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तमिलनाडु: विजय सरकार ने स्टालिन-युग की केंद्र-राज्य समिति भंग की, विधि आयोग को सौंपा काम

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तमिलनाडु: विजय सरकार ने स्टालिन-युग की केंद्र-राज्य समिति भंग की, विधि आयोग को सौंपा काम

सारांश

तमिलनाडु की विजय सरकार ने स्टालिन के कार्यकाल में बनी केंद्र-राज्य संबंध समिति को भंग कर उसका काम विधि आयोग को सौंप दिया। यह फैसला DMK की संघवाद-केंद्रित नीति से अलग दिशा में जाता है और राज्य की राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत देता है।

मुख्य बातें

जोसेफ विजय की सरकार ने 7 नवंबर 2026 को सरकारी आदेश से केंद्र-राज्य संबंध समिति को भंग किया।
समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ कर रहे थे।
समिति ने 16 फरवरी 2026 को पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को अपनी रिपोर्ट का पहला भाग सौंपा था।
सरकार ने तर्क दिया कि 7 अगस्त 2026 को पुनर्गठित तमिलनाडु राज्य विधि आयोग के पास पहले से समान अधिकार हैं।
भंग समिति और विधि आयोग — दोनों गैर-वैधानिक निकाय हैं, जो कार्यकारी आदेश से स्थापित हुए।
यह कदम DMK शासनकाल की संघवाद-समर्थक नीतिगत दिशा से स्पष्ट विचलन माना जा रहा है।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने 7 नवंबर 2026 को एक सरकारी आदेश के ज़रिये पूर्व द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार द्वारा स्थापित केंद्र-राज्य संबंधों पर उच्चस्तरीय समिति को औपचारिक रूप से भंग कर दिया और उसकी समस्त जिम्मेदारियाँ तमिलनाडु राज्य विधि आयोग को सौंप दीं। यह फैसला पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की उस पहल के अंत का प्रतीक है जिसे उन्होंने राज्य के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया था।

समिति का गठन और कार्यकाल

पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अप्रैल 2025 में तमिलनाडु विधानसभा में इस तीन सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केंद्र-राज्य संबंधों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की जाँच करना और संघवाद तथा राज्य स्वायत्तता को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाना था।

समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ कर रहे थे, जबकि पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी के. अशोक वर्धन शेट्टी और राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एम. नागनाथन सदस्य के रूप में शामिल थे। समिति ने केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक मुद्दों की गहन समीक्षा की और 16 फरवरी 2026 को स्टालिन को अपनी रिपोर्ट का पहला भाग सौंपा, जिसमें संघीय शासन और राज्य स्वायत्तता से जुड़ी सिफारिशें थीं।

भंग करने का आधार

विजय सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 7 अगस्त 2026 को पुनर्गठित तमिलनाडु राज्य विधि आयोग को पहले से ही अंतरराज्यीय और केंद्र-राज्यीय संबंधों, मौजूदा कानूनों की समीक्षा, और राज्य के कानूनी व संस्थागत ढाँचे में सुधार जैसे व्यापक विषयों पर काम करने का अधिकार प्राप्त है। सरकार का तर्क था कि समान जिम्मेदारियों वाले दो पृथक निकायों को एक साथ चलाने से कार्यों का अनावश्यक दोहराव होगा।

गौरतलब है कि आदेश में भंग की गई समिति को गैर-वैधानिक निकाय करार दिया गया है, जो इस प्रशासनिक कदम का आधार है। हालाँकि यह भी उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु राज्य विधि आयोग स्वयं भी एक गैर-वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना विधायी प्रक्रिया के बजाय कार्यकारी सरकारी आदेश द्वारा हुई है।

राजनीतिक संदर्भ

यह निर्णय तमिलनाडु की राजनीति में एक स्पष्ट नीतिगत बदलाव का संकेत देता है। DMK के शासनकाल में केंद्र-राज्य संबंधों की स्वतंत्र संस्थागत समीक्षा को राज्य स्वायत्तता की रक्षा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और कई गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच राजकोषीय हस्तांतरण, राज्यपाल के अधिकारों और केंद्रीय एजेंसियों के उपयोग को लेकर तनाव बना रहा है।

विजय सरकार का कहना है कि विधि आयोग के माध्यम से केंद्र-राज्य संबंधों के विषय पर संस्थागत ध्यान दिया जाता रहेगा, परंतु आलोचकों का तर्क है कि एक विशेषज्ञ समिति को भंग करना इस मसले को प्राथमिकता सूची में नीचे धकेलना है।

आगे क्या होगा

अब यह देखना होगा कि तमिलनाडु राज्य विधि आयोग भंग समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के पहले भाग में दी गई सिफारिशों को किस रूप में आगे बढ़ाता है और क्या वह रिपोर्ट का दूसरा भाग स्वतंत्र रूप से पूरा करेगा। राज्य सरकार के इस कदम पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका राजनीतिक संदेश कहीं अधिक स्पष्ट है — DMK की संघवाद-केंद्रित कूटनीति को एक विशेषज्ञ मंच से हटाकर एक सामान्य कानूनी निकाय में समाहित करना, जहाँ इसकी तात्कालिकता और दृश्यता स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी। असली सवाल यह है कि क्या विधि आयोग के पास उस राजनीतिक इच्छाशक्ति और विशेषज्ञता का संयोजन होगा जो न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की समिति लेकर आई थी। भंग की गई समिति की रिपोर्ट का पहला भाग सार्वजनिक नहीं किया गया — यदि नई सरकार उसे दबाए रखती है, तो यह महज प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि नीतिगत दिशा का स्पष्ट परित्याग होगा।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु में केंद्र-राज्य संबंध समिति क्या थी?
यह पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा अप्रैल 2025 में गठित तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति थी, जिसका काम केंद्र-राज्य संबंधों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की जाँच करना और राज्य स्वायत्तता को मजबूत करने के उपाय सुझाना था। इसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने की थी।
विजय सरकार ने समिति क्यों भंग की?
सरकार का तर्क है कि 7 अगस्त 2026 को पुनर्गठित तमिलनाडु राज्य विधि आयोग के पास पहले से ही केंद्र-राज्य संबंधों और कानूनी सुधारों से जुड़े समान अधिकार हैं। दो समानांतर निकायों को बनाए रखने से कार्यों का दोहराव होता, इसलिए समिति को भंग करना उचित माना गया।
भंग की गई समिति ने क्या काम किया था?
समिति ने केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक मुद्दों की गहन जाँच की और 16 फरवरी 2026 को पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन को अपनी रिपोर्ट का पहला भाग सौंपा, जिसमें संघीय शासन और राज्य स्वायत्तता से संबंधित सिफारिशें शामिल थीं। रिपोर्ट का दूसरा भाग समिति भंग होने के कारण अधूरा रह गया।
अब केंद्र-राज्य संबंधों के मुद्दे कौन देखेगा?
तमिलनाडु राज्य विधि आयोग अब यह जिम्मेदारी संभालेगा। यह एक गैर-वैधानिक निकाय है, जिसे कार्यकारी सरकारी आदेश द्वारा स्थापित किया गया है और इसे अंतरराज्यीय व केंद्र-राज्यीय संबंधों, मौजूदा कानूनों की समीक्षा और संस्थागत सुधारों पर काम करने का व्यापक अधिकार प्राप्त है।
इस फैसले का राजनीतिक महत्व क्या है?
यह निर्णय DMK के शासनकाल की संघवाद-समर्थक नीतिगत दिशा से विजय सरकार के अलगाव को दर्शाता है। आलोचकों का कहना है कि एक विशेषज्ञ समिति को भंग कर काम एक सामान्य आयोग को सौंपना इस मुद्दे की प्राथमिकता और दृश्यता को कम करता है।
राष्ट्र प्रेस
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