पश्चिम बंगाल SIR मामला: 37 लाख अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित, निपटारे पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान 37 लाख लंबित अपीलों के निपटारे को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 25 अगस्त को हुई इस सुनवाई के बाद अधिवक्ता रऊफ रहीम ने कहा कि न्यायाधीशों ने इन अपीलों की विशाल संख्या और उनके समयबद्ध समाधान पर स्पष्ट सवाल उठाए।
मुख्य घटनाक्रम
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह प्रश्न केंद्रीय रहा कि 87 हजार याचिकाकर्ताओं से संबंधित मामलों पर फैसला होने के बाद शेष 37 लाख अपीलों का क्या होगा। न्यायाधीशों ने यह भी जानना चाहा कि ये अपीलें किसने दाखिल की हैं। अधिवक्ता रहीम के अनुसार, यदि ये अपीलें भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से दायर की गई हैं, तो इसके पीछे का कारण भी अदालत के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अधिवक्ता की दलील
अधिवक्ता रऊफ रहीम ने अदालत में यह तर्क प्रस्तुत किया कि जिन नागरिकों ने पहले अपील दाखिल की है, उनकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर पहले होनी चाहिए। उसके बाद ही निर्वाचन आयोग की ओर से प्रस्तुत मामलों पर विचार किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग बड़ी मात्रा में डेटा अदालत के सामने रख रहा है, जिससे प्रक्रिया और जटिल हो रही है।
निपटारे पर गंभीर सवाल
रहीम ने आशंका जताई कि मामले की मौजूदा गति को देखते हुए यह प्रक्रिया अगले पाँच वर्षों में भी पूरी तरह नहीं निपट पाएगी। उनके अनुसार, यदि वर्तमान प्रक्रिया चार से छह महीनों में भी आगे नहीं बढ़ पा रही, तो आने वाले वर्षों में इसके समाधान को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि ECI की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जाने की ज़रूरत है।
मतदान अधिकार पर असर
अधिवक्ता रहीम ने ज़ोर देकर कहा कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों में समयबद्ध फैसला इसलिए अनिवार्य है क्योंकि इसका सीधा संबंध नागरिकों के मतदान के मौलिक अधिकार से है। किसी योग्य मतदाता का नाम सूची में बनाए रखना और उसके अधिकार की रक्षा करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आधारशिला है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावी प्रक्रियाएँ क्षितिज पर हैं।
क्या होगा आगे
अधिवक्ता रहीम ने विश्वास जताया कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप करेगा और आवश्यकता पड़ने पर कड़े कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि अदालत ने पहले भी चुनाव एवं नागरिक अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मामलों में निर्णायक भूमिका निभाई है। अदालत से अपेक्षा है कि वह ऐसी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करे जिससे मामलों का उचित और समयबद्ध निपटारा संभव हो सके।