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PM मोदी की फेसबुक पोस्ट हटाने पर संसदीय समिति ने मेटा को घेरा, 10 दिन में जवाब माँगा

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PM मोदी की फेसबुक पोस्ट हटाने पर संसदीय समिति ने मेटा को घेरा, 10 दिन में जवाब माँगा

सारांश

PM मोदी की नीट संबंधी फेसबुक पोस्ट का अस्थायी रूप से गायब होना महज तकनीकी चूक नहीं — संसदीय समिति ने इसे वैश्विक प्लेटफॉर्म की जवाबदेही का बड़ा सवाल बताया। मेटा को 10 दिन में ऑडिट ट्रेल देनी होगी, और भारत के डिजिटल नियमन ढाँचे की समीक्षा भी दरवाजे पर है।

मुख्य बातें

संसदीय स्थायी समिति ने 3 अगस्त 2026 को मेटा को PM मोदी की नीट संबंधी फेसबुक पोस्ट हटाने पर कड़ी फटकार लगाई।
समिति अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने मेटा सहित सभी पक्षों से 10 दिनों के भीतर लिखित जवाब माँगा।
मेटा से पूरी ऑडिट ट्रेल , पोस्ट हटाने का कारण और ऑटोमेटेड मॉडरेशन की भूमिका स्पष्ट करने को कहा गया।
2025 में साइबर अपराध की 28.15 लाख शिकायतें और करीब ₹22,495 करोड़ का नुकसान दर्ज।
समिति ने MeitY और गृह मंत्रालय से पूछा — क्या मौजूदा कानूनी ढाँचा डिजिटल मध्यस्थों की जवाबदेही के लिए पर्याप्त है?
इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े विज्ञापनों, डीपफेक और नकली निवेश घोटालों पर भी चिंता जताई गई।

संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति ने सोमवार, 3 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में हुई बैठक में मेटा को कड़ी फटकार लगाई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीट (राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा) से संबंधित आधिकारिक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए हटाए जाने का मामला सामने आया। समिति ने इस घटना को महज तकनीकी चूक मानने से इनकार करते हुए वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए।

बैठक में किन-किन को बुलाया गया

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में 'सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्म और उनके नियमन' विषय पर आयोजित इस बैठक में मेटा, गूगल, यूट्यूब, स्नैपचैट और एक्स के प्रतिनिधियों को तलब किया गया। इसके साथ ही गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।

सूत्रों के अनुसार, समिति अध्यक्ष ने सभी मंत्रालयों और सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दिया कि वे उठाए गए सवालों के लिखित जवाब 10 दिनों के भीतर प्रस्तुत करें। इन जवाबों के आधार पर समिति डिजिटल प्लेटफॉर्म के नियमन पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।

मेटा से क्या-क्या माँगा गया

समिति ने मेटा से तीन बिंदुओं पर स्पष्ट उत्तर माँगे — पहला, पोस्ट हटाने से लेकर उसे बहाल करने तक की पूरी ऑडिट ट्रेल; दूसरा, यह स्पष्ट करना कि पोस्ट हटाना सिस्टम की खराबी थी या जानबूझकर किया गया कदम; और तीसरा, ऑटोमेटेड कंटेंट मॉडरेशन एवं रेकमेंडेशन सिस्टम की इसमें भूमिका।

समिति अध्यक्ष ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के आधिकारिक अकाउंट के साथ ऐसी घटना हो सकती है, तो आम उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर चिंता स्वाभाविक है। उन्होंने इसे केवल तकनीकी गड़बड़ी कहकर नजरअंदाज करने से इनकार किया।

कंटेंट मॉडरेशन और पक्षपात के आरोप

समिति ने मेटा के कंटेंट मॉडरेशन के तरीकों पर भी व्यापक चिंता जताई। आरोप लगाए गए कि बिना पर्याप्त कारण के कंटेंट हटाया जा रहा है, अकाउंट पर पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं और भारत-समर्थक तथा सरकार-समर्थक पेजों की दृश्यता (विजिबिलिटी) कम की जा रही है। समिति ने यह भी पूछा कि बुलिंग, उत्पीड़न, हेट स्पीच और सुनियोजित दुर्व्यवहार से जुड़ी नीतियाँ निष्पक्ष और बिना भेदभाव के लागू हो रही हैं या नहीं।

साइबर अपराध और बच्चों की सुरक्षा पर चिंता

बैठक में साइबर अपराध के बढ़ते आँकड़ों पर भी चर्चा हुई। समिति ने बताया कि 2025 में साइबर अपराध की लगभग 28.15 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें करीब ₹22,495 करोड़ का नुकसान हुआ। समिति ने सवाल उठाया कि प्लेटफॉर्म की कंप्लायंस रिपोर्ट में ऑनलाइन धोखाधड़ी को अलग श्रेणी में क्यों नहीं दर्शाया जाता।

इसके अलावा, समिति ने एक मीडिया जाँच के उन आरोपों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की जिनमें कहा गया था कि इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट वाले विज्ञापन दिखाए गए। एआई-निर्मित गलत सूचना, डीपफेक का प्रसार और सोशल मीडिया पर नकली निवेश घोटालों (फर्जी इन्वेस्टमेंट स्कैम) के मामले भी एजेंडे पर रहे।

आगे क्या होगा

समिति ने MeitY और गृह मंत्रालय दोनों से यह भी पूछा है कि क्या डिजिटल मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) को नियंत्रित करने वाला भारत का मौजूदा कानूनी ढाँचा पर्याप्त है, या ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए और मजबूत कानूनी प्रावधानों की जरूरत है। सभी पक्षों के लिखित जवाब मिलने के बाद समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के भविष्य के नियमन की दिशा तय कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या इससे कोई ठोस नियामक बदलाव आएगा — या यह भी पिछली कई ऐसी बैठकों की तरह महज कागजी जवाबों में सिमट जाएगा। भारत का मौजूदा IT कानून ढाँचा बड़े प्लेटफॉर्म पर वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई के मामले में बेहद सीमित साबित हुआ है। जब तक स्वतंत्र ऑडिट तंत्र और सख्त दंड प्रावधान नहीं बनते, तब तक 'जवाब माँगना' और 'जवाबदेही तय करना' दो अलग-अलग बातें रहेंगी।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी की फेसबुक पोस्ट हटाने का मामला क्या है?
नीट परीक्षा से जुड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए फेसबुक (मेटा) से हटा दिया गया था। इस घटना पर संसदीय स्थायी समिति ने 3 अगस्त 2026 को मेटा से विस्तृत स्पष्टीकरण माँगा है।
संसदीय समिति ने मेटा से क्या जवाब माँगा है?
समिति ने मेटा से पोस्ट हटाने से बहाल करने तक की पूरी ऑडिट ट्रेल, यह स्पष्टीकरण कि यह सिस्टम की खराबी थी या जानबूझकर किया गया, और ऑटोमेटेड कंटेंट मॉडरेशन की भूमिका के बारे में 10 दिनों के भीतर लिखित जवाब माँगा है।
इस बैठक में साइबर अपराध पर क्या चर्चा हुई?
समिति ने बताया कि 2025 में साइबर अपराध की लगभग 28.15 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें करीब ₹22,495 करोड़ का नुकसान हुआ। समिति ने माँग की कि प्लेटफॉर्म की कंप्लायंस रिपोर्ट में ऑनलाइन धोखाधड़ी को अलग श्रेणी में दर्शाया जाए।
क्या भारत का मौजूदा कानून सोशल मीडिया की जवाबदेही के लिए पर्याप्त है?
संसदीय समिति ने इसी पर सवाल उठाया है। समिति ने MeitY और गृह मंत्रालय से पूछा है कि क्या डिजिटल मध्यस्थों को नियंत्रित करने वाला मौजूदा कानूनी ढाँचा पर्याप्त है, या ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए और सख्त प्रावधान चाहिए।
इस बैठक में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर क्या उठा?
समिति ने एक मीडिया जाँच के उन आरोपों पर चिंता जताई जिनमें कहा गया कि इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट वाले विज्ञापन दिखाए गए। एआई-निर्मित डीपफेक और नकली निवेश घोटालों का मुद्दा भी बैठक में उठाया गया।
राष्ट्र प्रेस
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