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फूलन देवी: बेहमई नरसंहार से 'बैंडिट क्वीन' तक, 11 साल बिना मुकदमे जेल में रहकर बनीं सांसद

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फूलन देवी: बेहमई नरसंहार से 'बैंडिट क्वीन' तक, 11 साल बिना मुकदमे जेल में रहकर बनीं सांसद

सारांश

एक निर्धन मल्लाह परिवार की बेटी से 'बैंडिट क्वीन' और फिर लोकसभा सांसद — फूलन देवी का जीवन जाति, हिंसा और न्याय की खोज की अनकही दास्तान है। बेहमई नरसंहार ने उन्हें शोषितों की प्रतीक बनाया, और 11 साल बिना मुकदमे जेल में रहने के बाद 1996 में वह संसद पहुँचीं।

मुख्य बातें

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गाँव में हुआ था।
मात्र 11 वर्ष की उम्र में विवाह, फिर उत्पीड़न और 1979 में डकैत गिरोह द्वारा अपहरण — यह उनके विद्रोह की पृष्ठभूमि बनी।
14 फरवरी 1981 को बेहमई गाँव में 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों की हत्या — 'बेहमई नरसंहार' के नाम से इतिहास में दर्ज।
12 फरवरी 1983 को भिंड में आत्मसमर्पण के बाद बिना मुकदमे 11 साल जेल में; 1994 में रिहाई।
1996 में मिर्जापुर से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बनीं; 15 फरवरी 1995 को नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में शेर सिंह राणा ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

फूलन देवी — वह नाम जो एक साथ पीड़ा, विद्रोह और राजनीतिक पुनर्जन्म की कहानी कहता है। 12 फरवरी 1983 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले में सशस्त्र पुलिसकर्मियों और हज़ारों की भीड़ के सामने एक 20 वर्षीया युवती ने देवी दुर्गा और महात्मा गांधी की तस्वीरों के सामने अपने हथियार रख दिए। खाकी वर्दी, लाल शॉल और माथे पर लाल पट्टी — यही पहचान थी उस महिला की जिसे दुनिया 'बैंडिट क्वीन' के नाम से जानती थी। यह आत्मसमर्पण किसी हार की नहीं, बल्कि एक असाधारण जीवन-यात्रा के एक अध्याय के अंत की शुरुआत थी।

शुरुआती जीवन और अन्याय की पहली चोट

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गाँव में एक अत्यंत निर्धन मल्लाह (निषाद) परिवार में हुआ था। उनके पिता देवीदीन की पुश्तैनी जमीन उनके चाचा और चचेरे भाई मैयादीन ने गाँव के सरपंच को रिश्वत देकर हड़प ली। अन्याय के विरुद्ध फूलन का प्रतिरोध महज 10 वर्ष की आयु में ही प्रकट हो गया, जब उन्होंने परिवार की जमीन और एक नीम के पेड़ को बचाने के लिए दबंगों का सामना किया — और बदले में उन्हें बेरहमी से पीटा गया।

गरीबी और सामाजिक दबाव के बोझ तले मात्र 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह पुत्तीलाल नामक एक ऐसे व्यक्ति से करा दिया गया, जो उनसे उम्र में तीन गुना बड़ा था। ससुराल में शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न झेलने के बाद फूलन ने वह विवाह अस्वीकार किया और अपने माता-पिता के पास लौट आईं।

अपहरण, अत्याचार और विद्रोह का जन्म

1979 में गाँव में बार-बार पुलिस और दबंगों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद बाबू गुज्जर के डकैत गिरोह ने फूलन का अपहरण कर लिया, जहाँ उनके साथ बार-बार दुष्कर्म किया गया। गिरोह के ही सदस्य विक्रम मल्लाह ने इस अत्याचार का विरोध करते हुए बाबू गुज्जर की हत्या कर दी और फूलन को संरक्षण दिया। विक्रम ने उन्हें राइफल चलाना सिखाया; दोनों के बीच प्रेम हुआ और वे शोषितों के हक में सवर्ण गाँवों में लूटपाट करने लगे।

किंतु यह शांति अल्पकालिक रही। कथित तौर पर उच्च जाति के डकैतों — श्री राम और लाला राम — ने वर्चस्व की लड़ाई में विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी और फूलन को बंधक बनाकर बेहमई गाँव ले गए, जहाँ कई दिनों तक उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया।

बेहमई कांड: एक नाम जो इतिहास में दर्ज हो गया

बंधकों के चंगुल से भागने के बाद फूलन देवी ने अपना स्वतंत्र गिरोह बनाया। 14 फरवरी 1981 को वह अपने गिरोह के साथ उसी बेहमई गाँव पहुँचीं और 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों को पंक्ति में खड़ा करके गोली मार दी। 'बेहमई नरसंहार' के नाम से इतिहास में दर्ज इस घटना ने शोषितों और निचली जातियों के बीच उन्हें रातों-रात 'रॉबिन हुड' और दुर्गा के अवतार का दर्जा दिला दिया — जबकि कानून की नज़र में वह एक वांछित अपराधी थीं।

आत्मसमर्पण, जेल और लोकतांत्रिक पुनर्जन्म

1983 में आत्मसमर्पण के बाद फूलन देवी ने बिना किसी मुकदमे के 11 वर्ष ग्वालियर और जबलपुर की जेलों में बिताए — एक ऐसा तथ्य जिसे मानवाधिकार संगठनों ने न्यायिक विफलता का प्रतीक बताया। 1994 में रिहाई के बाद उन्होंने हाशिए पर पड़े लोगों और महिलाओं को आत्मरक्षा सिखाने के लिए 'एकलव्य सेना' का गठन किया।

हिंदू धर्म में व्याप्त जातिगत भेदभाव से आहत होकर 15 फरवरी 1995 को उन्होंने नागपुर की ऐतिहासिक दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 1996 में वह मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा की सदस्य बनीं — डकैत से सांसद तक का यह सफर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अभूतपूर्व था।

विरासत, विवाद और दुखद अंत

फूलन देवी ने अपनी आत्मकथा 'आई, फूलन देवी' लिखी, जिसे वैश्विक पहचान मिली। हालाँकि, निर्देशक शेखर कपूर की चर्चित फिल्म 'बैंडिट क्वीन' का उन्होंने कड़ा विरोध किया। लेखिका अरुंधति रॉय ने भी फिल्म पर फूलन के दर्द के व्यवसायीकरण का गंभीर आरोप लगाया।

25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में उनके आवास के बाहर शेर सिंह राणा और उसके साथियों ने गोली मारकर फूलन देवी की हत्या कर दी। यह बेहमई कांड का कथित प्रतिशोध था। उनकी हत्या ने एक ऐसे जीवन को समाप्त किया जो भारतीय समाज में जाति, लिंग और न्याय की जटिलताओं का जीवंत दस्तावेज़ था — और उनका संघर्ष आज भी उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो व्यवस्था के खिलाफ लड़ते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बार-बार यौन उत्पीड़न, और फिर बिना मुकदमे 11 साल की कैद — यह भारतीय न्याय व्यवस्था की उस चुप्पी का प्रमाण है जो जाति और लिंग के चौराहे पर खड़ी महिलाओं को मिलती है। बेहमई नरसंहार को 'रॉबिन हुड' की कथा में बदलना भी उतना ही एकांगी है — 20 हत्याएँ अपराध थीं, चाहे संदर्भ कुछ भी हो। असली सवाल यह है कि क्या उनका संसद तक पहुँचना व्यवस्था की सफलता थी या उस व्यवस्था का अपराध-बोध, जिसने पहले उन्हें तोड़ा और फिर उन्हें वोट दिया।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फूलन देवी कौन थीं और उन्हें 'बैंडिट क्वीन' क्यों कहा जाता था?
फूलन देवी उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की एक मल्लाह जाति की महिला थीं, जो बार-बार उत्पीड़न और अपहरण के बाद डकैत बन गईं। शोषितों के पक्ष में सवर्ण गाँवों में लूटपाट और बेहमई नरसंहार के बाद उन्हें 'बैंडिट क्वीन' और 'दस्यु सुंदरी' की उपाधि मिली।
बेहमई नरसंहार क्या था और यह कब हुआ?
14 फरवरी 1981 को फूलन देवी अपने गिरोह के साथ उत्तर प्रदेश के बेहमई गाँव पहुँचीं और 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों को पंक्ति में खड़ा करके गोली मार दी। यह कृत्य कथित तौर पर उनके अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का प्रतिशोध था और इसे 'बेहमई नरसंहार' या 'बेहमई कांड' के नाम से जाना जाता है।
फूलन देवी ने कितने साल जेल में बिताए और उन पर मुकदमा क्यों नहीं चला?
फूलन देवी ने 1983 में आत्मसमर्पण के बाद बिना किसी मुकदमे के 11 साल ग्वालियर और जबलपुर की जेलों में बिताए। उनकी रिहाई 1994 में हुई। उन पर मुकदमा न चलाना भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की एक बड़ी विफलता के रूप में देखा जाता है।
फूलन देवी सांसद कैसे बनीं?
1994 में जेल से रिहा होने के बाद फूलन देवी ने लोकतांत्रिक राजनीति का मार्ग चुना और 1996 में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीता। डकैत से सांसद बनने का यह सफर भारतीय राजनीतिक इतिहास में अभूतपूर्व माना जाता है।
फूलन देवी की हत्या कैसे और क्यों हुई?
25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में उनके आवास के बाहर शेर सिंह राणा और उसके साथियों ने गोली मारकर फूलन देवी की हत्या कर दी। शेर सिंह राणा ने कथित तौर पर बेहमई नरसंहार में मारे गए ठाकुरों के प्रतिशोध में यह वारदात को अंजाम दिया।
राष्ट्र प्रेस
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