भारत के जीसीसी 2030 तक एआई 'एजेंटिक ट्रांसफॉर्मेशन इंजन' बनेंगे: डेल-जिनोव रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) वर्ष 2030 तक महज बैक-ऑफिस या सपोर्ट इकाइयों की पारंपरिक भूमिका से आगे निकलकर वैश्विक कंपनियों के लिए एआई-संचालित 'एजेंटिक ट्रांसफॉर्मेशन इंजन' बन सकते हैं। डेल टेक्नोलॉजीज और शोध संस्था जिनोव की एक नई संयुक्त रिपोर्ट में यह निष्कर्ष सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि आने वाले वर्षों में केवल वही जीसीसी आगे बढ़ेंगे जो एआई प्रयोगों की सीमा से परे जाकर डेटा, तकनीक और गवर्नेंस की मज़बूत बुनियाद पर वास्तविक कारोबारी परिणाम सुनिश्चित करेंगे।
भारत के जीसीसी की वर्तमान स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इस समय 2,100 से अधिक जीसीसी कार्यरत हैं, जो लगभग 23.6 लाख लोगों को रोज़गार देते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में इन केंद्रों ने करीब 98.4 अरब डॉलर का राजस्व अर्जित किया। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि भारत के जीसीसी वैश्विक एआई प्रतिभा का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखते हैं और 1,200 से अधिक जीसीसी केंद्र पहले से ही एआई तथा मशीन लर्निंग क्षमताएं विकसित कर चुके हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कंपनियाँ अपने तकनीकी संचालन को लागत-केंद्रित ढाँचे से हटाकर नवाचार-केंद्रित मॉडल की ओर ले जाने की कोशिश कर रही हैं। गौरतलब है कि 70 प्रतिशत जीसीसी नेताओं के पास पहले से एआई से संबंधित स्पष्ट रोडमैप या चार्टर मौजूद है।
नेतृत्व और रणनीतिक जिम्मेदारी का नया दौर
डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनीष गुप्ता ने कहा कि जैसे-जैसे जीसीसी अधिक रणनीतिक जिम्मेदारियाँ संभालेंगे, डेटा, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस जैसी मज़बूत बुनियादी क्षमताएं नवाचार का आधार बनेंगी। उन्होंने कहा कि जो जीसीसी अभी से इन क्षेत्रों में निवेश करेंगे, वे यह तय करेंगे कि वैश्विक कंपनियाँ एआई का उपयोग किस प्रकार करेंगी।
जिनोव के अध्यक्ष सिद्धांत रस्तोगी ने कहा कि पिछले दो दशकों में जीसीसी की चर्चा मुख्य रूप से पैमाने, प्रतिभा और क्षमताओं को लेकर होती थी, लेकिन अब अगला दशक 'स्वामित्व और नेतृत्व' का होगा। रस्तोगी ने यह भी कहा कि एआई और एजेंटिक सिस्टम्स के व्यावसायिक प्रक्रियाओं में शामिल होने के साथ जीसीसी से केवल सेवाएं देने की नहीं, बल्कि उत्पादों, प्लेटफॉर्म्स, बाज़ारों और कारोबारी परिणामों की ज़िम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाएगी।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 64 प्रतिशत जीसीसी नेता पहले से दोहरी वैश्विक जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं — वे न केवल भारत स्थित केंद्रों का संचालन कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर किसी महत्त्वपूर्ण कारोबारी कार्य का नेतृत्व भी कर रहे हैं।
एजेंटिक एआई की इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौती
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एआई-आधारित एजेंटिक वर्कफ्लो पारंपरिक चैट-आधारित एआई सिस्टम्स की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग संसाधनों की माँग करते हैं। जहाँ एक सामान्य चैट इंटरैक्शन में लगभग 1,000 से 2,000 टोकन्स की आवश्यकता होती है, वहीं एजेंटिक वर्कफ्लो में 10,000 से 5 लाख टोकन्स तक की ज़रूरत पड़ सकती है। इसलिए समय रहते सही इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना अनिवार्य होगा।
यह आँकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि जीसीसी को केवल सॉफ्टवेयर या प्रतिभा नहीं, बल्कि हार्डवेयर और नेटवर्क बुनियाद पर भी बड़ा दाँव लगाना होगा।
कार्यबल पर असर और रिस्किलिंग की अनिवार्यता
अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि जीसीसी में होने वाले 55 प्रतिशत नियमित कार्य एआई-आधारित ऑटोमेशन के दायरे में आ सकते हैं। इसके साथ ही वर्ष 2030 तक लगभग 60 प्रतिशत कार्यबल को नए कौशल सीखने यानी रिस्किलिंग की आवश्यकता होगी।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अनिवार्यता केवल एआई प्रशिक्षण बढ़ाने की नहीं, बल्कि कार्य की मौलिक रूप से पुनर्कल्पना करने की है। साथ ही 66 प्रतिशत जीसीसी नेता अपनी एआई रणनीति में राजस्व और कारोबारी प्रभाव को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं, जो दर्शाता है कि एआई की बहस अब लागत कटौती से आगे बढ़कर व्यावसायिक विकास और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त से जुड़ चुकी है।
यह स्पष्ट है कि भारत के जीसीसी अगले पाँच वर्षों में वैश्विक एआई संचालन के केंद्र बिंदु बन सकते हैं — बशर्ते वे इंफ्रास्ट्रक्चर, गवर्नेंस और प्रतिभा विकास में समय पर निवेश करें।