशेषज्ञों का भी मानना है कि देरी से कटाई और सर्दी की शुरुआत का संयोग प्रदूषण संकट को और गहरा कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे अक्सर बिना संदर्भ के दोहराया जाता है — जबकि पराली का योगदान मौसम, हवा की दिशा और क्षेत्र के आधार पर बदलता है। असली सवाल यह नहीं कि पराली 'कितने गुना' बुरी है, बल्कि यह है कि वर्षों की नीतिगत घोषणाओं और कृषि यंत्र सब्सिडी के बावजूद पंजाब-हरियाणा-यूपी में पराली जलाना क्यों नहीं रुका। जब तक किसानों को किफायती और सुलभ विकल्प नहीं मिलते, महज़ कानून और ड्रोन निगरानी से समस्या हल नहीं होगी — यह बात खुद बृजभूषण के बयान में भी झलकती है।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पराली जलाने से वाहनों की तुलना में कितना अधिक प्रदूषण होता है?
पूर्व BJP सांसद बृजभूषण शरण सिंह के अनुसार पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण दिवाली के पटाखों, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों के कुल प्रदूषण से 100 गुना अधिक है। उन्होंने कहा कि एक बीघे खेत की पराली का धुआं किसी एक वाहन के पूरे साल के उत्सर्जन से भी ज्यादा होता है।
पराली जलाने पर रोक के लिए कौन-से कानून हैं और वे क्यों प्रभावी नहीं हो रहे?
भारत में पराली जलाने पर रोक के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई नियम मौजूद हैं, परंतु बृजभूषण सिंह के अनुसार इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा। उनका कहना है कि अधिकारी इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे, जबकि ड्रोन और उपग्रह तकनीक से पराली जलाने के 15-20 दिन बाद भी दोषी खेतों की पहचान संभव है।
पराली जलाने से मिट्टी को क्या नुकसान होता है?
पराली की आग से खेत की उपजाऊ ऊपरी परत नष्ट हो जाती है, जिससे जमीन की उर्वरता घटती है और दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता पर असर पड़ता है। बृजभूषण सिंह ने किसानों को पराली को खेत में ही मिलाने वाले कृषि यंत्र उपलब्ध कराने की माँग की है।
आने वाले दिनों में पराली जलाने की स्थिति क्या होगी?
बृजभूषण सिंह के अनुसार धान की कटाई में देरी के कारण आने वाले दिनों में पराली जलाने की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। उन्होंने प्रशासन से अभी से प्रभावी कदम उठाने की अपील की है ताकि वायु प्रदूषण संकट और गहरा न हो।
पराली समस्या का स्थायी समाधान क्या है?
पूर्व सांसद ने किसानों के बीच जागरूकता अभियान और पराली को खेत में ही मिलाने वाले कृषि यंत्रों की उपलब्धता को स्थायी समाधान बताया है। साथ ही ड्रोन निगरानी और कड़े प्रशासनिक कदमों की माँग भी की है।
राष्ट्र प्रेस
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