तमिलनाडु: विजय सरकार ने स्टालिन-युग की केंद्र-राज्य समिति भंग की, विधि आयोग को सौंपा काम
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने 7 नवंबर 2026 को एक सरकारी आदेश के ज़रिये पूर्व द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार द्वारा स्थापित केंद्र-राज्य संबंधों पर उच्चस्तरीय समिति को औपचारिक रूप से भंग कर दिया और उसकी समस्त जिम्मेदारियाँ तमिलनाडु राज्य विधि आयोग को सौंप दीं। यह फैसला पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की उस पहल के अंत का प्रतीक है जिसे उन्होंने राज्य के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया था।
समिति का गठन और कार्यकाल
पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अप्रैल 2025 में तमिलनाडु विधानसभा में इस तीन सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केंद्र-राज्य संबंधों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की जाँच करना और संघवाद तथा राज्य स्वायत्तता को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाना था।
समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ कर रहे थे, जबकि पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी के. अशोक वर्धन शेट्टी और राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एम. नागनाथन सदस्य के रूप में शामिल थे। समिति ने केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक मुद्दों की गहन समीक्षा की और 16 फरवरी 2026 को स्टालिन को अपनी रिपोर्ट का पहला भाग सौंपा, जिसमें संघीय शासन और राज्य स्वायत्तता से जुड़ी सिफारिशें थीं।
भंग करने का आधार
विजय सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 7 अगस्त 2026 को पुनर्गठित तमिलनाडु राज्य विधि आयोग को पहले से ही अंतरराज्यीय और केंद्र-राज्यीय संबंधों, मौजूदा कानूनों की समीक्षा, और राज्य के कानूनी व संस्थागत ढाँचे में सुधार जैसे व्यापक विषयों पर काम करने का अधिकार प्राप्त है। सरकार का तर्क था कि समान जिम्मेदारियों वाले दो पृथक निकायों को एक साथ चलाने से कार्यों का अनावश्यक दोहराव होगा।
गौरतलब है कि आदेश में भंग की गई समिति को गैर-वैधानिक निकाय करार दिया गया है, जो इस प्रशासनिक कदम का आधार है। हालाँकि यह भी उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु राज्य विधि आयोग स्वयं भी एक गैर-वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना विधायी प्रक्रिया के बजाय कार्यकारी सरकारी आदेश द्वारा हुई है।
राजनीतिक संदर्भ
यह निर्णय तमिलनाडु की राजनीति में एक स्पष्ट नीतिगत बदलाव का संकेत देता है। DMK के शासनकाल में केंद्र-राज्य संबंधों की स्वतंत्र संस्थागत समीक्षा को राज्य स्वायत्तता की रक्षा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और कई गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच राजकोषीय हस्तांतरण, राज्यपाल के अधिकारों और केंद्रीय एजेंसियों के उपयोग को लेकर तनाव बना रहा है।
विजय सरकार का कहना है कि विधि आयोग के माध्यम से केंद्र-राज्य संबंधों के विषय पर संस्थागत ध्यान दिया जाता रहेगा, परंतु आलोचकों का तर्क है कि एक विशेषज्ञ समिति को भंग करना इस मसले को प्राथमिकता सूची में नीचे धकेलना है।
आगे क्या होगा
अब यह देखना होगा कि तमिलनाडु राज्य विधि आयोग भंग समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के पहले भाग में दी गई सिफारिशों को किस रूप में आगे बढ़ाता है और क्या वह रिपोर्ट का दूसरा भाग स्वतंत्र रूप से पूरा करेगा। राज्य सरकार के इस कदम पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकती है।